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बहुत कुछ बदल गया कॉफी के साथ : अपने अच्छे-बुरे के लिए पूरी तरह से वही जिम्मेदार हैं

नारायण कृष्णमूर्ति Published by: नारायण कृष्णमूर्ति Updated Sat, 03 Aug 2019 02:15 AM IST
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वी जी सिद्धार्थ - फोटो : a

जब एक लोकप्रिय और प्रसिद्ध उद्यमी आर्थिक दबाव और कर्ज न चुका पाने के कारण आत्महत्या करता है, तो यह एक बड़ी खबर बन जाती है। लोग मृत्यु के कारणों का विश्लेषण करने लगते हैं और कर्जदाता की निष्ठुरता और सामाजिक समस्याओं के बारे में कई तरह की कहानियां फैलने लगती हैं।

कुछ साल पहले, एनसाइक्लोपीडिया ब्रिटानिका में दक्षिण एशिया के मुख्य परिचालन अधिकारी, 47 वर्षीय विनीत विग ने साइबर सिटी गुरुग्राम में अपनी सोसाइटी की इमारत की 19वीं मंजिल से कूदकर जान दे दी। उसने जो सुसाइड नोट छोड़ा था, उसमें कहा गया था कि वह काफी तनाव में था और इसलिए उसने यह अतिवादी कदम उठाया। वह आत्महत्या भी मीडिया की खबर बनी थी।



उत्तर प्रदेश के 36 वर्षीय गन्ना किसान रमन सिंह के सामने पूरा भविष्य पड़ा था। उसके दो स्कूल जाने वाले बच्चे, बूढ़े माता-पिता और पत्नी गांव के उसके अपने घर में रहते थे। लेकिन दूसरे साल भी फसल खराब होने के कारण उसने जान दे दी। उसे भारी आर्थिक नुकसान हुआ और फसल की कीमत इतनी कम मिली, जो उसके जीने के लिए पर्याप्त नहीं थी।

उसने खुद को और अपने परिवार को मार डाला और दोष नसीब को दिया। उसकी कहानी देश के उन कई किसानों की तरह है, जिन्होंने आत्महत्या जैसा अतिवादी कदम उठाया, और जो शायद ही कभी खबर बनती है। मुख्यधारा का मीडिया नहीं मानता कि ये किसान भी अपनी तरह से उद्यमी हैं, अपने अच्छे-बुरे के लिए पूरी तरह से वही जिम्मेदार हैं।

यह अंततः व्यावसायिक विफलता ही है, जो ऐसे युवा और होनहार लोगों को खुदकुशी जैसा अतिवादी कदम उठाने के लिए मजबूर करती है। हाल के वर्षों में किसान आत्महत्या की घटनाएं बढ़ गई हैं, जिसने 2016 की नोटबंदी के बाद एक अलग मोड़ ले लिया है, जब नोटबंदी के कारण फसलों की कीमत बुरी तरह से प्रभावित हुई थी। कई छोटे किसानों को या तो सस्ते में अपनी फसल बेचनी पड़ी अथवा नहीं बिकने पर खराब हो जाने वाली फसलों के साथ बैठने की दुविधा का सामना करना पड़ा।

उनकी परेशानी सिर्फ कठिन मेहनत से उपजाई गई फसल की कम कीमत मिलने के साथ खत्म नहीं हुई, कम पैसे मिलने का मतलब यह भी था कि नकदी तक सीमित पहुंच के कारण अगली फसल बोने के लिए उनके पास पैसे नहीं थे।
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वी जी सिद्धार्थ - फोटो : a
जब एक लोकप्रिय और प्रसिद्ध उद्यमी आर्थिक दबाव और कर्ज न चुका पाने के कारण आत्महत्या करता है, तो यह एक बड़ी खबर बन जाती है। लोग मृत्यु के कारणों का विश्लेषण करने लगते हैं और कर्जदाता की निष्ठुरता और सामाजिक समस्याओं के बारे में कई तरह की कहानियां फैलने लगती हैं।

