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नदियां भी नागरिक होती हैं

Tue, 28 Mar 2017 08:03 PM IST
शेखर पाठक
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भागीरथी
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न्यायालय हो रहे अन्याय को अलग से नहीं देखते हैं। कोई अपनी गुहार लेकर न्यायालय जाए, तो न्याय मिलता है। पर मनुष्य और मौसम द्वारा सताई गई नदियों के लिए न्यायालय कौन जाए! हरिद्वार के मुहम्मद सलीम की शक्ति नहर से अतिक्रमण हटाने संबंधी याचिका सहित तीन याचिकाओं पर उत्तराखंड उच्च न्यायालय द्वारा 20 मार्च, 2017 को दिया गया फैसला कई मायनों में ऐतिहासिक और अर्थपूर्ण है। उच्च न्यायालय अपने कई सांविधानिक तथा पर्यावरण संबंधी निर्णयों के लिए लगातार चर्चा में रहा है। अस्थिरता तथा संकटों से भरे राज्य में उच्च न्यायालय ने कुछेक बार रोशनी दिखाई। उच्च, सर्वोच्च न्यायालय तथा राष्ट्रीय हरित प्राधिकरण ने अनेक ऐतिहासिक फैसले देकर न्याय व्यवस्था के साथ इस जनतंत्र पर भी आम जन का विश्वास बनाए रखा है।
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इस फैसले ने गंगा, यमुना तथा सहायक नदियों को ‘जीवित इंसान’ की हैसियत दी है। ऐतिहासिक फैसलों, सांविधानिक प्रावधानों तथा वैज्ञानिक अध्ययनों का हवाला देकर किसी निगम, मंदिर, मठ, मूर्ति आदि को मनुष्य की रचना मानकर जो कानूनी हैसियत मिलती है, वही नदियों को प्राकृतिक रचना मानकर दी गई है। इससे नदी के बहने का अधिकार बहाल हुआ है।

गंगा तथा सहायक नदियों के ‘वैधानिक व्यक्ति’(जूरिस्टिक परसन)  बनने के बाद अपने प्रवाह क्षेत्र में घुसपैठ, खनन, गंदगी डालने, प्रवाह अवरुद्ध करने या प्रदूषित करने के खिलाफ विरोध का अधिकार मिल गया है और इस अधिकार के सम्मान का जिम्मा न्यायालय ने संयुक्त रूप से राज्य के मुख्य सचिव, महाधिवक्ता तथा 'नमामि गंगे प्राधिकरण' के महानिदेशक को दिया है। यदि ये नदियां किसी के खेत, बगीचे, मकान आदि को क्षति पहुंचाती हैं, तो उक्त तीनों के माध्यम से पीड़ित/प्रभावित व्यक्ति अपनी शिकायत कर सकते हैं। 1978 की भागीरथी बाढ़ के समय कवि लीलाधर जगूड़ी ने लिखा था, नदियां कहीं नागरिक नहीं होती हैं और पानी से तेज काटने वाला कोई औजार नहीं होता है। पर अब नदियों को न्यायिक नागरिकता मिली है। न्यायाधीशों ने अन्य याचिकाओं के संदर्भ में कहा कि शहरों और कस्बों से नदियों में गंदगी किसी हालत में न जाने पाए तथा ग्लेशियरों या नदियों के नाजुक जलागमों में मानवीय आवाजाही नियंत्रित की जाए। इस तरह गंगा तथा सहायक नदियों को न्यायिक सुरक्षा तथा संरक्षण देने की शुरुआत हुई है।
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यह निर्विवाद है कि गंगा, यमुना और काली-शारदा तथा सहायक नदियों ने मिट्टी, उर्वरता और पानी के माध्यम से उत्तरी भारत के बड़े हिस्से को जीवन दिया है। सर्वत्र इन्हीं विशिष्ट गुणों के कारण नदियां जीव प्रजातियों की माता तुल्य मानी जाती हैं। हर क्षेत्र/समाज के पास अपनी-अपनी गंगाएं होती हैं। हिमालय से निकलने के कारण गंगा तथा सहायक नदियों को एक अतिरिक्त पवित्रता तथा ग्लेशियरों के कारण निरतंरता मिल गई है। पर समाज तथा इसकी सरकारों ने इन नदियों के प्रवाह क्षेत्र में लगातार अतिक्रमण किया है। कहीं नहर, बसाहट, सड़क निर्माण किया, तो कहीं कूड़ा-कचरा, मल और उद्योगों का विसर्जन भी नदी में डाल दिया। जैसे नदियों की पवित्रता ही इनके प्रदूषण का कारण बन गई। ऊपर से नदियों में बड़े छोटे बांध और सुरंगें बनाकर जो जबर्दस्त अतिक्रमण हुआ, उसकी दिक्कतें हाल के दशकों में जलवायु परिवर्तन तथा इसके कारण अस्थिर, अनियमित हो गए मौसम ने बढ़ा दी हैं। नदियां कितनी विध्वंसकारी हो सकती हैं, यह सभी ने 2013 की महाआपदा में देखा, हालांकि उसकी गहरी पड़ताल नहीं हो पाई।

