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तमिलनाडु की सियासत: अभी खत्म नहीं हुआ है शशिकला का खेल

आर राजगोपालन Published by: आर. राजगोपालन Updated Sat, 06 Mar 2021 04:26 AM IST
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Sasikala - फोटो : ANI

जिन शशिकला के कभी पूरे तमिलनाडु में जलवे थे, जो जयललिता के बाद दूसरे स्थान पर थीं और अन्नाद्रमुक जिनके इशारे पर चलता था, वैसी कद्दावर शख्सीयत के अचानक राजनीति से संन्यास लेने की बात क्यों हो रही है? हालांकि कोरोना से उबरने के बावजूद वह अस्वस्थ हैं तथा विभिन्न अदालतों में उनके खिलाफ 25-30 मुकदमे हैं। रिश्तेदार भी उनके लिए बाधाएं खड़ी कर रहे हैं। शशिकला और उनके भतीजे टीटीवी दिनाकरण को जिन वजहों से पूर्व मुख्यमंत्री जयललिता के बंगले से बाहर रखा गया था, इस बारे में लोगों को पता है। लेकिन जयललिता सिर्फ शशिकला को अपने बंगले में लौटा लाई थीं, दिनाकरण को नहीं। यह भी दिलचस्प है कि जयललिता की मृत्यु के बाद एएमएमके नाम से अलग पार्टी बनाने वाले दिनाकरण थे और तब भाजपा ने दिनाकरण को समर्थन दिया था।



अगर आप तमिल राजनीति को आसानी से समझना चाहते हैं, तो इन चार जातियों के बारे में जानकारी रखनी होगी-गोउंडर, थेवर, नाडार और वन्नियर। थेवर जाति की शशिकला की जयललिता के दौर में तूती बोलती थी। मौजूदा मुख्यमंत्री ई पलानीस्वामी गोउंडर जाति से आते हैं। ये चारों जातियां मिलकर शेष तीन जातियों पर हावी होना चाहती हैं। बिहार और उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों की तरह तमिलनाडु में भी जाति बोध बहुत प्रबल है और दूरस्थ ग्रामीण इलाकों में ऊंची और नीची जातियों के बीच चौड़ी खाई है। तमिलनाडु के इन जातिगत समीकरणों से जुड़ी तमाम जानकारियां केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह के पास उपलब्ध हैं, जो सोशल इंजीनियरिंग के मास्टर माने जाते हैं। अपने तमिलनाडु दौरे में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने संविधान में संशोधन करके राज्य के एक और प्रभावशाली समुदाय देवेंद्र कुला बेलालर को कानूनी दर्जा देने की घोषणा की है। प्रधानमंत्री की इस घोषणा ने भाजपा को बहुत ताकत दी है। 


जातिगत राजनीति के बाद जेल से शशिकला की रिहाई पर ध्यान केंद्रित करते हैं। विगत 27 जनवरी को आधिकारिक रूप से शशिकला जेल से रिहा हुईं। उसके बाद अपनी ताकत का प्रदर्शन करने के लिए आठ फरवरी को उन्होंने बंगलूरू से चेन्नई तक विशाल रोड शो किया। उस यात्रा के दौरान उन्होंने अपने समर्थकों से कहा कि वह बेहद गंभीरता के साथ राजनीति से जुड़ेंगी। जेल से छूटने के एक सप्ताह बाद टीनगर स्थित अपने आवास में समर्थकों तथा राजनेताओं से मुलाकात के दौरान उन्होंने पूर्व मुख्यमंत्री जयललिता के उन आदर्शों को अपने जीवन में उतारने के लिए कहा, जिनके लिए उन्होंने लड़ाई लड़ी थी। अन्नाद्रमुक द्वारा पार्टी महासचिव पद से हटा दिए जाने के फैसले को उन्होंने अदालत में चुनौती दी। बेशक उनके चुनाव लड़ने पर छह साल का प्रतिबंध है, लेकिन विधानसभा चुनाव से ठीक पहले उनके जेल से छूटने का असर तो तमिलनाडु की चुनावी राजनीति पर पड़ेगा ही।


