सूरज का उजाला फैलने लगा है। फिर भी बारिश हमारा रास्ता रोक रही है। शांतिनिकेतन के परिसर में हम उस स्थान पर खड़े हैं, जहां हजारी प्रसाद द्विवेदी रहे थे। द्विवेदी जी का लगाया नीम का वृक्ष तब की स्मृतियों का साक्षी बना यहां आने वालों का मौन स्वागत करता प्रतीत हुआ। पर इस इमारत की जर्जर स्थिति देखकर पीड़ा हुई। 'हिंदी भवन’ का पुस्तकालय किसी पुराने गोदाम सरीखा लग रहा था। सुना कि 'हिंदी भवन’ के पीछे का इलाका कभी बड़ा खूबसूरत हुआ करता था, पर आज वैसा नहीं है। पीछे वह चबूतरा और अशोक वट है, जहां द्विवेदी जी बैठकर लिखा करते थे या वहां की प्रकृति को निहारते थे।
आचार्य द्विवेदी शांतिनिकेतन को अपनी दूसरी जन्मभूमि मानते थे। पहली बार यहां आए, तो गुरुदेव ने उनसे पूछा था, 'अरे पंडित जी, आप कहां से आया?’ उसके बाद द्विवेदी जी पूरे आश्रमवासियों के लिए पंडित जी हो गए। बाद में जब द्विवेदी जी शांतिनिकेतन से लौट गए, तब भी उनकी कोई बात गुरुदेव और शांतिनिकेतन के बिना पूरी नहीं होती थी। द्विवेदी जी के शांतिनिकेतन प्रवास को लेकर विद्यानिवास मिश्र अक्सर कहा करते थे कि वहां उनका पंडित एक ओर बाउल बना, तो उनकी भोजपुरी सिधाई सत्य के प्रखरतम रूप को ग्रहण करने में निष्णात हो गई। उसी जगह रहते हुए उन्होंने कबीर को हिंदी साहित्य के जागरूक प्रहरी के रूप में स्थापित किया।
कहां-कहां से मणियों को लाकर गूंथा था गुरुदेव ने शांतिनिकेतन के कंठहार में। हरिचरण बंद्योपाध्याय को लाए थे। बंगीय शब्दकोश की रचना के लिए विधुशेखर शास्त्री आए। हजारीप्रसाद द्विवेदी और प्रभात मुकर्जी आए। और यहां आए बलराज साहनी। उनके अध्यापक बनने के तीसरे या चौथे दिन बोलपुर की हिंदी सभा के तुलसी जयंती समागम के लिए द्विवेदी जी ने उन्हें सभापति बनाकर भेज दिया, जबकि हिंदी साहित्य या तुलसी साहित्य से उनका परिचय न के बराबर था। फिर भी उन्हें बीए फाइनल के छात्रों के लिए हिंदी उपन्यास पर व्याख्यान देने को कहा गया।
वह क्लास ले रहे होते और द्विवेदी जी विद्या भवन की खिड़की में बैठे दूर से उनको देखते। विश्व भारती की स्थापना के मूल में अंग्रेजी माध्यम की शिक्षा के प्रति अमत ही था। उनके इस मंतव्य में सहायक बने प्रभात कुमार बनर्जी। आश्रम में यही प्रभात दा गुरुदेव के दाहिने हाथ बन गए। कुछ समय के लिए यहां से गए भी, लेकिन 1918 में पुनः 'पाठ भवन’ में शिक्षक बनकर आए। शांतिनिकेतन गुरुदेव की सर्वोत्तम कृति है। एक समय इस आश्रम की रक्षा गुरुदेव की धर्मपत्नी ने अपनी गहने बेचकर की थी। मैं आज उसी परिसर में मूक बना खड़ा हूं।
हम आम्रकुंज में हैं। मन को बांधने वाला दृश्य। दूर तक वृक्ष-ही-वृक्ष। हवा में डोलती शाखाएं और पत्तियां। वर्षा जल से भीगकर उनकी हरीतिमा और भी निखर गई है। हम सिरों पर छाते लगाए तेज बरसात में भीगने से बच नहीं पा रहे हैं। इन सघन आम वृक्षों के मध्य की वह प्रार्थना सभा को कोई याद करे, तो कहेगा कि गांधी जी अनशन पर थे, तब पूरा आश्रम ही उनकी चिंता में मानो डूब-डूब गया था। वर्ष 1940 में जब गांधी जी यहां आए थे, तब उत्सव-दर-उत्सव। बड़ा शामियाना लगा था। कस्तूरबा भी साथ आई थीं। पूरा आश्रम अल्पना से सजाया गया था। 'श्यामली’ यही तो जगह है, जहां आज हम खड़े हैं। यहां चित्र लेने की मनाही है। कवि-मित्र सुरेश सलिल ऐसा करते हैं, तो सुरक्षा गार्ड उन्हें रोक देते हैं।
शांतिनिकेतन में एक अध्यापक थे मोहनलाल वाजपेयी। वह 'हिंदी भवन’ में आचार्य द्विवेदी के अनन्य सहयोगी थे। शिवानी उनकी छात्रा रहीं। पं. बनारसीदास चतुर्वेदी 1918 में यहां आकर 14 महीने रहे थे। उन्होंने कोलकाता से छपने वाले प्रसिद्ध हिंदी पत्र विशाल भारत का संपादन किया था। वह सप्ताहांत आश्रम में आते, जहां दीनबंधु एंड्रूज से भी उनकी भेंट होती। उन दिनों विश्व भारती में 'चीनी भवन’ की स्थापना हो चुकी थी। पर 'हिंदी भवन’ का न होना खटकने वाली बात था। हजारी प्रसाद द्विवेदी और चतुर्वेदी जी एक शाम टहलने निकले। दो-तीन मील का चक्कर लगाकर खूब हंसते-हंसाते 'पान्थ निवास’ (अतिथि गृह) पहुंचते ही चतुर्वेदी जी ने मजाक में कहा, 'देखिए द्विवेदी जी, इसी स्थान के निकट हमारा 'हिंदी भवन’ बनेगा। आप मुझ पर विश्वास तो कीजिए।’ द्विवेदी जी ने हंसकर कहा, 'मैं विश्वास करता हूं कि अवश्य बनेगा।’
जवाहरलाल नेहरू के यहां आने पर हजारी प्रसाद द्विवेदी के साथ उनसे मिलकर चतुर्वेदी जी ने 'हिंदी भवन’ को बनाने की चर्चा की और फिर उसकी नींव दीनबंधु एंड्रूज के हाथों रखी गई। जवाहरलाल जी ने उसका उद्घाटन किया। गुरुदेव ने अपने जीवन का अंतिम वृक्ष 'हिंदी भवन’ के सामने ही लगाया था। मैं उसी पुरानी इमारत के सम्मुख नतमस्तक खड़ा हूं। विशाल परिसर में आम्रकुंज, विभिन्न कलाकृतियां, गुरुदेव के स्मृति-चिह्नों और उनके चित्रों की प्रदर्शनियां, रामकिंकर का कृतित्व, ब्लैक हाउस की मनमोहन कलाएं, गांधी के ठहरने का स्थान, भित्तिचित्रों से युक्त इमारतें और दीवारें। सब कुछ सम्मोहित करने जैसा। तेज बारिश ने आज यहां की प्रकृति को और भी दर्शनीय बना दिया है। यहां के संग्रहालय में रवींद्र संगीत की धुन बजती है।
मैं अपने भीतर शांतिनिकेतन का सन्नाटा थामे वापस चल पड़ा हूं...।