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जलियांवाला बाग हत्याकांड: विरोध की वह अकेली आवाज, गांधीजी को पत्र लिख जताई थी चिंता

सुब्रत मुखर्जी Published by: Raman Singh Updated Mon, 15 Apr 2019 11:37 AM IST
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जलियांवाला बाग - फोटो : PTI

वर्ष 1919 में रवींद्रनाथ को महात्मा गांधी की एक चिट्ठी मिली, जिसमें अंग्रेजों से मोहभंग और रॉलेट ऐक्ट के खिलाफ विरोध की जरूरत के बारे में बताया गया था। रवींद्रनाथ का जवाब मिला-जुला था। जहां वह रॉलेट ऐक्ट के विरोध की जरूरत पर गांधी जी से सहमत थे, वहीं उन्हें तत्कालीन स्थितियों में नस्लीय घृणा और नफरत की भावना तेज होने का भी डर था। रॉलेट ऐक्ट के पारित होने के बाद राष्ट्रवादी आंदोलन का एक नया चरण शुरू हुआ और गांधी जी ने इसे निरस्त करने के लिए सत्याग्रह आंदोलन शुरू करने की घोषणा की।

नौ अप्रैल को कोलकाता, अमृतसर, मुंबई और अहमदाबाद में पुलिस ने गोलीबारी की। महात्मा गांधी मुंबई से दिल्ली आने को तैयार थे, पर पुलिस ने उन्हें मुंबई में रहने के लिए मजबूर किया। लोगों को इस बात की जानकारी मिल गई। 10 अप्रैल को डॉ. सैफुद्दीन किचलू और डॉ सत्यपाल को गिरफ्तार कर नजरबंद कर दिया। विरोध में लोगों ने जिलाधिकारी के बंगले का घेराव किया। प्रदर्शनकारियों को खदेड़ने के लिए पुलिस ने गोलियां चलाईं।



अमृतसर, गुजरांवाला और कसूर में पुलिस और लोगों के बीच सड़क पर जमकर संघर्ष हुआ। पंजाब के गवर्नर माइकल ओ'डायर सख्ती से विरोध प्रदर्शन को कुचलना चाहते थे। इसके बाद पुलिस ने गंभीरतापूर्वक विरोध प्रदर्शन का दमन किया। 10 अप्रैल को पंजाब में किसी भी समाचार के प्रसार पर पूर्ण प्रतिबंध के साथ मार्शल लॉ लागू किया गया। नतीजतन पंजाब शेष भारत से पूरी तरह कट गया।

अपने चरम पर पहुंचकर जैसे ही आंदोलन हिंसक हुआ, गांधी जी ने इसे निलंबित करने के बारे में सोचा। उन्होंने कहा कि अब वह समय आ गया है कि मुझे हिंसा के चलते अपने खिलाफ सत्याग्रह की पेशकश करनी चाहिए। उन्होंने उसे हिमालयी गलती (भारी भूल) कहा।

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जलियांवाला बाग - फोटो : PTI
वर्ष 1919 में रवींद्रनाथ को महात्मा गांधी की एक चिट्ठी मिली, जिसमें अंग्रेजों से मोहभंग और रॉलेट ऐक्ट के खिलाफ विरोध की जरूरत के बारे में बताया गया था। रवींद्रनाथ का जवाब मिला-जुला था। जहां वह रॉलेट ऐक्ट के विरोध की जरूरत पर गांधी जी से सहमत थे, वहीं उन्हें तत्कालीन स्थितियों में नस्लीय घृणा और नफरत की भावना तेज होने का भी डर था। रॉलेट ऐक्ट के पारित होने के बाद राष्ट्रवादी आंदोलन का एक नया चरण शुरू हुआ और गांधी जी ने इसे निरस्त करने के लिए सत्याग्रह आंदोलन शुरू करने की घोषणा की।

