भारत के विभाजन और भारत-पाकिस्तान संबंधों के इतिहास की अभी तक अनसुलझी गुत्थी यह रही है कि धर्म-आधारित दो राष्ट्रों के सिद्धांत पर लंबे समय तक चलने के बाद क्या मोहम्मद अली जिन्ना अगस्त 1947 से बिल्कुल नए रास्ते पर चलना चाहते थे। भारत और पाकिस्तान सहित कई विदेशी विचारकों का भी यह मत है कि जिन्ना एक सेक्यूलर निजाम की कल्पना कर रहे थे। 11 अगस्त, 1947 को पाकिस्तान की संविधान सभा में जिन्ना के भाषण का शाब्दिक अर्थ निकाला जाए, तो इसी निष्कर्ष पर पहुंचते हैं। इस भाषण का सबसे महत्वपूर्ण अंश यह है, 'आप का ताल्लुक किसी भी मजहब, जाति या फिरके से हो, हुकूमत से उसका कोई वास्ता नहीं है। इस आदर्श पर चलें, तो समय के साथ पाएंगे कि हिंदू न हिंदू रहेगा और मुसलमान न मुसलमान; मजहबी मायने में नहीं, बल्कि राज्य के नागरिक के नाते राजनीतिक मायने में।'
गौरतलब है, इस भाषण से कुछ अरसा पहले मनकी के पीर को लिखी चिट्ठी में जिन्ना ने भरोसा दिलाया था कि पाकिस्तान शरीयत के उसूलों पर चलेगा। देवबंद की 'मुश्तरका कौमियत' थिअरी से बगावत करने वाले मुट्ठी भर मौलानाओं को भी यही यकीन था। लेकिन 11 अगस्त के भाषण में शरीयत या इस्लाम का जिक्र नहीं आया। यह एक ऐतिहासिक यू टर्न का संकेत था। इसके तीसरे दिन पाकिस्तान संविधान सभा के उद्घाटन-भाषण में लार्ड माउंटबेटन ने कहा, 'मुगल सम्राट अकबर को किसी भी मुस्लिम हुकूमत का रोल मॉडल होना चाहिए।' जिन्ना ने फौरन खड़े होकर माउंटबेटन को टोकते हुए कहा, 'अकबर से 1,300 साल पहले पैगंबर मोहम्मद ने मिसाल पेश की थी।' उनका इशारा शायद मदीना की नव-स्थापित इस्लामी हुकूमत और अल्पसंख्यक यहूदियों के बीच हुए समझौते मीसाक-ए-मदीना की ओर था।
पैगंबर से पहले सैकड़ों साल के इतिहास को देखें, तो मीसाक-ए-मदीना अंतर-धार्मिक संबंधों में एक नया अध्याय था। मगर यह इस्लामी और गैर-इस्लामी कौमों के बीच था, जिसके तहत यहूदियों को 'हिफाजती रकम' अदा करनी थी। यह अल्पकालिक करार और उसका हश्र जो हुआ, वह क्यों हुआ, इस पर चर्चा से विषयांतरण हो जाएगा। इसलिए इसे यहीं छोड़ते हुए, जिन्ना पर लौटते हैं। उनके 11 अगस्त के विचारों का वजूद सिर्फ तीन दिन का था। 14 को जिन्ना ने अपना असली चेहरा दिखा दिया। खान-पान और कुल व्यवहार में 'आधुनिक' जिन्ना 1,300 वर्षों में आ चुके फर्क को बखूबी समझते होंगे। क्या वह इशारा कर रहे थे कि मीसाक-ए-मदीना के बाद जो गति यहूदियों की हुई थी, अल्पसंख्यक, खासतौर से हिंदू उससे बच नहीं सकते? ताज्जुब नहीं, पाकिस्तान का हीरो अकबर नहीं, औरंगजेब बना। आखिर, महाबली अकबर को अपने शासनकाल में ही कट्टरपंथियों से चुनौतियां मिलने लगी थीं।
