संसद में वित्तमंत्री निर्मला सीतारमण ने बताया कि आयकर रिटर्न भरने वाले भारतीयों की संख्या वित्त वर्ष 2022-23 में 7.4 करोड़ हो गई है। यानी 140 करोड़ की आबादी वाले अपने देश में हर 19वां व्यक्ति आयकर रिटर्न दाखिल कर रहा है। लेकिन कटु सच्चाई यह है कि 7.4 करोड़ आयकर रिटर्न में से 5.16 करोड़ शून्य कर रिटर्न होते हैं। यानी आयकर रिटर्न भरने वाले 5.2 फीसदी भारतीयों में से 70 फीसदी लोग शून्य आयकर रिटर्न दाखिल करते हैं।
इसका मतलब है कि सिर्फ 2.24 करोड़ भारतीय, यानी आबादी का मात्र 1.6 फीसदी हिस्सा भारत में आयकर का भुगतान करता है। इन रिटर्न दाखिल करने वालों के एक बड़े हिस्से को जांच और यहां तक कि रिटर्न दाखिल करने
से छूट देना बेहतर हो सकता है और 1.6 फीसदी में से शीर्ष 10 फीसदी पर ध्यान केंद्रित करना जरूरी है, जो वास्तव में आयकर चुकाते हैं। कुछ लोगों का अनुमान है कि शून्य कर सीमा बढ़ाकर और इन सीमाओं से कम आय वाले लोगों को रिटर्न दाखिल करने से छूट देकर कर-प्रशासन लागत में कमी लाई जा सकती है। वे संसाधन उन क्षेत्रों पर लगाए जा सकते हैं, जो उपभोग क्षमता होने के बावजूद कर रिटर्न दाखिल नहीं करते हैं।
दुनिया भर में और भारत में भी, हम देखते हैं कि जब कर की दर घटाई जाती है, तो कर संग्रह में वृद्धि होती है। इसे लाफर वक्र कहा जाता है। लाफर वक्र बताता है कि यदि कर-दर को एक निश्चित सीमा से ऊपर बढ़ाया जाता है, तो कर राजस्व में कमी आ सकती है, क्योंकि उच्च कर दर लोगों को काम करने से हतोत्साहित करती है। इसी तरह, करों में कटौती से उच्च कर राजस्व प्राप्त हो सकता है। इसका एक उदाहरण यह है कि कुछ साल पहले कॉरपोरेट सीमांत कर दरों में कटौती करने के बाद कॉरपोरेट कर संग्रह में वृद्धि हुई। मध्यम वर्ग, विशेष रूप से वेतनभोगी कर दाताओं को ज्यादा राहत देने की जरूरत है, क्योंकि मुद्रास्फीति ने कर-दर के पिछले स्तर को काफी कम कर दिया है। इसी तरह 60 वर्ष से ऊपर के वरिष्ठ नागरिकों को, जिनके पास कोई सामाजिक सुरक्षा लाभ नहीं है, उच्च चिकित्सा बीमा और अन्य लागतों के लिए भत्ते दिए जाने चाहिए, ताकि वे गरिमापूर्ण जीवन जी सकें।
आजादी के समय कल्याणकारी उपाय के तहत कृषि आय को आयकर से छूट दी गई थी, जो एक प्रशंसनीय कदम था। यह देखते हुए कि 60 फीसदी आबादी अब भी ग्रामीण क्षेत्रों में रहती है और जीडीपी के 15 फीसदी पर निर्भर है, अधिकांश किसानों को व्यक्तिगत कर से छूट दी जानी चाहिए। हालांकि अमीर भूस्वामियों और कृषि मूल्य शृंखलाओं पर नियंत्रण रखने वाले अभिजात वर्ग की पहचान करने और उन पर कर लगाने की आवश्यकता है। अक्सर हम देखते हैं कि बहुत से लोग कृषि आय के तहत कर छूट का दावा करते हैं, जो और कुछ नहीं, मनी लॉन्ड्रिंग आय को कर-मुक्त करने का उपाय है। उन लोगों को भी कर के दायरे में लाने की जरूरत है, जो कराधान से दूर रहने के लिए कानूनी खामियों का लाभ उठाते हैं। अन्यथा यह 1.6 फीसदी करदाताओं के साथ अन्याय होगा।
वेतनभोगी लोग, जो वोटबैंक नहीं है, और इसलिए बहुत कम राहत मिलती है, उन्हें विशेष भत्ता दिए जाने की जरूरत है, क्योंकि स्रोत के स्तर पर ही उनसे आयकर काटकर नियोक्ता सरकार के खाते में जमा कर देते हैं। एक वेतनभोगी व्यक्ति अपनी कमाई का एक बड़ा हिस्सा (48 फीसदी) कर चुकाने में खर्च करता है। वेतनभोगी वर्ग को राहत देने से होने वाले कर-राजस्व के नुकसान की भरपाई अप्रत्यक्ष कर संग्रह में वृद्धि से की जा सकती, क्योंकि इससे खपत को बढ़ावा मिलेगा और औपचारिक क्षेत्र की बचत से आर्थिक गतिविधि बढ़ सकती है। देश में खरीदारी करने वाला हर व्यक्ति उत्पाद शुल्क, सीमा शुल्क और जीएसटी का भुगतान करता है।
वैश्विक स्तर पर औसत कर-जीडीपी अनुपात 14.4 है, जबकि ओईसीडी देशों के लिए यह 16.3 है। भारत का कर-जीडीपी अनुपात 12 है। छोटे प्रशांत द्वीप राष्ट्र नाउरू में कर-जीडीपी अनुपात सबसे अधिक 48 है, जिसका अर्थ है कि सरकार देश की कुल अर्थव्यवस्था के लगभग आधे के बराबर कर एकत्र करती है। दूसरे स्थान पर डेनमार्क में यह अनुपात 35 है।
अर्थशास्त्र में कौटिल्य या चाणक्य ने कराधान के संबंध में बहुत अच्छी सलाह दी है-कि इसकी गणना आसान होनी चाहिए, भुगतान सुविधाजनक होना चाहिए, कर-प्रशासन सस्ता होना चाहिए और इसका बोझ न्यायसंगत होना चाहिए। भारतीय कराधान आज 1.6 फीसदी करदाताओं पर भारी बोझ डालता है, जो कुल संग्रह का 27 फीसदी भुगतान करते हैं। जरूरत इस बात की है कि आबादी का बड़ा हिस्सा किफायती तरीके से कर चुकाए।
सरकार ने कर न चुकाने वाले वर्ग को कर दायरे में लाने के लिए कई कदम उठाए हैं। टीडीएस और टीसीएस (स्रोत पर एकत्रित कर) का दायरा बढ़ाया गया है, ताकि कई लेनदेन को उनके दायरे में लाया जा सके। कर विभाग अधिक खपत करने वाले, लेकिन कर न चुकाने वालों पर जीएसटी डाटा के माध्यम से अंकुश लगाने और उन्हें कर के दायरे में लाने में सक्षम है। उम्मीद है कि सरकारी तंत्र कर चोरों पर लक्षित कार्रवाई करके कर दायरे को बढ़ाने में सक्षम होगा। इससे अधिक बोझ वाले वर्गों को कर राहत देने के लिए राजकोषीय गुंजाइश बनेगी। लेकिन ऐसा तभी संभव है, जब ज्यादा लोग करों का भुगतान करें।