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जलियांवाला बाग हत्याकांड: इन घटनाओं ने अंग्रेजों को किया था नाराज, फिर निहत्थे लोग बने निशाना

किश्वर देसाई Published by: Shilpa Thakur Updated Sat, 13 Apr 2019 09:47 AM IST
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जलियांवाला बाग में शहीदी कुआं - फोटो : PTI

जलियांवाला बाग हत्याकांड आज भी हमारी यादों में जिंदा है, ना केवल इसलिए कि यह भयावह और हृदयविदारक था, बल्कि इसलिए भी कि यह स्वतंत्रता संग्राम में एक अहम मोड़ था। जिसकी वजह से यह और अधिक व्यापक हुआ। हालांकि अंग्रेजों ने नरसंहार की जानकारी को दबाने की पूरी कोशिश की, ताकि उस समय के राष्ट्रवादियों को नरसंहार के दौरान और उसके बाद हुए अत्याचारों की सही जानकारी ना मिल सके।

पर महात्मा गांधी और अन्य लोगों ने पंजाब में यातना की पूरी जानकारी को सामने लाने का निरंतर प्रयास किया। पंडित मदनमोहन मालवीय और अन्य लोगों के साथ उन्होंने हंटर कमेटी द्वारा प्रकाशित आधिकारिक ब्रिटिश रिपोर्ट को चुनौती देने के लिए पंजाब के लोगों की आंखों देखी जानकारियां एकत्र करनी शुरू की। 



हंटर कमेटी की रिपोर्ट प्रायः सार्वजनिक तौर पर साक्ष्य एकत्र कर तैयार की गई थी और यह काफी विस्तृत थी, लेकिन यह स्पष्ट तौर पर पूर्वाग्रही थी। क्योंकि जो लोग पंजाब में लागू मार्शल लॉ के तहत कैद किए गए थे, वे गवाही नहीं दे पाए क्योंकि उनमें से कई जेल में थे, और करीब 18 लोगों को मृत्युदंड दिया गया था।

अब जब हम महात्मा गांधी और अन्य लोगों की बदौलत पूरे पंजाब से इकट्ठा की गई गैर-आधिकारिक जानकारियों को पढ़ते हैं, तो हमें एहसास होता है कि लोगों को किस हद तक पीड़ा और भयावह यातना दी गई थी। कर्नल डायर द्वारा चेतावनी दिए बिना ना केवल लोगों को बेरहमी से मारा गया, बल्कि बचे हुए लोगों और शहीदों के परिवार निरंतर अंग्रेजों के निशाने पर रहे। 

अमृतसर, जहां इसे अंजाम दिया गया, ब्रिटिश सरकार का विशेष लक्ष्य बन गया था। जो कि 10 अप्रैल के दंगे में पांच अंग्रेजों को मारने का दुस्साहस करने के लिए शहरवासियों को सबक सिखाना चाहती थी। वास्तव में 9 और 10 अप्रैल की घटनाओं को कम प्रचार मिला, पर यही घटना थीं, जिन्होंने अंग्रेजों को नाराज किया, जो सोचते थे कि क्रांति की आग सुलग रही है।

उस समय पंजाब के नागरिक प्रशासन की मुख्य चिंता यह थी कि वे सत्याग्रह के दौरान अमृतसर की सड़कों पर बढ़ती हिंदू-मुस्लिम एकता के सामने खुद को असहाय मानते थे। जिसे महात्मा गांधी ने साल के शुरू में बेरहम रॉलेट ऐक्ट के खिलाफ शुरू किया था। 
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बड़ी संख्या में लोग, पूर्ण सांप्रदायिक सद्भाव में, गांधी के आह्वान पर चल रहे थे, और शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन करने के लिए नियमित बैठकें कर रहे थे। लेकिन 10 अप्रैल को अंग्रेजों ने सोचा कि इस एकता को तोड़ने का यही वक्त है और उन्होंने दो प्रमुख नेताओं-डॉ. सत्यपाल और डॉ. सैफुद्दीन किचलू (एक हिंदू और एक मुस्लिम) को अमृतसर में गिरफ्तार कर लिया। 

