नौ दिनों तक देवी दुर्गा की पूजा के बाद विजयादशमी का त्योहार आता है। यह आश्विन महीने की शुक्ल पक्ष की दसवीं तिथि को हासिल की गई महत्वपूर्ण विजय का प्रतीक पर्व है। उस दिन राम ने दस मुख वाले रावण को हराया था, इसलिए यह दशहरा है। यह हमारी शक्ति और विजय, दोनों का उत्सव है। यह राम के विजय के साथ शक्ति की उपासना का भी पर्व है। राम हमारे मिथक पुरुष हैं और मिथक का ऐतिहासिक उपयोग भी होता है।
यह जो राम हैं, वह हमारी संस्कृति के प्रतीक इस अर्थ में हैं कि समय-समय पर उनका रूप विकसित या परिवर्तित होता रहा है। यानी हमारी संस्कृति में जो कुछ भी शक्तिशाली, जो कुछ भी शीलवान और जो कुछ भी सुंदर है, जिसे आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने शक्ति, शील और सौंदर्य का समष्टि रूप कहा है, राम उनके प्रतीक हैं। वाल्मीकि के राम वस्तुतः एक नायक की खोज हैं। वाल्मीकि रामायण शुरू ही इस सवाल से होता है कि क: नु अस्मिन् सांप्रतम् लोके' यानी इस समय इस लोक में नायक कौन है। हर युग यह सवाल पूछता है कि 'कः नु अस्मिन् सांप्रतम् लोके। इसलिए राम का जो व्यक्तित्व है, वह हर युग के इस प्रश्न का उत्तर है। वाल्मीकि के समय से लेकर भवभूति, तुलसीदास, निराला और मौजूदा समय में भी यह प्रश्न प्रासंगिक है कि हमारे समय का नायक कौन है।
बार-बार इसका जिक्र आता है कि राम बहुत ही जनप्रिय नायक हैं-राम: नाम जनै: श्रुत:। वह लोक में बहुत प्रसिद्ध हैं। हमारे पुराणों और मिथकों में वह पहले व्यक्ति हैं, जो उत्तर से लेकर दक्षिण तक अपनी जय यात्रा करते हैं। उन्होंने उत्तर और दक्षिण को आपस में जोड़ा। इस तरह वह पूरे भारत की अखंडता के प्रतीक हैं।
वाल्मीकि के राम जहां नायक की खोज हैं, वहीं भवभूति के राम करुणा के प्रतीक हैं। लेकिन तुलसी के राम इन सबसे अलग हैं। तुलसीदास राम के गुणों का बखान करते हुए कहते हैं कि वह पंगुओं के लिए हाथ-पांव हैं, अंधों के माई-बाप हैं, गरीब नवाज हैं, कुलहीन के कुल हैं, अनाथों के लिए नाथ हैं तथा निर्बल के बल राम हैं। इस दृष्टि से तुलसीदास के जो राम हैं, वह वंचितों, उपेक्षितों और असहायों की सहायता करने वाले दीनानाथ हैं। इसी कारण तुलसीदास 'दैहिक, देविक, भौतिक तापा' यानी हर तरह के संकटों-विपत्तियों को राम के भरोसे छोड़ देते हैं।
मगर एक अजीब बात है कि चाहे वाल्मीकि के राम हों, या भवभूति के, तुलसीदास के राम हों या निराला के, राम का जीवन हमेशा संघर्षमय रहा है। ऐसा संघर्षमय जीवन विष्णु के किसी अन्य अवतार का नहीं रहा है। जब हम राम को याद करते हैं, तब हमें उनका वनवास याद आता है, लेकिन कृष्ण को याद करने पर हमें उनकी रासलीला याद आती है। यह बात वाल्मीकि के राम भी कहते हैं कि जब मुझे राज्य मिल रहा था, तब वनवास मिल गया, वन में गया, तो वहां सीता का हरण हो गया, सीता को मुक्त कराने के लिए रावण से लड़ने गया, तो मेरा भाई लक्ष्मण मरणासन्न हो गया, वहां से जब लौटकर अयोध्या आया, तो फिर सीता का वियोग झेलना पड़ा। पता नहीं, मुझे किस जन्म के पाप का फल भोगना पड़ रहा है। वनवास के समय को छोड़ दें, तो पूरी रामकथा में कभी ऐसा होता ही नहीं कि सीता और राम सुखपूर्वक साथ में जीवन बिताते हों। राम के जीवन का यह संघर्ष भारतीय संस्कृति में विभिन्न रूपों में दिखाई देता है।
इस संघर्ष ने भवभूति के राम को करुणामय, तुलसी के राम को गरीब नवाज और निराला के राम को लोकनायक बना दिया। निराला के राम तो इतने पराजित-प्राय हैं कि जब वह रावण से लड़ने जाते हैं, तब उनका हथियार काम ही नहीं करता, क्योंकि शक्ति जो है, वह अन्याय (रावण) की तरफ है-'अन्याय जिधर है, उधर शक्ति'। उनके सामने सवाल है कि शक्ति को वापस अपने पास कैसे लाया जाए। तब जामवंत उन्हें सलाह देते हैं कि रावण जैसा अन्यायी अगर शक्ति की उपासना कर उसे अपने पक्ष में ला सकता है, तो आप तो धर्म के रक्षक हैं, आप शक्ति की उपासना कर उसे अपने पास क्यों नहीं ला सकते? तब राम शक्ति की उपासना करते हैं। निराला के राम साम्राज्यवादी अन्यायी के पास से शक्ति अपने पास लाने और देश को स्वतंत्र कराने के लिए शक्ति की उपासना करते हैं।
इस स्वतंत्र देश में शक्ति की उपासना का रूप क्या होना चाहिए? विजयादशमी का पर्व आज किस अर्थ में हमारे लिए सार्थक हो सकता है? इस पर विचार करते हैं, तो हमारा सिर शर्म से झुक जाता है। जिस शक्ति की नवरात्र में उपासना की जाती है, कन्याओं का पूजन किया जाता है, उस नारी शक्ति के खिलाफ रोज अपराध की खबरें पढ़-सुनकर मन खिन्न हो उठता है। राम ने जिस शक्ति की उपासना की, उस शक्ति स्वरूपा अबोध बालिकाओं, नारियों के साथ दुष्कर्म और दुर्व्यवहार की घटनाएं शर्मनाक हैं। ऐसी स्थिति में फिर से यह संकल्प लेना होगा कि हम अपनी बहन, बेटियों, माताओं की सुरक्षा सुनिश्चित करें और उनकी राह में बाधाएं खड़ी करने के बजाय उन्हें आगे बढ़ने का अवसर प्रदान करें। तभी विजयादशमी के पर्व की सार्थकता है। इस समय, इस लोक में हमारा नायक कौन है, जो हमें इन सबसे उबार सकता है? पर जो भी हमारा नायक होगा, उसे राम की तरह शक्ति, शील और सौंदर्य का समुच्चय होना पड़ेगा।