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मिल्खा सिंह का संघर्ष: दिल्ली का प्लेटफॉर्म और रास्ता कहीं नहीं

मिल्खा सिंह Published by: मिल्खा सिंह Updated Sun, 20 Jun 2021 07:52 AM IST
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मिल्खा सिंह

महान एथलीट मिल्खा सिंह विभाजन के बाद बेहद विकट परिस्थितियों में भारत आए थे। किसी तरह जब वह ट्रेन से दिल्ली पहुंचे थे, तब उनके पास न पैसे थे और न वह यहां किसी को जानते थे। अपनी जीवनी, भाग मिल्खा भाग  में उन दिनों के संघर्ष को मार्मिक शब्दों में व्यक्त किया है। उनका स्मरण करते हुए हम यहां दे रहे हैं उनकी जीवनी का एक अंश :



फिरोजपुर ऐसे शरणार्थियों का अथाह समुद्र बन गया था, जो अपने परिचित चेहरों पति, पत्नी, बच्चों अथवा रिश्तेदारों को निराश होकर तलाश रहे थे। हम सभी एक ही नाव, जीवित बचे रहने की खोज अथवा आश्रय की तलाश, पर सवार थे। कुछ दिन लक्ष्यहीन घूमने के पश्चात मैं एक ऐसे टूटे-फूटे घर में पहुंचा, जो किसी मुस्लिम परिवार द्वारा छोड़ा गया था। हालांकि अब हमारे सिर पर छत थी, लेकिन हम दो लोगों के लिए पर्याप्त भोजन की तलाश हमारे लिए अब भी असंभव कार्य था; लेकिन इन परिस्थितियों में पैसों की कमी ने मुझे अपनी आवश्यकताओं को पूरा करने हेतु उपाय करने में कुशल बना दिया था। मैं सेना के बैरक में बार-बार जाता। वहां मैं सिपाहियों के लिए जूते पॉलिश करने अथवा घर के छोटे मोटे काम किया करता था, जिसके बदले में वे मुझे बची हुई या बासी दाल और रोटी देते, जिसे लेकर मैं घर आता और जीत के साथ बांटकर खाता।


हमारा भाई मक्खन के साथ कोई संपर्क नहीं रह गया था, जो अब भी अपनी रेजीमेंट के साथ पाकिस्तान में था। लेकिन हमारे पास इस बात की चिंता करने का समय नहीं था। हमारे सामने और भी समस्याएं थीं। अगस्त माह के अंत में सतलुज नदी में, जो कि फिरोजपुर से होकर गुजरती थी, जबर्दस्त उफान के साथ बाढ़ आ गई और शहर विनाशकारी बाढ़ में बह गया। जीत (मक्खन की पत्नी और मिल्खा सिंह की बहन इशर की ननद) और मैंने अपनी जान एक जलमग्न घर की छत पर चढ़कर बचाई; लेकिन हमारे पास जो कुछ भी थोड़ा-बहुत सामान था, सब पानी के साथ बह गया। तब तक मैं फिरोजपुर में भरपूर तकलीफें झेल चुका था और वहां से निकलने तथा दिल्ली का रुख करने के लिए बेताब था। वहां के बारे में सुना था कि वहां काम ढूंढना आसान है। एक-दूसरे से चिपककर ठसाठस भरे वाहन के माध्यम से हम बाढ़ के पानी से गुजरकर रेलवे स्टेशन की ओर बढ़े।


एक बार फिर अथाह मानव समुद्र हमारे आसपास था। स्टेशन पर लोगों की भीड़ जो दिशाहीन होने के कारण इधर-उधर घूम रही थी, के कारण अराजकता फैली हुई थी। मेरी प्राथमिकता दिल्ली पहुंचना था; लेकिन ट्रेन में इतनी अधिक भीड़ थी कि उसमें बैठने के लिए सीट पाना असंभव था। सौभाग्यवश जीत महिलाओं के आरक्षित डिब्बे में चढ़ने में कामयाब हो गई। लेकिन मुझे केवल छत पर ही जगह मिल पाई। रेल के डिब्बे की छत पर होने के कारण मैं लोगों के उस बड़े कारवां को देख सकता था, जिसमें पुरुष, महिलाएं और बच्चे शामिल थे। उनमें कुछ लोग पैदल, कुछ बैलगाड़ी, साइकिल अथवा किसी अन्य साधन से भारत या पाकिस्तान की ओर बढ़ रहे थे। वह हृदय विदारक दृश्य था। व्यापक स्तर पर ऐसे लोगों का पलायन जो अपने सगे संबंधियों घरों और परिवारों को खो चुके थे, इतिहास की सबसे बड़ी त्रासदियों में से एक था।