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जलियांवाला बाग में शहीदी कुआं - फोटो : PTI
जलियांवाला बाग हत्याकांड आज भी हमारी यादों में जिंदा है, ना केवल इसलिए कि यह भयावह और हृदयविदारक था, बल्कि इसलिए भी कि यह स्वतंत्रता संग्राम में एक अहम मोड़ था। जिसकी वजह से यह और अधिक व्यापक हुआ। हालांकि अंग्रेजों ने नरसंहार की जानकारी को दबाने की पूरी कोशिश की, ताकि उस समय के राष्ट्रवादियों को नरसंहार के दौरान और उसके बाद हुए अत्याचारों की सही जानकारी ना मिल सके।

पर महात्मा गांधी और अन्य लोगों ने पंजाब में यातना की पूरी जानकारी को सामने लाने का निरंतर प्रयास किया। पंडित मदनमोहन मालवीय और अन्य लोगों के साथ उन्होंने हंटर कमेटी द्वारा प्रकाशित आधिकारिक ब्रिटिश रिपोर्ट को चुनौती देने के लिए पंजाब के लोगों की आंखों देखी जानकारियां एकत्र करनी शुरू की। 

हंटर कमेटी की रिपोर्ट प्रायः सार्वजनिक तौर पर साक्ष्य एकत्र कर तैयार की गई थी और यह काफी विस्तृत थी, लेकिन यह स्पष्ट तौर पर पूर्वाग्रही थी। क्योंकि जो लोग पंजाब में लागू मार्शल लॉ के तहत कैद किए गए थे, वे गवाही नहीं दे पाए क्योंकि उनमें से कई जेल में थे, और करीब 18 लोगों को मृत्युदंड दिया गया था।

अब जब हम महात्मा गांधी और अन्य लोगों की बदौलत पूरे पंजाब से इकट्ठा की गई गैर-आधिकारिक जानकारियों को पढ़ते हैं, तो हमें एहसास होता है कि लोगों को किस हद तक पीड़ा और भयावह यातना दी गई थी। कर्नल डायर द्वारा चेतावनी दिए बिना ना केवल लोगों को बेरहमी से मारा गया, बल्कि बचे हुए लोगों और शहीदों के परिवार निरंतर अंग्रेजों के निशाने पर रहे। 

अमृतसर, जहां इसे अंजाम दिया गया, ब्रिटिश सरकार का विशेष लक्ष्य बन गया था। जो कि 10 अप्रैल के दंगे में पांच अंग्रेजों को मारने का दुस्साहस करने के लिए शहरवासियों को सबक सिखाना चाहती थी। वास्तव में 9 और 10 अप्रैल की घटनाओं को कम प्रचार मिला, पर यही घटना थीं, जिन्होंने अंग्रेजों को नाराज किया, जो सोचते थे कि क्रांति की आग सुलग रही है।

उस समय पंजाब के नागरिक प्रशासन की मुख्य चिंता यह थी कि वे सत्याग्रह के दौरान अमृतसर की सड़कों पर बढ़ती हिंदू-मुस्लिम एकता के सामने खुद को असहाय मानते थे। जिसे महात्मा गांधी ने साल के शुरू में बेरहम रॉलेट ऐक्ट के खिलाफ शुरू किया था। 

बड़ी संख्या में लोग, पूर्ण सांप्रदायिक सद्भाव में, गांधी के आह्वान पर चल रहे थे, और शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन करने के लिए नियमित बैठकें कर रहे थे। लेकिन 10 अप्रैल को अंग्रेजों ने सोचा कि इस एकता को तोड़ने का यही वक्त है और उन्होंने दो प्रमुख नेताओं-डॉ. सत्यपाल और डॉ. सैफुद्दीन किचलू (एक हिंदू और एक मुस्लिम) को अमृतसर में गिरफ्तार कर लिया। 

जलियांवाला बाग - फोटो : File Photo
गिरफ्तारी के बाद हुए संघर्ष में प्रदर्शनकारियों पर गोली चलाई गईं, जिसमें 20 भारतीय मारे गए। उसके बाद निहत्थे, पर आक्रोशित भारतीयों ने पांच अंग्रेजों को मार दिया, जिसके परिणामस्वरूप 13 अप्रैल को नरसंहार हुआ। वह बर्बरता ब्रिटिश लेफ्टिनेंट गवर्नर सर माइकल ओ' डायर द्वारा अमृतसर के लोगों को ऐसा सबक सिखाने की कोशिश थी, जिसे वे कभी भूल न पाएं।

जाहिर है, जो बात ओ'डायर (यह डायर नहीं थे, जैसा कि अक्सर भूल की जाती है) नहीं समझ पाए, वह यह कि यह नरसंहार ब्रिटिश उत्पीड़न का एक मजबूत प्रतीक बन जाएगा और यह अंततः सभी भारतीय राष्ट्रवादियों को अपनी ओर आकर्षित कर लेगा। 

