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अंतरिक्ष है आखिरी मोर्चा, इसरो ने जोड़ा सफलता का नया अध्याय 

प्रशांत दीक्षित Published by: प्रशांत दीक्षित Updated Fri, 05 Mar 2021 05:21 AM IST
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इसरो... - फोटो : twitter

अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा के अंतरिक्ष यान पर्सिवेरेंस के विगत 18 फरवरी को मंगल ग्रह की सतह पर सफलतापूर्वक उतरने के बाद वैश्विक अंतरिक्ष परिदृश्य पर तेजी से ध्यान केंद्रित हुआ है। हमने पहले ही देखा है कि अंतरिक्ष में काम करने वाले दुनिया के कई देश और यहां तक कि जो भविष्य में ऐसा करने की आकांक्षा रखते हैं, वे अमेरिका का अनुसरण करते हुए खुद अपना अंतरिक्ष बल तैयार कर रहे हैं। दिसंबर 2019 में अमेरिकी अंतरिक्ष बल राष्ट्र के उपग्रहों और अन्य अंतरिक्ष संपत्तियों की रक्षा करने के इरादे से अस्तित्व में आया, जिसे उसकी राष्ट्रीय सुरक्षा की रक्षा के लिए महत्वपूर्ण माना गया। उसके बाद फ्रांस, कनाडा और जापान ने इसका अनुकरण किया, हालांकि रूस और चीन में पहले से ही कई संगठन हैं, जो यह भूमिका निभाते हैं। हालांकि भारत ने छोटे कदम उठाए और उसी वर्ष एक अंतरिक्ष रक्षा एजेंसी की स्थापना की।



दूसरी ओर जब भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) के मंगलयान ने 24 सितंबर, 2014 को मंगल ग्रह की कक्षा में प्रवेश किया, तब भारत अपने पहले ही प्रयास में सफलतापूर्वक मंगल पर अंतरिक्ष यान भेजने वाला दुनिया का पहला देश बन गया। इस तरह से इसरो सोवियत अंतरिक्ष कार्यक्रम, अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा और यूरोपीय अंतरिक्ष एजेंसी के बाद मंगल पर यान भेजने वाली चौथी अंतरिक्ष एजेंसी बन गया। पांच नवंबर, 2013 को मार्स ऑर्बिटर मिशन (एमओएम) के प्रक्षेपण की योजना बनाने का निर्णय महत्वपूर्ण था, क्योंकि इसका प्रक्षेपण कम शक्तिशाली पीएसएलवी रॉकेट सी-25 के जरिये होना था। मूल योजना में इसरो ने अपने नए जीएसएलवी पर मार्स ऑर्बिटर मिशन की लान्चिंग की योजना बनाई थी, लेकिन जीएसएलवी चूंकि 2010 में दो अंतरिक्ष अभियानों में विफल रहा था, इसलिए योजनाकार इसके क्रायोजेनिक इंजन के बारे में अनिश्चित थे, और वे रॉकेट के नए बैच के लिए इंतजार नहीं करना चाहते थे, क्योंकि इससे मार्स ऑर्बिटर मिशन (एमओएम) परियोजना में कम से कम तीन साल की देरी होती। ऐसे में यही विकल्प था कि या तो मार्स ऑर्बिटर मिशन में देरी की जाए अथवा कम शक्तिशाली  पीएसएलवी का उपयोग किया जाए। उन्होंने यह जानते हुए भी पीएसएलवी का विकल्प चुना कि पीएसएलवी के साथ मंगल ग्रह के लिए सीधे प्रक्षेप पथ पर लॉन्च करना असंभव था, क्योंकि इसमें अपेक्षित शक्ति नहीं थी।


