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बाजारवाद के दौर में मीडिया

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मीडिया की भूमिका पर आज से पहले सार्वजनिक रूप से या संगोष्ठियों में कम ही चर्चा की जाती थी, लेकिन आज मीडिया विमर्श विधिवत एक नए विषय के रूप में हमारे सामने है। युवा पत्रकार उमेश चतुर्वेदी की नई पुस्तक ‘बाजारवाद के दौर में मीडिया’ इस नए  विषय को बेहद ही सधे अंदाज में हमारे सामने लाती है। यह किताब उनके   द्वारा समय-समय पर मीडिया की भूमिका और उसकी खामियों को लेकर लिखे गए करीब तीन दर्जन लेखों का संग्रह है।
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वास्तव में मीडिया का कार्य है कि वह जनता और हुक्मरान दोनों के ही सामने सच की तस्वीर लाए। मीडिया निष्पक्ष व निर्भीक तरीके से कार्य करे, न कि निर्णायक तरीके से। आज के परिदृश्य में हो यह रहा है कि मीडिया अपनी निर्णायक भूमिका में नजर आ रहा है। किसी भी प्रकरण में मीडिया तथ्यों को इस तरीके से पेश करता है कि जैसे मीडिया, मीडिया न होकर कोई अदालत हो। पुस्तक में शामिल कई लेखों में मीडिया की गहराई और तटस्थता के साथ निरपेक्ष रहकर लेखक ने पड़ताल की है। मसलन उदारीकरण, तमाशा कल्चर और हिंदी के खबरिया चैनल लेख में वे हिंदी के समाचार चैनलों में खबरों की प्रस्तुति के पीछे के तथ्यों पर प्रकाश डालते हैं, जहां जनसरोकार से जुड़ी खबरें गायब हैं।

उदाहरण के लिए किसानों की आत्महत्या की खबर टीआरपी की परिभाषा में दबकर रह जाती है। दूसरी ओर खबरों की प्रस्तुति में कंटेंट पर कम और एंकर की खूबसूरती पर ज्यादा जोर दिया जाने लगा। उनके कई लेखों का निष्कर्ष वैचारिक है कि पत्रकारिता में घुटन बहुत है, प्रतिभा के लिए जगह नहीं है, बहुत क्रांतिकारी पत्रकार की किसी को जरूरत नहीं है। उमेश मीडिया और साहित्य के रिश्ते, मीडिया में भ्रष्टाचार, चुनावों में मीडिया मैनेजमेंट, स्टिंग पत्रकारिता से लेकर गिफ्ट के खेल के पीछे की पत्रकारिता और हिंदी ब्लॉगिंग की समस्याओं तक पर जमकर कलम चलाते हैं।
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लेखक चूंकि एक लंबे अरसे से प्रिंट मीडिया और टीवी पत्रकारिता से जुड़े हुए हैं, जाहिर है मीडिया की कारगुजारियों पर लगातार पैनी नजर रखना उनकी सजग-सचेत अध्ययनशील आदत का हिस्सा है। आज से करीब बीस साल पहले बहुत कम लोग मीडिया पर किसी किस्म की कोई बहस उठाया करते थे। मीडिया पर कहीं भी किसी भी दृष्टि से विमर्श कम ही किया जाता था। आज मीडिया विमर्श के इस दौर में उमेश चतुर्वेदी की किताब मीडिया अध्ययनकर्ताओं के लिए उपयोगी और मीडिया के वर्तमान का शानदार खाका खींचती है।                 

बाजारवाद के दौर में मीडिया
लेखक-उमेश चतुर्वेदी
प्रकाशक- वाग्देवी प्रकाशन, बीकानेर  मूल्य- 220 रुपए      

शब्दों में गंगा-जमुनी तहजीब
"मैं राम का वंशज, रहीम का बेटा हूं..." `पानी पर लिखी इबारत’ कहानी के मुख्य किरदार का दादा जब ये शब्द कहता है, तो मानो देश की गंगा-जमुनी संस्कृति को नया सुर दे देता है। फैजाबाद-बहराइच से लेकर लखनऊ होते हुए सीतापुर-लखीमपुर तक जो मिली-जुली संस्कृति अवध के गांव-गांव में जीवंत है, उसे अपनी कहानियों के माध्यम से बड़े कैनवस पर उतारने का काम कर रहे हैं कथाकार नसीम साकेती। इस नए कहानी संग्रह `पानी पर लिखी इबारत’ में `पान’ कहानी के जरिए वे जहां मुसलमान नटों में बचपन में ही लड़के-लड़की की शादी तय होने की कुप्रथा पर चोट करते हैं, वहीं महिला नाई के जरिए गांव की औरतों का एक अलग हिम्मती चेहरा सामने लाते हैं।  कभी `भात’ कहानी के माध्यम से गांव के मजदूर और दलित परिवारों के सामने अपनी छोटी सी खुशी को सेलिब्रेट करने के साधन न होने का दर्द है, तो कहीं `नाबदान की ईंट’ के जरिए कठमुल्लावाद पर चोट। इस कहानी संग्रह की खासियत है कि हर कहानी के पात्र भले ही काल्पनिक हैं, लेकिन स्थान वास्तविक हैं। `अफवाह’ कहानी दंगों के पीछे के कारण तलाशती नजर आती है, तो `आखिरी बस’ देश के बंटवारे की टीस को सामने लाती है। सोलह लघु कहानियों का ये संग्रह कुछ वजहों से तल्ख होते आज के माहौल में मिलजुल कर सुकून से जीने की राह दिखाता है।
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पानी पर लिखी इबारत
लेखक-नसीम साकेती
प्रकाशक- साहित्य भंडार, इलाहाबाद
मूल्य- 50 रुपए
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