पाकिस्तानी मूल के इतिहासकार, लाहौर स्थित गवर्नमेंट कॉलेज यूनिवर्सिटी में विजिटिंग प्रोफेसर और कई प्रतिष्ठित पाकिस्तानी पत्रों के स्तंभकार प्रो. इश्तियाक अहमद ने अपनी सद्यः प्रकाशित पुस्तक जिन्नाः हिज सक्सेसेज,फेलियर्स एंड रोल इन हिस्ट्री में 11 अगस्त के भाषण का पहली बार लीक से हटकर, नया विश्लेषण किया है। वह लिखते हैं, 'जिन्ना का बुनियादी मकसद भारत को यह भरोसा दिलाना था कि पाकिस्तान में अल्पसंख्यक समान अधिकारों के साथ सुरक्षित रहेंगे, ताकि भारत में रह गए साढ़े तीन करोड़ मुसलमानों को खदेड़ा न जाए। तब तक पूर्वी पंजाब में मुसलमानों पर बड़े स्तर पर हमलों की रिपोर्टें आने लगी थीं; जिन्ना बहुत चिंतित थे कि पूर्वी पंजाब के बाहर भारत के अन्य हिस्सों में मुसलमानों पर हमले न होने लगे। जिन्ना को जरूर एहसास हुआ होगा कि बड़ी संख्या में भारत से मुसलमानों की आमद से पाकिस्तान चरमरा कर बैठ जाएगा। अतीत में आबादी की अदला-बदली के हिमायती जिन्ना अचानक इसे भूल गए।'
क्या जिन्ना भारत-पाक दोस्ती और विवादों के शांतिपूर्ण समाधान के लिए सोच पाने में सक्षम थे? प्रो. अहमद इस बिंदु पर पहुंचने को विवश करते हैं कि यह तो जिन्ना के डीएनए में ही नहीं था। कैंसर से ग्रस्त जिन्ना अपने ऊपर मंडरा रहे मौत के साये को देखने लगे थे। 11 सितंबर, 1948 को उनका इंतकाल हुआ। सितंबर 1947, में जिन्ना कई हफ्ते तक लाहौर में रहे। प्रो. अहमद बताते हैं कि जिन्ना कश्मीर पर चटपट हमला कर उसे पाकिस्तान में मिलाने की योजना बना रहे थे। महाराजा हरि सिंह की राय जानने का उनके पास धैर्य नहीं था। सत्ता हस्तांतरण अधिनियम को वह डस्टबिन में डाल चुके थे। पाकिस्तानी फौज और कबाइलियों ने अक्तूबर में कश्मीर पर हमला कर दिया। जिन्ना को लाहौर से कुछ मील दूर, मुस्लिम शरणार्थियों से खचाखच भरे वॉल्ट्न कैंप तक जाने की फुरसत नवंबर में मिली। इसी दौर में जवाहर लाल नेहरू, सरदार पटेल और अन्य नेता एक-एक मुस्लिम शरणार्थी शिविर में दौड़-दौड़ कर सुरक्षा का जायजा ले रहे थे।
कायद-ए-आजम के आचरण के विपरीत, महात्मा गांधी की अपनी शहादत से कुछ घंटे पहले नेहरू और पटेल को हिदायत थी : हर हाल में मुसलमानों की हिफाजत करो। मुस्लिम लीग की राजनीति और पाकिस्तान आंदोलन की अवश्यंभावी गति यही थी कि पाकिस्तान की राज्य सत्ता आधुनिक, सेक्यूलर और गणतांत्रिक नहीं हो सकती। 1930 और 1940 में ही पाकिस्तान की सिंगल लेन तय हो चुकी थी, उस पर किसी और वाहन के चलने की गुंजाइश नहीं थी। पाकिस्तान टूटेगा, यह भी जिन्ना ने ही सुनिश्चित कर दिया था। जिन्ना 'प्रांतवाद' को बड़ी गंदी चीज मानते थे। पंजाब, सिंध, बलूचिस्तान और सरहदी सूबे को मिलाकर एक इकाई का गठन, 'निम्नस्तरीय बंगाली' आबादी वाले, पूर्वी पाकिस्तान के साथ बदसलूकी के साथ विघटन का बीजारोपण 1947 में ही हो गया था। भारत से नफरत के चलते ही पाकिस्तान के अमेरिका की गोदी में बैठ जाने का सिद्धांत भी जिन्ना ने ही प्रतिपादित किया था। प्रो अहमद की किताब का हर पेज नेहरू पर कीचड़ फेंकने के लिए जिन्ना के कसीदे पढ़ने की राजनीति की धज्जियां उड़ा देता है।