एक बार जब हम पुरानी दिल्ली रेलवे स्टेशन पहुंच गए, तो हम भी उन हजारों शरणार्थियों की तरह ही थे, जो प्लेटफार्म पर खड़े थे, जिन्हें अपने बारे में, कहां जाना है, क्या करना है कोई जानकारी नहीं थी। हमारे पास न तो पैसा था और न ही हम वहां पर किसी को जानते थे, इसलिए मैं काम ढूंढने के लिए कुछ लड़कों के एक समूह में शामिल हो गया। लेकिन जल्द ही यह जान गए कि अस्थिरता के उन दिनों में लोग शरणार्थी लोगों को काम पर रखते समय बहुत अधिक सावधानी रखते थे। अंततः मुझे अजमेरी गेट पर एक दुकान में साफ-सफाई करने का काम मिला, जहां मुझे दस रुपये वेतन मिलता था। जीत और मैंने रेलवे स्टेशन पर अराजकता से भरे कुछ दिन बिताए, जहां पर हम अन्य बेघर लोगों के साथ घुल-मिलकर रहते थे। हम लोग हमेशा ही इस बात को लेकर डरे रहते थे कि आगे हमारा क्या होगा, हम कहां जाएंगे।


मुझे अब भी स्पष्ट रूप से याद है कि उन दिनों लोग कितना हताश हो चुके थे और भुखमरी इतनी जबर्दस्त थी कि धर्मार्थ ट्रस्ट द्वारा बांटे जाने वाले मुफ्त खाने को झपटने के लिए लोग टूट पड़ते थे। उस दौरान मुझे पता चला कि मेरी बहन इशर, उसके पति और परिवार उस विध्वंस में बच गए हैं और शाहदरा में रहते हैं। जब हम उनके घर पहुंचे, तो परिवार का पुनर्मिलन आंसुओं भरा और मर्मस्पर्शी था। हालांकि मेरी यह खुशी कुछ दिनों के लिए ही थी। मैंने देखा कि उस घर में मेरी बहन के साथ बुरा व्यवहार किया जाता है। मेरी बेचारी बहन उस घर में बिना तनख्वाह की नौकरानी की तरह काम करती थी। जैसे-जैसे दिन बीते, जल्द ही मुझे यह अहसास हो गया कि उस परिवार को मेरा वहां रहना जरा भी नहीं भाता। जीत का परिवार मुझे यह कहकर ताना देता और मेरी हंसी उड़ाता कि मैं बेकार हूं और एक ऐसा व्यक्ति हूं, जो किसी काम का नहीं, जो सारा दिन सिर्फ खाली बैठ सकता है और उनका अनाज खा सकता है। मैं उस अवस्था तक पहुंच गया था, जब मुझे दिन में बस एक बार खाना दिया जाता था। उस समय मुझे अपनी मां की बहुत याद आती कि किस प्रकार वे घर में जो कुछ भी थोड़ी वस्तुएं उपलब्ध होतीं, उनसे ही अपने पति और बच्चों और बड़े परिवार को खाना खिलातीं। इशर मुझे चुपके से रोटी दे देती।


उसी समय हम लोगों ने यह सुना था कि मक्खन और उसकी सेना की टुकड़ी वापस भारत आ गई। अब भी मुझे उम्मीद थी कि एक बार फिर मैं सारी चिंताओं से मुक्त हो रेल के पीछे दौड़ते पतंग उड़ाता या अपने दोस्तों के साथ हंसी और मजाक करता हुआ आजाद पक्षी बनूंगा...।

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