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पहाड़ों की रानी मसूरी: विकास के नाम पर प्रकृति से खिलवाड़ 

पंकज चतुर्वेदी Published by: पंकज चतुर्वेदी Updated Mon, 21 Jun 2021 03:43 AM IST
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मसूरी - फोटो : Facebook/House of Travel inc.

पहाड़ों की रानी कहलाने वाले मसूरी में विकास के नाम पर जो योजना बन रही है, वह कई मायनों में न केवल विचित्र है, बल्कि पहाड़ के लिए आफतों को न्योता भी है। मसूरी में सड़क जाम से बचने के लिए 2.74 किलोमीटर लंबी सुरंग के लिए 700 करोड़ रुपये मंजूर किए गए हैं। दूसरी तरफ राज्य के वन विभाग से लेकर सार्वजनिक निर्माण विभाग तक को इसकी कोई जानकारी नहीं है। मॉल रोड, मसूरी शहर और आईएएस अकादमी की ओर यातायात निर्बाध रखने के लिए प्रस्तावित सुरंग कहीं पहाड़ के पर्यावरणीय चक्र के लिए खतरा न बन जाए। वैसे मसूरी में सुरंग बनाए जाने के प्रयास पहले भी होते रहे हैं, लेकिन जन विरोध के चलते योजना रोकनी पड़ी थी। 



हिमालय भारत के लिए महज एक भौगोलिक संरचना नहीं है, बल्कि देश की जीवन रेखा है। नदियों का जल हो या मानसून की गति-सब कुछ हिमालय के पहाड़ तय करते हैं। यह दुनिया का युवा पहाड़ है और इसमें लगातार आंतरिक गतिविधियां होती रहती हैं। केदारनाथ त्रासदी से सबक न लेते हुए पहाड़ पर बेशुमार सड़कें बिछाने का जो दौर शुरू हुआ है, उससे आए दिन मलबा खिसकने, जंगल गायब होने जैसी त्रासदियां हो रही हैं। खासकर जलवायु परिवर्तन की मार से सर्वाधिक प्रभावित उत्तराखंड के पहाड़ जैसे अब अपना संयम खो रहे हैं।


देश को गंगा-यमुना जैसी सदानीरा नदियां देने वाले पहाड़ के करीब 12 हजार प्राकृतिक स्रोत या तो सूख चुके हैं या फिर सूखने के कगार पर हैं। ऐसे में बगैर किसी आकलन के महज यातायात के लिए हिमालय की छाती खोदना अनिष्टकारी त्रासदी का आमंत्रण प्रतीत होता है। यह एक ऐसे पहाड़ और वहां के लोगों को खतरे में धकेलने जैसा है, जिसे जोन-4 स्तर का अति भूकंपीय संवेदनशील इलाका कहा जाता है। सुरंग बनाने के लिए पेड़ भी काटे जाएंगे और हजारों जीवों के प्राकृतिक पर्यावास पर भी डाका डाला जाएगा। 


यह बात कई सरकारी रिपोर्टों में दर्ज है कि मसूरी के आसपास का इलाका भूस्खलन के मामले में बहुत संवेदनशील है। यहां की भूगर्भ संरचना में छेद करना या कोई निर्माण करना कहीं बड़े स्तर पर पहाड़ का मलबा न गिरा दे। वर्ष 2010 में मसूरी की आईएएस अकादमी ने एक शोध में बता दिया था कि मसूरी के संसाधनों पर दबाव सहने की क्षमता खत्म हो चुकी है। हिमालय की संवेदना से परिचित पर्यावरणविद मसूरी में सुरंग बनने को आत्महत्या बता रहे हैं, क्योंकि मसूरी के पास पहाड़ में बहुत बड़ी दरारें पहले से हैं। 


ऐसे में, यदि वहां भारी मशीनों से ड्रिलिंग हुई, तो परिणाम कितने भयावह होंगे, कोई नहीं कह सकता। इससे पहले वर्ष 2014 में लोक निर्माण विभाग ने बाईपास पर चार सुरंग बनाने का प्रस्ताव तैयार किया था, जिसमें कार्ट मैकेंजी रोड से कैंपटी फॉल तक सुरंग बनाने की योजना थी। लोंबार्डी इंडिया प्रा. लि. कंपनी ने जांच भी की थी, लेकिन पर्यावरणीय कारणों से वह परियोजना  शुरू नहीं की जा सकी थी। 


इन अनुभवों के बाद भी वर्ष 2020  में राज्य सरकार ने कोविड की पहली लहर के दौरान गुपचुप ढंग से सुरंग की योजना पर काम करना शुरू कर दिया था। उत्तराखंड में हिमालय की हर गतिविधि पर शोधरत संस्था वाडिया इंस्टीट्यूट ऑफ हिमालयन जियोलॉजी के वैज्ञानिक और भूस्खलन विशेषज्ञ डॉ. विक्रम गुप्ता का कहना है कि भू-स्खलन के प्रति अति संवेदनशील मसूरी और उसके करीबी पहाड़ों में बगैर किसी भूगर्भीय जांच-पड़ताल के ऐसी योजना बेहद चौंकाने वाली है। वह बताते हैं कि देहरादून-मसूरी के इलाके में चूने की चट्टानें हैं, जो सदियों से पानी को अवशोषित करती हैं और इन चट्टानों की अपनी पानी ग्रहण क्षमता होती है। ये चट्टानें कभी भी खिसकने लगती हैं और भूस्खलन की घटनाएं घट जाती हैं। इसलिए तमाम पहलुओं पर विचार करके इस सुरंग पर काम होना चाहिए। 


एक मोटा अनुमान है कि यदि यह योजना मूर्त रूप लेती है, तो ओक और देवदार जैसे करीब तीन हजार पेड़ कटेंगे, जिनकी उम्र कई दशक है और जो नैसर्गिक जंगल का हिस्सा हैं। थोड़ी भी पर्यावरणीय छेड़छाड़ बंदरपूंछ ग्लेशियर पर असर डालेगी और यह अकेले उत्तराखंड ही नहीं, देश के लिए भी भयावह होगा। 
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