गंगा भारत की सबसे लंबी (2526 किलोमीटर), पवित्रतम और दुनिया की सर्वाधिक प्रदूषित दस नदियों में से एक है। गंगा का समग्र जलागम 8,61,404 वर्ग किलोमीटर में फैला है, जिसका लगभग 80 प्रतिशत भारत में है। यह जलागम पांच पारिस्थितिक क्षेत्रों, चार देशों तथा ग्यारह भारतीय प्रांतों में फैला है। गंगा बेसिन में 2011 की जनगणना के अनुसार, 53 करोड़ से अधिक जनसंख्या रहती है।

उत्तराखंड में गंगा और उसकी सहायक नदियों में छोटी-बड़ी कुल 98 बिजली योजनाएं चालू, 41 निर्माणाधीन तथा 197 प्रस्तावित हैं। मनेरी से देव प्रयाग के कुछ उपर तक भागीरथी (गंगा) नदी या तो सुरंगों से गुजरती है या झील में ठहर जाती है। गंगा, यमुना तथा शारदा का 80 प्रतिशत से अधिक पानी नहरों द्वारा निकाल लिया जाता है। विशाल पंचेश्वर बांध सहित अनेक परियोजनाओं का अंतिम सर्वेक्षण हो रहा है। इन पर इस फैसले का किस तरह का प्रभाव होगा, यह देखा जाना है।

दुनिया के अनेक देशों और समाजों ने अपनी नदियों को पुनर्जीवित करने के उदाहरण प्रस्तुत किए हैं। जहां राइन तथा टेम्स जैसी नदियां सरकार और समाज के सहयोग से प्रदूषण मुक्त हुईं, वहीं अमेरिका में ‘वाइल्ड ऐंड सिनिक रीवर ऐक्ट’ के जरिये अनेक नदियों को पुनर्जीवन मिला। हाल में ही 150 किलोमीटर से भी कम लंबी वांगनुई नदी को न्यूजीलैंड की संसद ने कानूनी मानवाधिकार दिया। नदियों को वैधानिक व्यक्ति का दर्जा मिलने के बाद सवाल है कि शासन और समाज किस तरह इसे सम्मान देंगे। ‘विकास पीड़ित’ मनुष्य नदियों में घुसपैठ करता रहा है-गरीब अपने अस्तित्व के लिए और संपन्न अपनी अय्याशी के लिए। सरकारें बड़े निगमों, बांध कंपनियों तथा खनन माफिया के आगे पस्त हैं।

नदियों की निर्मलता और अविरलता का सम्मान सर्वथा स्वागतयोग्य है, लेकिन जिस शासन और समाज की विकास-आकांक्षा और पद्धतियों ने नदियों की दयनीय हालत की, उन पर नियंत्रण, नियमन और न्यायिक निर्ममता को न्यायालय किस तरह लागू करेगा? नैनीताल शहर और नैनी झील के संरक्षण तथा सुरक्षा के लिए सर्वोच्च न्यायालय तथा स्वयं नैनीताल उच्च न्यायालय ने अनेक ऐतिहासिक फैसले दिए हैं, लेकिन आज इस शहर तथा झील की हालत देखकर पूछा जा सकता है कि क्या हम (शासन और समाज) न्यायालयों के आदेशों को पूरी तरह लागू करते हैं या उनका पालन करते हैं?
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