जब एक लोकप्रिय और प्रसिद्ध उद्यमी आर्थिक दबाव और कर्ज न चुका पाने के कारण आत्महत्या करता है, तो यह एक बड़ी खबर बन जाती है। लोग मृत्यु के कारणों का विश्लेषण करने लगते हैं और कर्जदाता की निष्ठुरता और सामाजिक समस्याओं के बारे में कई तरह की कहानियां फैलने लगती हैं।
कुछ साल पहले, एनसाइक्लोपीडिया ब्रिटानिका में दक्षिण एशिया के मुख्य परिचालन अधिकारी, 47 वर्षीय विनीत विग ने साइबर सिटी गुरुग्राम में अपनी सोसाइटी की इमारत की 19वीं मंजिल से कूदकर जान दे दी। उसने जो सुसाइड नोट छोड़ा था, उसमें कहा गया था कि वह काफी तनाव में था और इसलिए उसने यह अतिवादी कदम उठाया। वह आत्महत्या भी मीडिया की खबर बनी थी।
उत्तर प्रदेश के 36 वर्षीय गन्ना किसान रमन सिंह के सामने पूरा भविष्य पड़ा था। उसके दो स्कूल जाने वाले बच्चे, बूढ़े माता-पिता और पत्नी गांव के उसके अपने घर में रहते थे। लेकिन दूसरे साल भी फसल खराब होने के कारण उसने जान दे दी। उसे भारी आर्थिक नुकसान हुआ और फसल की कीमत इतनी कम मिली, जो उसके जीने के लिए पर्याप्त नहीं थी।
उसने खुद को और अपने परिवार को मार डाला और दोष नसीब को दिया। उसकी कहानी देश के उन कई किसानों की तरह है, जिन्होंने आत्महत्या जैसा अतिवादी कदम उठाया, और जो शायद ही कभी खबर बनती है। मुख्यधारा का मीडिया नहीं मानता कि ये किसान भी अपनी तरह से उद्यमी हैं, अपने अच्छे-बुरे के लिए पूरी तरह से वही जिम्मेदार हैं।
यह अंततः व्यावसायिक विफलता ही है, जो ऐसे युवा और होनहार लोगों को खुदकुशी जैसा अतिवादी कदम उठाने के लिए मजबूर करती है। हाल के वर्षों में किसान आत्महत्या की घटनाएं बढ़ गई हैं, जिसने 2016 की नोटबंदी के बाद एक अलग मोड़ ले लिया है, जब नोटबंदी के कारण फसलों की कीमत बुरी तरह से प्रभावित हुई थी। कई छोटे किसानों को या तो सस्ते में अपनी फसल बेचनी पड़ी अथवा नहीं बिकने पर खराब हो जाने वाली फसलों के साथ बैठने की दुविधा का सामना करना पड़ा।
उनकी परेशानी सिर्फ कठिन मेहनत से उपजाई गई फसल की कम कीमत मिलने के साथ खत्म नहीं हुई, कम पैसे मिलने का मतलब यह भी था कि नकदी तक सीमित पहुंच के कारण अगली फसल बोने के लिए उनके पास पैसे नहीं थे।