नौ अप्रैल को कोलकाता, अमृतसर, मुंबई और अहमदाबाद में पुलिस ने गोलीबारी की। महात्मा गांधी मुंबई से दिल्ली आने को तैयार थे, पर पुलिस ने उन्हें मुंबई में रहने के लिए मजबूर किया। लोगों को इस बात की जानकारी मिल गई। 10 अप्रैल को डॉ. सैफुद्दीन किचलू और डॉ सत्यपाल को गिरफ्तार कर नजरबंद कर दिया। विरोध में लोगों ने जिलाधिकारी के बंगले का घेराव किया। प्रदर्शनकारियों को खदेड़ने के लिए पुलिस ने गोलियां चलाईं।

अमृतसर, गुजरांवाला और कसूर में पुलिस और लोगों के बीच सड़क पर जमकर संघर्ष हुआ। पंजाब के गवर्नर माइकल ओ'डायर सख्ती से विरोध प्रदर्शन को कुचलना चाहते थे। इसके बाद पुलिस ने गंभीरतापूर्वक विरोध प्रदर्शन का दमन किया। 10 अप्रैल को पंजाब में किसी भी समाचार के प्रसार पर पूर्ण प्रतिबंध के साथ मार्शल लॉ लागू किया गया। नतीजतन पंजाब शेष भारत से पूरी तरह कट गया।

अपने चरम पर पहुंचकर जैसे ही आंदोलन हिंसक हुआ, गांधी जी ने इसे निलंबित करने के बारे में सोचा। उन्होंने कहा कि अब वह समय आ गया है कि मुझे हिंसा के चलते अपने खिलाफ सत्याग्रह की पेशकश करनी चाहिए। उन्होंने उसे हिमालयी गलती (भारी भूल) कहा।

रवींद्रनाथ टैगोर ने लिखा खुला खत

jallianwala bagh
रवींद्रनाथ इन घटनाओं को करीब से देख रहे थे, क्योंकि वह इसके परिणाम से चिंतित थे। लेकिन जब आंदोलन गांधी जी के बताए रास्ते से भटकने लगा, तो उन्होंने 12 अप्रैल को उन्हें एक खुला पत्र लिखा, जो इंडियन डेली न्यूज में 16 अप्रैल को छपा। वह पत्र एक महत्वपूर्ण दस्तावेज था, जो कवि की विचार प्रक्रिया और चिंताओं को दर्शाता था।

उन्होंने पत्र की शुरुआत गांधी जी को 'प्रिय महात्मा जी' कहते हुए की और आगे लिखा-'सत्ता अपने सभी रूपों में विवेकशून्य होती है, यह उस घोड़े की तरह होती है, जो गाड़ी को अंधे मोड़ की तरफ ले जाती है। निष्क्रिय प्रतिरोध एक ऐसा बल है, जो जरूरी नहीं कि अपने आप में नैतिक हो, इसका इस्तेमाल सच्चाई के पक्ष के साथ-साथ इसके खिलाफ भी किया जा सकता है। सभी ताकत में निहित खतरा तब और मजबूत हो जाता है, जब इसके सफल होने की संभावना होती है, तब यह प्रलोभन बन जाता है।'

उन्होंने लिखा, 'मैं जानता हूं कि आपकी सीख अच्छाई की मदद से बुराई के खिलाफ संघर्ष है। लेकिन इस तरह की लड़ाई नायकों के लिए है, न कि क्षणिक आवेग से संचालित लोगों के लिए। एक तरफ की बुराई स्वाभाविक रूप से दूसरे तरफ भी बुराई पैदा करती है, अन्याय हिंसा की ओर ले जाती है और बदला लेने की साहसिक इच्छा का अपमान करती है। दुर्भाग्य से ऐसी ताकत पहले ही हरकत में आ गई है और या तो घबराहट में या गुस्से के जरिये हमारे शासक ने हमें अपने पंजे दिखाए हैं, जिसका सुनिश्चित प्रभाव यह है कि हम में से कुछ लोग गुस्से के गुप्त पथ पर चल पड़े हैं, तो कुछ लोग अनैतिक पथ पर।'