कुछ साल पहले, एनसाइक्लोपीडिया ब्रिटानिका में दक्षिण एशिया के मुख्य परिचालन अधिकारी, 47 वर्षीय विनीत विग ने साइबर सिटी गुरुग्राम में अपनी सोसाइटी की इमारत की 19वीं मंजिल से कूदकर जान दे दी। उसने जो सुसाइड नोट छोड़ा था, उसमें कहा गया था कि वह काफी तनाव में था और इसलिए उसने यह अतिवादी कदम उठाया। वह आत्महत्या भी मीडिया की खबर बनी थी।

उत्तर प्रदेश के 36 वर्षीय गन्ना किसान रमन सिंह के सामने पूरा भविष्य पड़ा था। उसके दो स्कूल जाने वाले बच्चे, बूढ़े माता-पिता और पत्नी गांव के उसके अपने घर में रहते थे। लेकिन दूसरे साल भी फसल खराब होने के कारण उसने जान दे दी। उसे भारी आर्थिक नुकसान हुआ और फसल की कीमत इतनी कम मिली, जो उसके जीने के लिए पर्याप्त नहीं थी।

उसने खुद को और अपने परिवार को मार डाला और दोष नसीब को दिया। उसकी कहानी देश के उन कई किसानों की तरह है, जिन्होंने आत्महत्या जैसा अतिवादी कदम उठाया, और जो शायद ही कभी खबर बनती है। मुख्यधारा का मीडिया नहीं मानता कि ये किसान भी अपनी तरह से उद्यमी हैं, अपने अच्छे-बुरे के लिए पूरी तरह से वही जिम्मेदार हैं।

यह अंततः व्यावसायिक विफलता ही है, जो ऐसे युवा और होनहार लोगों को खुदकुशी जैसा अतिवादी कदम उठाने के लिए मजबूर करती है। हाल के वर्षों में किसान आत्महत्या की घटनाएं बढ़ गई हैं, जिसने 2016 की नोटबंदी के बाद एक अलग मोड़ ले लिया है, जब नोटबंदी के कारण फसलों की कीमत बुरी तरह से प्रभावित हुई थी। कई छोटे किसानों को या तो सस्ते में अपनी फसल बेचनी पड़ी अथवा नहीं बिकने पर खराब हो जाने वाली फसलों के साथ बैठने की दुविधा का सामना करना पड़ा।

उनकी परेशानी सिर्फ कठिन मेहनत से उपजाई गई फसल की कम कीमत मिलने के साथ खत्म नहीं हुई, कम पैसे मिलने का मतलब यह भी था कि नकदी तक सीमित पहुंच के कारण अगली फसल बोने के लिए उनके पास पैसे नहीं थे।
 

अन्य क्षेत्रों के विपरीत खेती में किसानों की आय बेहद मौसमी होती है। यदि मौजूदा मौसम में बेचे जाने के लिए खरीफ की फसल या कुछ सब्जी/ फल उगाना है, तो वही साल में किसान की मुख्य गतिविधि होती है और उसका उचित मूल्य हासिल करने में विफलता पूरे वर्ष की उसकी कुल आय पर बहुत बड़ा प्रभाव डाल सकती है। फिर भी जब तक बड़े पैमाने पर किसान आत्महत्या नहीं करते, तब तक यह खबर नहीं बनती।

अब विनिर्माण और व्यापार क्षेत्र के छोटे उद्यमियों की बात करें, तो जीएसटी जैसे बदलते नियमों ने उनमें से कई को व्यवसाय से बाहर कर दिया है। उनके पास अपने आप जीएसटी का अनुपालन करने के लिए पैमाने या क्षमताएं नहीं हैं। उनमें से बहुत से लोगों ने अपना कारोबार समेट लिया या कई लोगों ने आत्महत्या कर ली।