राजनीति से अलग होने का शशिकला का फैसला इस रिपोर्ट के ठीक बाद आया है कि भाजपा दिनाकरण की पार्टी का अन्नाद्रमुक में विलय कराने की कोशिश कर रही है। अलबत्ता मुख्यमंत्री पलानीस्वामी ने अपने गठबंधन में शशिकला और दिनाकरण को शामिल करने की संभावना खारिज कर दी है। विगत 24 फरवरी को यानी जयललिता की जयंती पर शशिकला सार्वजनिक तौर पर आखिरी बार दिखी थीं। उस अवसर पर उन्होंने कहा था, 'जयललिता के समर्थकों को एकजुट होना चाहिए, और उनके उस लक्ष्य को साकार करने की दिशा में काम करना चाहिए, जिसमें उन्होंने कहा था कि अन्नाद्रमुक को राज्य में सौ साल शासन करना चाहिए। हमें उनका यह लक्ष्य हमेशा याद रखना चाहिए। अन्नाद्रमुक के हर काडर को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि पार्टी जीते और हम सरकार बनाएं। मुझे विश्वास है कि हम ऐसा कर पाएंगे, क्योंकि आप सब जयललिता के सच्चे समर्थक हैं। आप वह लक्ष्य साकार कर सकते हैं। जल्दी ही मैं लोगों और अपने पार्टी कार्यकर्ताओं से मिलूंगी।'


जहां दिनाकरण का यह कहना था कि वह किसी के साथ गठबंधन के लिए तभी तैयार होंगे, जब खुद वह भी नेतृत्वकारी भूमिका में हों, वहीं अन्नाद्रमुक ने जहां यह स्पष्ट कर दिया है कि वह शशिकला और दिनाकरण को पार्टी में नहीं चाहते। पार्टी ने अपने कार्यकर्ताओं को साफ कह दिया था कि वे शशिकला से न मिलें। शशिकला को पार्टी के झंडे का इस्तेमाल न करने के लिए भी उसने कहा। इसके बावजूद शशिकला जिस वाहन से चेन्नई पहुंचीं, उस पर पार्टी का झंडा लगा हुआ था। लेकिन अन्नाद्रमुक अगर पलानीस्वामी और पन्नीरसेलवम के नेतृत्व में विधानसभा का चुनाव हार जाता है, तब शशिकला की राजनीति में वापसी तय है। जहां तक मुख्य विपक्षी दल द्रमुक की बात है, तो यह एक काडर आधारित पार्टी है। लेकिन राज्य की राजनीति में कमोबेश पैठ बनाने के बाद भाजपा द्रमुक की हिंदू-विरोधी छवि बनाने की कोशिश कर रही है। द्रमुक के काडर अनीश्वरवादी हैं, वे राम या कृष्ण में विश्वास नहीं करते और सिर्फ अल्पसंख्यकों का समर्थन करते हैं। जबकि कांग्रेस 1967 में राज्य की सत्ता से बाहर होने के बाद द्रमुक की छोटी सहयोगी रह गई है। सत्तारूढ़ अन्नाद्रमुक के बारे में अच्छी बात यह है कि दस साल सत्ता में रहने के बावजूद उसके खिलाफ सत्ता-विरोधी लहर नहीं है। जयललिता के निधन के बाद पलानीस्वामी-पन्नीरसेलवम की जोड़ी ने पिछले चार साल में कॉलेज के छात्रों को 2 जीबी का मुफ्त डाटा कार्ड तथा किसानों को राहत देने जैसे कई सामाजिक कदम उठाए हैं। राज्य के समुद्र तटीय इलाके जब तूफान से ध्वस्त हुए, तो पलानीस्वामी के नेतृत्व में तेजी से पुनर्वास कार्य हुआ।


भाजपा धीरे-धीरे तमिलनाडु में अपनी पैठ बना रही है और वोट शेयर के मामले में कांग्रेस को पछाड़कर तीसरे स्थान पर पहुंच गई है। अनुसूचित जाति के डॉ. एल मुरुगन को राज्य भाजपा अध्यक्ष बनाने से भी भाजपा के प्रति माहौल अनुकूल हुआ है। भाजपा द्वारा दबाव बनाने से द्रमुक नेताओं को अब मंदिरों के चक्कर लगाने पड़ रहे हैं, जो उनमें आया एक बड़ा बदलाव है। राज्य के आठ लाख मतदाता ऐसे हैं, जो पहली बार वोट डालेंगे और जो द्रविड़ परंपरा के बारे में नहीं जानते। भाजपा को इन्हीं से उम्मीद है।

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