यह आंदोलन पर एक गंभीर आरोप था, जिसे बिना किसी उचित अग्रिम तैयारी के साथ शुरू किया गया था। रवींद्रनाथ ने सत्ता की उस विवेकशून्यता पर फिर से सवाल उठाए-जो थॉमस हॉब्स के समय एक प्रमुख चिंता थी-और एक औजार के रूप में निष्क्रिय प्रतिरोध के उपयोग और इसके अधःपतन की आशंका की बात कही। वह ऐसे आंदोलन के दो दीर्घकालिक नकारात्मक प्रभाव को भी देख सकते थे, जो अपने वांछित अंत पर पहुंचने में विफल रहे-(अ) राज्य का बढ़ा दमन, जो आतंकवाद को हवा देता और (ब) दूसरा पूर्ण अनैतिकता और निराशा की ओर ले जाने वाला। इन आलोचनाओं के बावजूद रवींद्रनाथ ने एक नेता के रूप में गांधी की महानता को स्वीकार किया। हालांकि उन्होंने गांधी को चेताया कि स्वतंत्रता का महान उपहार दान के माध्यम से लोगों को नहीं मिल सकता। आगे इसमें उन्होंने जोड़ा, हमें इसे पाने से पहले ही हासिल करना चाहिए। यह विजेता पर हमारी नैतिक श्रेष्ठता का प्रदर्शन करके ही हासिल किया जा सकता है।

सेंसरशिप की आड़ में छिपाई गई जालियांवाला बाग की हकीकत

जलियांवाला बाग में शहीदी कुआं - फोटो : PTI
बैसाखी के दिन 13 अप्रैल, 1919 को जलियांवाला बाग में नरसंहार हुआ था। मार्शल लॉ और सेंसरशिप के कारण दुनिया को तुरंत इस घृणित कार्य का पता नहीं चल सका। 18 अप्रैल को गांधी जी ने अंग्रेजों के दमन के लिए अंग्रेजों के बजाय अपने देशवासियों को ही जिम्मेदार ठहराते हुए सत्याग्रह वापस ले लिया। इससे अंग्रेज और भी खुलेआम दमन और अपमान के लिए प्रेरित हुए। रवींद्रनाथ को नरसंहार की तत्काल जानकारी नहीं मिली। एक-दो दिन के भीतर गांधी जी द्वारा आंदोलन वापस लेने की खबर अखबार में छपी।

रवींद्रनाथ ने गांधी के नेतृत्व पर भरोसा जताया और शांतिनिकेतन से कोलकाता चले गए तथा वहां नरसंहार के खिलाफ एक विरोध सभा आयोजित करने की कोशिश की, लेकिन चित्तरंजन दास समेत किसी भी नेता का उन्हें समर्थन नहीं मिला। उन्होंने सी. एफ एंड्र्यूज को गांधी जी के पास यह अनुरोध करने के लिए भेजा, तो गांधी जी ने जवाब दिया कि वह सरकार को शर्मिंदा नहीं करना चाहते। इसके बाद रवींद्रनाथ ने खुद नाइटहुड की उपाधि त्यागने का फैसला लिया और हाथ से लिखकर एक पत्र वायसराय को भेजा।

वह विरोध की अकेली आवाज थी, लेकिन उन्होंने देश के साथ-साथ बाहर के लोगों को भी अपने यादगार गीत 'एकला चलो रे' को सच साबित कर दिखाया। यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि 1919 की अमृतसर कांग्रेस में रवींद्रनाथ के उस त्याग का कोई जिक्र नहीं हुआ, जबकि वायसराय काउंसिल से सीएस नायर के इस्तीफे की प्रशंसा की गई। यहां तक कि पट्टाभि सीतारमैया ने भी द हिस्ट्री ऑफ द इंडियन कांग्रेस में रवींद्रनाथ के इस साहसिक कृत्य का कोई जिक्र नहीं किया है। रवींद्रनाथ का त्याग अनूठा था, उनमें लोकप्रिय होने की कोई इच्छा नहीं थी। गंभीर संकट के क्षणों में वह आम लोगों के साथ खड़े हुए।
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