इसके बजाय, इसरो ने पहले इसे पृथ्वी की कक्षा में लॉन्च किया, फिर अंतरिक्ष यान ने खुद की क्षमता बढ़ाते हुए, जिससे कि ईंधन का कम से कम इस्तेमाल सुलभ हो; जिसे ऑबर्थ इफेक्ट कहते हैं, इसे ग्रहों के प्रक्षेप पथ में आगे बढ़ाया। अंतरिक्ष यानिकी में ऑबर्थ इफेक्ट की व्याख्या इस तरह से की गई है कि उच्च गति पर यात्रा करते समय रॉकेट इंजन कम गति पर यात्रा की तुलना में ज्यादा उपयोगी ऊर्जा उत्पन्न करता है। मंगल अभियान की छाया में हमें नहीं भूलना चाहिए कि चांद की सतह की खोज के लिए इसरो ने अक्तूबर, 2008 में चंद्रयान-1 लॉन्च किया था, जो अगस्त, 2009 तक सक्रिय था। अंतरिक्ष यान ने तब पीएसएलवी-एक्सएल रॉकेट का इस्तेमाल किया था। उस समय भी भारत चांद पर अपना झंडा फहराने वाला दुनिया का चौथा देश बना था। महत्वपूर्ण तथ्य यह भी है कि चंद्र मिशन में इसरो के पांच और दूसरे देशों की अंतरिक्ष एजेंसियों के छह पेलोड लगे थे, जिनमें नासा, यूरोपीय एजेंसी और बुल्गारिया की एजेंसियां शामिल थीं और ये सभी पेलोड मुफ्त थे।


खुद आगे बढ़ते हुए दूसरे देशों को साथ ले चलने का यह वही शानदार सपना था, जो पूर्व प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू ने 1961 में एक अंतरिक्ष संगठन केंद्र की स्थापना करते हुए देखा था। सात नवंबर, 2020 तक भारत 34 विभिन्न देशों के कुल 328 उपग्रहों की लान्चिंग कर चुका है। विगत 28 फरवरी को इसरो द्वारा किए गए प्रक्षेपण ने इसकी गरिमा में एक और नया अध्याय जोड़ा है, जब इसने श्रीहरिकोटा रेंज से ब्राजील के उपग्रह अमेजोनिया-1 और अन्य 18 उपग्रहों को भू-समकालिक कक्षा में छोड़ा। हालांकि 27 मार्च, 2019 को भारत ने जब सफलतापूर्वक एंटी-सैटेलाइट का परीक्षण किया था, तब भारत की प्रशंसा और आलोचना दोनों हुई थी, क्योंकि मलबे के कुछ टुकड़े उच्चतम ऊंचाई पर पहुंच गए थे और जो सरकार द्वारा किए गए दावे के विपरीत ज्यादा समय तक वहां रहेंगे। इस परीक्षण के लिए काइनेटिक किल व्हीकल का उपयोग किया गया था, जिसके कारण यह देश के साथ विदेशियों की भी नजर में आया। इसने भारत के लिए अपना उद्देश्य पहले ही पूरा कर दिया। मनोहर पर्रिकर रक्षा अध्ययन एवं विश्लेषण संस्थान के अंतरिक्ष टिप्पणीकार अजय लेले ने इसे अच्छी तरह समझाया है, 'इस बात की संभावना नहीं है कि भारत अंतरिक्ष में कभी हथियार ले जाएगा। भारत का परीक्षण संदेश भेजने और निवारक क्षमता तथा इसकी अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी क्षमताओं के प्रदर्शन के बारे में प्रतीत होता है। अब भारत को विश्व स्तर पर स्वीकार्य, सत्यापन योग्य और कानूनी रूप से बाध्यकारी अंतरिक्ष संधि तंत्र के निर्माण के लिए एक बहस शुरू करने और इसके लिए प्रतिबद्ध देशों को समझाने की दिशा में पहल करने की आवश्यकता है।'


संभवतः एक व्यावहारिक और ज्यादा मानवीय अंतरिक्ष समझौता तैयार करने का वक्त आ गया है, जिसमें भारत अपने संस्थापक पिताओं के दर्शन की गहरी छाप छोड़ेगा। इसके साथ ही, भारत के लिए यह महसूस करना महत्वपूर्ण है कि यह परीक्षण कर उसने सैन्य अंतरिक्ष क्षेत्र में अपने रणनीतिक रुख को फिर से परिभाषित किया है। एंटी-सैटेलाइट परीक्षण इस प्रक्रिया की शुरुआत है, अंत नहीं। जैसा कि हम देखते हैं, भारत के दो परस्पर जुड़े हुए और प्रशंसनीय उद्देश्य हैं। पहला है, अंतरिक्ष बल संरचना के गठन को बढ़ावा देना और दूसरा है, रणनीतिक रूप से संतुलन बनाने वाली अंतरिक्ष संधि की दिशा में प्रयास करना। -लेखक रणनीतिक मामलों के टिप्पणीकार हैं। 

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