जनवरी, 2022 में चीनी विदेश मंत्री की मालदीव यात्रा के दौरान पांच समझौतों पर हस्ताक्षर किए गए थे, जिन्हें मुइज्जू के शासन काल में बढ़ावा मिलेगा। माले पर चीन के पिछले ऋणों का 1.4 अरब डॉलर बकाया है, जिसे मालदीव की नाजुक अर्थव्यवस्था पर दबाव कम करने के लिए पुनर्गठित किया जा सकता है।
विश्लेषकों का मानना है कि मुइज्जू के राष्ट्रपति बनने के बाद अब क्षेत्र की भावी गतिशीलता पर असर पड़ना तय है, क्योंकि मुइज्जू ने चीनी समर्थक एवं 'इंडिया आउट' के मुद्दे पर चुनाव प्रचार किया था, इसलिए भारत बेहतर रिश्तों की उम्मीद नहीं कर सकता। भारत ने मालदीव के साथ व्यापार का विस्तार किया है और 2018 के बाद से कई परियोजनाएं शुरू की हैं, जब सोलिह राष्ट्रपति बने थे। मुइज्जू की पार्टी पीपुल्स नेशन कांग्रेस को भारी चीन समर्थक समझा जाता है, जिसने भारतीय सैनिकों की वापसी और भारत के पक्ष में झुके द्विपक्षीय व्यापार में संतुलन सुनिश्चित करने का वादा किया है।
मालदीव हिंद महासागर में 1,200 द्वीपों का एक समूह है, जो पूर्व और पश्चिम के बीच मुख्य समुद्री मार्ग है। मुइज्जू ने कनिष्ठ भारतीय सैन्यकर्मियों और सेना की निगरानी विमानों को वापस भेजने का वादा किया था, जो चीनी मौजूदगी के लिए जगह बनाएगा। इसके अलावा, चीन की समुद्री और नौवहन गतिविधियों की निगरानी के साथ मालदीव के किनारे महत्वपूर्ण संचार के समुद्री मार्ग (एसएलओसी) के लिए किया गया मालदीव-भारत रक्षा सहयोग से संबंधित समझौता खतरे में पड़ सकता है, क्योंकि चीन मुइज्जू के शासन में इसे खत्म करना चाहेगा।
चीन के स्ट्रिंग्स ऑफ पर्ल्स (वैसा क्षेत्र, जहां चीन अपने अड्डे विकसित कर रहा है) में मालदीव के शामिल होने से उस देश में चीन की मौजूदगी और मजबूत हो जाएगी। गौरतलब है कि चीन का भू-राजनीतिक प्रभाव या सैन्य अस्तित्व हन्नान द्वीप से ग्वादर तक फैला हुआ है। मालदीव भारत से सौदेबाजी करने के लिए चीनी कार्ड का इस्तेमाल करता है, लेकिन नए राष्ट्रपति भारत-चीन संबंधों को नया आयाम देने के लिए ड्रैगन की सीधी भागीदारी की अनुमति दे सकते हैं।
एसएलओसी (सी लेन्स ऑफ कम्युनिकेशन) का भविष्य अनिश्चित है, लेकिन ये पश्चिम एशिया में अदन की खाड़ी और होर्मुज खाड़ी के साथ दक्षिण पूर्व एशिया में मलक्का जलडमरूमध्य के बीच समुद्री व्यापार के लिहाज से भारत के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि भारत का 50 फीसदी व्यापार और 80 फीसदी ऊर्जा आयात अरब सागर में इन्हीं एसएलओसी से होकर गुजरता है।
वर्ष 2022-23 के दौरान मालदीव को भारत का कुल निर्यात 47.67 करोड़ डॉलर से अधिक हो गया, जो नई व्यवस्था में घटेगा ही। 2018 में जब सोलिह ने सत्ता संभाली, तो भारत ने 1.4 अरब डॉलर देने का वादा किया था, लेकिन मुइज्जू चीनी ऋण नीति को प्राथमिकता दे सकते हैं, जिसने पहले ही पाकिस्तान जैसे कई गरीब देशों की अर्थव्यवस्था को नष्ट कर दिया है। यदि मुइज्जू भारत के साथ तनावपूर्ण संबंध का विकल्प चुनते हैं और चीन की ओर झुकाव दिखाते हैं, तो उसका पर्यटन क्षेत्र प्रभावित होगा, जिसमें 23 फीसदी हिस्सेदारी भारतीय पर्यटकों की है। मालदीव की 74 फीसदी जीडीपी पर्यटन उद्योग से उत्पन्न संसाधनों पर निर्भर करती है, इसलिए उसे भारत-चीन प्रतिद्वंद्विता से बचना होगा।
महज 298 वर्ग किलोमीटर क्षेत्रफल और लगभग 5.57 लाख की आबादी के साथ मालदीव दुनिया का सबसे अलग-थलग देश है, लेकिन इसकी भू-राजनीतिक क्षमता भारत और चीन जैसे बड़े देशों को भी मात दे सकती है। मालदीव में राष्ट्रपति चुनाव का पूरा अभियान चीन समर्थक और भारत विरोधी नारों के इर्द-गिर्द चलता रहा, जिससे मौजूदा समीकरण बिगड़ सकता है और उसका सीधा असर एशिया पर पड़ेगा।
मालदीव के सवालों का जवाब देते हुए विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता अरिंदम बागची ने कहा, 'पिछले पांच वर्षों में हमारे कर्मियों ने इलाज के लिए अभियान चलाकर लोगों को निकाला, जिससे मालदीव के 523 लोगों की जान बचाई गई है। इसी तरह, मालदीव की समुद्री सुरक्षा के लिए भी 450 से अधिक बहुआयामी मिशन चलाए गए। भारत कोविड सहित किसी भी आपदा में मालदीव के लोगों की मदद में सबसे आगे रहा है।' पूर्व राजनयिकों का मानना है कि भारत को मौजूदा विदेश नीति में बदलाव करना होगा, ताकि मालदीव में नए शासन के साथ काम करने के लिए बाहरी परिस्थितियों को महत्व दिया जा सके।
वर्ष 1966 में स्वतंत्रता प्राप्त करने के बाद अमेरिका ने मालदीव को मान्यता दी और दोनों देशों के बीच संबंधों को मजबूत करने की प्रक्रिया आज भी जारी है। लेकिन अगर मालदीव की विदेश नीति में चीन का वर्चस्व बढ़ा, तो अमेरिका अपनी विदेश नीति में बदलाव कर सकता है।
विश्लेषकों का मानना है कि वर्ष 2011 में ही मालदीव का अल्प विकसित देश का दर्जा खत्म हो गया है, इसलिए नए राष्ट्रपति को अपने नागरिकों के हित में भारत और चीन से वित्तीय सहायता प्राप्त करने के लिए दोनों देशों के साथ ‘समान दूरी’ के कूटनीतिक सिद्धांत का पालन करना चाहिए। साथ ही, भारत को भी मुइज्जू शासन के साथ बेहतर कूटनीतिक रिश्ते बनाने के लिए सावधानी बरतनी होगी, हालांकि वह चीन के पक्ष में झुका हुआ है, लेकिन उसे क्षेत्र में असंतुलन पैदा करने की खुली छूट नहीं दी जा सकती।