गिरफ्तारी के बाद हुए संघर्ष में प्रदर्शनकारियों पर गोली चलाई गईं, जिसमें 20 भारतीय मारे गए। उसके बाद निहत्थे, पर आक्रोशित भारतीयों ने पांच अंग्रेजों को मार दिया, जिसके परिणामस्वरूप 13 अप्रैल को नरसंहार हुआ। वह बर्बरता ब्रिटिश लेफ्टिनेंट गवर्नर सर माइकल ओ' डायर द्वारा अमृतसर के लोगों को ऐसा सबक सिखाने की कोशिश थी, जिसे वे कभी भूल न पाएं।
जाहिर है, जो बात ओ'डायर (यह डायर नहीं थे, जैसा कि अक्सर भूल की जाती है) नहीं समझ पाए, वह यह कि यह नरसंहार ब्रिटिश उत्पीड़न का एक मजबूत प्रतीक बन जाएगा और यह अंततः सभी भारतीय राष्ट्रवादियों को अपनी ओर आकर्षित कर लेगा।
नरसंहार और उसके बाद लागू मार्शल लॉ की सूचना जैसे ही फैली (करीब दो-तीन महीने बाद, सेंसरशिप लागू कर दी गई और पंजाब में लोगों को धमकाया गया, जेल में डाला गया और यातना दी गई), जो लोग गांधी के रॉलेट ऐक्ट विरोधी सत्याग्रह में शामिल नहीं हुए थे, वे भी इसमें शामिल हो गए। लाला लाजपत राय, पं. मदनमोहन मालवीय, पं. मोतीलाल नेहरू, महात्मा गांधी जैसे जननेता और रवींद्रनाथ टैगोर, सरोजनी नायडू जैसे कवि-सबने अमृतसर में हुई घटनाओं के बाद ब्रिटिश शासन से अपना मोहभंग व्यक्त किया और तीन दशकों के भीतर ही भारत स्वतंत्र हो गया।
सवाल है कि ब्रिटेन अब भी माफी क्यों नहीं मांग रहा। हाल ही में मैं एक टीवी बहस में शामिल थी, जहां हैरान करने वाली बात बताई गई कि अगर मांफी मांगी जाती है, तो उससे वित्तीय उलझन पैदा हो जाएगी और इसी कारण ब्रिटिश प्रधानमंत्री टेरीजा मे ने केवल अफसोस जाहिर किया।
यह भी स्पष्ट है कि शहीदों के परिवार केवल मौद्रिक लाभ के लिए ब्रिटेन से माफी मांगने के लिए नहीं कह रहे हैं। मैंने कई शहीदों के परिजनों से बातें कीं, उनमें से किसी को भी ब्रिटेन से कोई उम्मीद नहीं है। मेरे लिए यह भारत और भारतीयों के प्रति नस्लभेद है। यह वाकई शर्मनाक है कि ब्रिटेन लगातार हमें भिखारियों का देश मानता है। अगर वास्तव में शहीदों के परिवार कुछ चाहते हैं या उन्हें किसी चीज की जरूरत है, तो क्या उनकी मांगों को भारत सरकार के सामने नहीं रखा जाना चाहिए?
वे अंग्रेजों से क्यों कुछ चाहेंगे? मुझे यह भी समझ में नहीं आ रहा है कि अगर 'रिग्रेट'(अफसोस) और 'एपॉलॉजी'(माफी) एक ही चीज है, जैसा कि कई लोग बता रहे हैं, तो फिर वित्तीय निपटारे की बात केवल एक से ही क्यों जुड़ी है, दूसरे से क्यों नहीं? मुझे लगता है कि बहस के केंद्र में यह शब्दार्थ अब भी उसी नस्लवाद से पैदा हुआ है, जो सौ साल पहले था।
जैसा कि हम ब्रिटेन की संसद में हाल ही में हुई बहस से जानते हैं कि वहां अफसोस जताया गया, वहीं सिर्फ लेबर पार्टी ने कहा कि स्पष्ट तौर पर माफी मांगी जानी चाहिए। पर कंजरवेटिव सरकार, जिसके लिए विंस्टन चर्चिल नायक जैसे हैं, जाहिर है, ऐसा नहीं मानती। और कुछ लोग मुझे बताते हैं कि सौ साल बाद माफी मांगने का कोई मतलब नहीं है। ऐसे में माल्यार्पण करने और जलियांवाला बाग जाने का क्या मतलब है? पंजाब के दर्द को नजरंदाज करने वालों के लिए वह भी निरर्थक होना चाहिए।
जलियांवाला बाग पर एक पुस्तक पर काम करते और उस नरसंहार पर प्रदर्शनियों की शृंखला आयोजित करते हुए मेरा दृढ़तापूर्वक मानना है कि हमें उन असहाय लोगों, महिलाओं और बच्चों को नहीं भूलना चाहिए, जिनकी हत्या कर दी गई। आज इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र, दिल्ली में प्रदर्शनी हो रही है, जिसे देखा जाना चाहिए। यदि आप प्रदर्शनी में साक्ष्यों-तस्वीरों, आंकड़ों और दस्तावेजों को देखेंगे, तो मुझे यकीन है कि सभी इस बात से सहमत होंगे कि क्यों ब्रिटेन का माफी मांगना उचित और सम्मानजनक होगा।