लेकिन ऐसी मौतों पर समाज की उदासीनता से स्पष्ट है कि शायद ही कोई उनके बारे में परवाह करता है या इन पर गंभीरता से सोचता है। देश में रियल एस्टेट की बुरी हालत के कारण बड़े बिल्डरों का खबरों में उल्लेख होता है, लेकिन कई ऐसे छोटे बिल्डर हैं, जिन्होंने कठोर आर्थिक संकट का सामना करने के कारण अचानक खुदकुशी कर ली।

छोटे भारतीय उद्यमियों के साथ त्रासदी यह है कि उनमें से अधिकांश अपने व्यवसाय को सामान्य कामकाजी की तरह चलाते हैं, क्योंकि उन्हें अपने व्यवसाय का संचालन अकेले करना पड़ता है। फिर भी उनमें कई ऐसे उदाहरण हैं, जो इतने बड़े व्यवसायी बन जाते हैं कि कई अप्रत्याशित स्रोतों से मिलने वाली चुनौतियाें का सामना नहीं कर पाने के कारण मुश्किल में पड़ जाते हैं।

वी जी सिद्धार्थ की कहानी व्यवसायियों के कठिन और तनावपूर्ण जीवन के बारे में लोगों की आंखें खोलने वाली है। लोगों को यह भी समझना चाहिए कि छोटे व्यवसायियों और उद्यमियों के लिए भी यही सच है। सिद्धार्थ की खुदकुशी खबर बन गई, लेकिन हमें उन लोगों को भी देखना चाहिए, जो व्यवसाय की चुनौतियों और तनाव देने वाली परिस्थितियों के कारण खुद को बेकार कर लेते हैं।

कैफे कॉफी डे एक सूचीबद्ध कंपनी है, जिसने कई उद्यमियों को कॉफी पर अपनी व्यापार योजना तैयार करने के लिए प्रेरित किया। हाल के वर्षों में बदलते कारोबारी माहौल और विकास के दबाव के कारण उसकी मुश्किलें बढ़ गई थीं। सिद्धार्थ उस पहली पीढ़ी के उद्यमी थे, जिन्होंने ज्यादातर चाय पीने वाले लोगों के देश में काफी की संस्कृति शुरू करने में अपार संभावनाएं देखी थीं। बदलते व्यावासायिक कानूनों ने हर कुछ वर्ष पर उनके काम को प्रभावित किया और समय व जरूरत के मुताबिक बदलने पर मजबूर किया।

उनकी असामयिक मृत्यु यह संकेत है कि सरकार को अपनी व्यापार सुगमता पर ध्यान देने के साथ ही कर अनुपालन के नियमों की जांच करने पर विचार करना चाहिए। आज छोटे व्यवसायियों और उद्यमियों के लिए कर अनुपालन की चिंता किए बिना कार्य करना बहुत मुश्किल हो रहा है, जो उन्हें अपने व्यवसाय पर ध्यान केंद्रित करने के लिए बहुत कम मौका देता है।

सरकार और समाज को इन मुद्दों पर ध्यान देने और इतने युवाओं की खुदकुशी के कारणों पर सोचने की आवश्यकता है। इन विफल व्यवसायों में से हरेक रोजगार पैदा करने वाली इकाई थी। अब जरा कल्पना कीजिए कि अगर अगले छह महीनों में कॉफी केफै डे बंद हो जाता है, तो कितने परिवार प्रभावित होंगे! यह वैसा ही परिदृश्य होगा, जैसा जेट एयरवेज के कर्मचारियों के साथ हुआ, जिन्होंने खुद को बेरोजगार और कई वित्तीय प्रतिबद्धताओं से जूझते हुए पाया।

हम समाज में असंतुलन पैदा करने वाली स्थितियों पर नजर रखकर मदद कर सकते हैं और सरकार यह सुनिश्चित करने के लिए कदम उठा सकती है कि व्यापार सुगमता वास्तव में सभी आकार के उद्यमियों और सभी क्षेत्रों में मौजूद है।
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