नरसंहार और उसके बाद लागू मार्शल लॉ की सूचना जैसे ही फैली (करीब दो-तीन महीने बाद, सेंसरशिप लागू कर दी गई और पंजाब में लोगों को धमकाया गया, जेल में डाला गया और यातना दी गई), जो लोग गांधी के रॉलेट ऐक्ट विरोधी सत्याग्रह में शामिल नहीं हुए थे, वे भी इसमें शामिल हो गए। लाला लाजपत राय, पं. मदनमोहन मालवीय, पं. मोतीलाल नेहरू, महात्मा गांधी जैसे जननेता और रवींद्रनाथ टैगोर, सरोजनी नायडू जैसे कवि-सबने अमृतसर में हुई घटनाओं के बाद ब्रिटिश शासन से अपना मोहभंग व्यक्त किया और तीन दशकों के भीतर ही भारत स्वतंत्र हो गया।

सवाल है कि ब्रिटेन अब भी माफी क्यों नहीं मांग रहा। हाल ही में मैं एक टीवी बहस में शामिल थी, जहां हैरान करने वाली बात बताई गई कि अगर मांफी मांगी जाती है, तो उससे वित्तीय उलझन पैदा हो जाएगी और इसी कारण ब्रिटिश प्रधानमंत्री टेरीजा मे ने केवल अफसोस जाहिर किया। 

यह भी स्पष्ट है कि शहीदों के परिवार केवल मौद्रिक लाभ के लिए ब्रिटेन से माफी मांगने के लिए नहीं कह रहे हैं। मैंने कई शहीदों के परिजनों से बातें कीं, उनमें से किसी को भी ब्रिटेन से कोई उम्मीद नहीं है। मेरे लिए यह भारत और भारतीयों के प्रति नस्लभेद है। यह वाकई शर्मनाक है कि ब्रिटेन लगातार हमें भिखारियों का देश मानता है। अगर वास्तव में शहीदों के परिवार कुछ चाहते हैं या उन्हें किसी चीज की जरूरत है, तो क्या उनकी मांगों को भारत सरकार के सामने नहीं रखा जाना चाहिए?

वे अंग्रेजों से क्यों कुछ चाहेंगे? मुझे यह भी समझ में नहीं आ रहा है कि अगर 'रिग्रेट'(अफसोस) और 'एपॉलॉजी'(माफी) एक ही चीज है, जैसा कि कई लोग बता रहे हैं, तो फिर वित्तीय निपटारे की बात केवल एक से ही क्यों जुड़ी है, दूसरे से क्यों नहीं? मुझे लगता है कि बहस के केंद्र में यह शब्दार्थ अब भी उसी नस्लवाद से पैदा हुआ है, जो सौ साल पहले था।

जैसा कि हम ब्रिटेन की संसद में हाल ही में हुई बहस से जानते हैं कि वहां अफसोस जताया गया, वहीं सिर्फ लेबर पार्टी ने कहा कि स्पष्ट तौर पर माफी मांगी जानी चाहिए। पर कंजरवेटिव सरकार, जिसके लिए विंस्टन चर्चिल नायक जैसे हैं, जाहिर है, ऐसा नहीं मानती। और कुछ लोग मुझे बताते हैं कि सौ साल बाद माफी मांगने का कोई मतलब नहीं है। ऐसे में माल्यार्पण करने और जलियांवाला बाग जाने का क्या मतलब है? पंजाब के दर्द को नजरंदाज करने वालों के लिए वह भी निरर्थक होना चाहिए।

जलियांवाला बाग पर एक पुस्तक पर काम करते और उस नरसंहार पर प्रदर्शनियों की शृंखला आयोजित करते हुए मेरा दृढ़तापूर्वक मानना है कि हमें उन असहाय लोगों, महिलाओं और बच्चों को नहीं भूलना चाहिए, जिनकी हत्या कर दी गई। आज इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र, दिल्ली में प्रदर्शनी हो रही है, जिसे देखा जाना चाहिए। यदि आप प्रदर्शनी में साक्ष्यों-तस्वीरों, आंकड़ों और दस्तावेजों को देखेंगे, तो मुझे यकीन है कि सभी इस बात से सहमत होंगे कि क्यों ब्रिटेन का माफी मांगना उचित और सम्मानजनक होगा।

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