देश का जो काला धन विदेशी बैंकों में जमा है, उसे हर हाल में वापस लाना ही चाहिए। यूपीए सरकार के समय काले धन को वापस लाने के लिए जिस तरह से आवाजें उठीं, और पिछली सरकार ने इस दिशा में जो शुरुआत की, उसे देखते हुए नई सरकार को इस मोर्चे पर आगे बढ़ना ही था। अब तक हम जहां पहुंचे हैं, उसमें तीन नामों का खुलासा हुआ है। बल्कि इन नामों का खुलासा करना पड़ा है। मगर यहीं से सवाल भी उठे हैं कि हम इस मामले को किस तरह देख रहे हैं। इतने गंभीर मुद्दे पर क्या हम वास्तव में सही रास्ते पर चल रहे हैं?
पहले यह जानें कि काला धन है क्या? बहुत से लोगों ने अवैध तरीके से कमाए पैसे बाहर भेजे हैं। इस कमाई पर भारत सरकार को टैक्स नहीं मिला है। साथ ही, इस पैसे का देश में निवेश हो सकता था, उससे भी हम वंचित रहे हैं। काले धन का एक और रूप वह पैसा है, जो हवाला आदि के जरिये बाहरी देशों में भुगतान लिया गया है। जैसे बोफोर्स के मामले में इसे देख सकते हैं। इन दोनों स्थितियों में भारत को भारी नुकसान हुआ है। यह धन कितना है, इसका कोई ठीक-ठीक हिसाब नहीं। इसका केवल आकलन ही किया जाता है। लोगों को यह भी मालूम है कि काले धन को वापस लाने की प्रक्रिया ठीक तरह से चली, तब भी यह पैसा एकाएक वापस नहीं आने वाला। इसमें समय लगेगा और जरूरी नहीं कि एक-एक पाई वापस आ ही जाए। पर सरकार अगर सही दिशा में कदम उठाते हुए दिखे, तो लोगों को संतोष होगा कि इस गंभीर मुद्दे पर सरकार सक्रिय दिख रही है।
वस्तुतः काले धन की वापसी में कई पहलुओं पर गौर करना पड़ेगा। जैसे, पैसा वापस लाने की कोशिश करते हुए हमें विदेशी संस्थाओं की शर्तों और नियमों को देखना पड़ेगा। उनका उल्लंघन नहीं किया जा सकता। अगर यह कहा गया हो कि जो सूची हमें सौंपी गई है, वह गोपनीय है, उसे सार्वजनिक नहीं किया जा सकता, तो हम उसे सार्वजनिक नहीं कर सकते। सरकार केवल अपने हित में या जनता को संतुष्ट करने के लिए नियत सीमा से आगे नहीं बढ़ सकती। एचएसबीसी बैंक के 627 खातेदारों की सूची को हमारी सरकार ने बताने से जब इन्कार कर दिया था, तो इसका ढाल संधि की शर्तों को ही बनाया गया। लेकिन सुप्रीम कोर्ट के कहने पर वह सूची अदालत को सौंपी गई। यह जानना दिलचस्प है कि क्या सचमुच नामों का खुलासा करने में किसी तरह की अड़चन थी।
इस गंभीर मुद्दे पर राजनीतिक पार्टियों का रवैया ठीक नहीं। केंद्र सरकार के मंत्री यह कहते हुए पाए गए कि सूची उजागर होने पर कांग्रेस को शर्मिंदा होना पड़ेगा। कांग्रेस का जिक्र कर भ्रम बनाए रखने का सरकार का तरीका ठीक नहीं था। उसने पहले तो नियम-कानून का हवाला देते हुए नाम उजागर करने से इन्कार किया। काले धन की वापसी की प्रक्रिया में किसी को निशाना बनाने की कोशिश नहीं होनी चाहिए। बल्कि प्रयत्न यही हो कि किस तरह देश का पैसा वापस लाया जा सके और ऐसी प्रक्रिया बने, जिससे आगे इस तरह पैसा बाहर न जा सके। सुप्रीम कोर्ट ने जिन व्यवस्थाओं के तहत इस मामले की तह में जाने की कोशिश की है, उसमें एसआईटी को यह स्पष्ट करना चाहिए कि वास्तव में विदेशी मुल्कों के साथ हम किन नियमों से बंधे हुए हैं। सुप्रीम कोर्ट द्वारा गठित एसआईटी के लिए यह अहम है कि जो नाम सामने आए हैं, उनके खिलाफ जांच टीम सुबूत इकट्ठा करे। यह प्रक्रिया अब तेजी से चलनी चाहिए।
सवाल यह है कि 627 नामों की सूची में से सरकार ने सिर्फ तीन ही नाम उजागर क्यों किए। या तो सभी के नाम जाहिर करने चाहिए थे या इन तीन नामों को सार्वजनिक करने से बचना चाहिए था। अब यह देखना महत्वपूर्ण है कि जो सूची है, उसे लेकर सर्वोच्च न्यायालय किस तरह का फैसला ले सकता है। उसके बाद ही आगे की प्रक्रिया का अंदाजा लग सकता है। अभी तो यह भी जानना होगा कि यह सूची अपने आप में पूरी है या कुछ नाम और हैं। इसी तरह पैसे को लेकर भी कोई ठीक-ठीक आकलन फिलहाल हमारे पास नहीं है। एक सूचना यह है कि एचएसबीसी के जितने खातेदारों की सूची सौंपी गई, उनमें से 289 खातों में कुछ है ही नहीं। यानी सरकार की सक्रियता की भनक लगते ही खातेदार भी सक्रिय हो गए। साफ है कि जैसे-जैसे चीजें खुलती जाएंगी, हम इस बारे में और अवगत हो सकेंगे। लेकिन यह जानकारी हमें निश्चित प्रक्रिया के जरिये ही मिल सकेगी। बहुत कुछ विदेशी सरकारों के तौर-तरीके, उनकी नीति और हमारी सरकार की तत्परता पर निर्भर है। इस मामले में निश्चित तौर पर शीर्ष अदालत और जनभावना का दबाव पड़ेगा।
अब देश यह देखना चाहेगा कि पैसा वापस लाने के लिए सरकार किस तरह प्रयत्न कर रही है। केवल तीन नामों के खुलासे से संतुष्ट होने का सवाल नहीं। लोगों को आभास है कि काले धन के रूप में अरबों-खरबों रुपये विदेशी बैंकों में जमा हैं। इस संदर्भ में प्रख्यात वकील राम जेठमलानी और दूसरे कुछ प्रबुद्ध लोगों की इस चिंता की अनदेखी नहीं की जा सकती कि जो सूची उपलब्ध हुई है, उसमें कुछ खास नाम गायब हैं। यह जानना चाहिए कि किन आधारों पर यह कहा जा रहा है। अगर सचमुच ऐसा है, तो यह गंभीर बात है।
इसी कारण यह प्रश्न और महत्वपूर्ण हो उठता है कि हम क्या वास्तव में काले धन को वापस लाने का ईमानदार प्रयत्न कर रहे हैं या यह कोशिश कुछ लीपापोती, कुछ छिटपुट परिणाम, कुछ राजनीतिक स्वार्थों की बलि चढ़ने की कोशिश से आगे नहीं जाएगी। सरकार के प्रयास चाहे जो हों, और विपक्ष की आलोचना का स्तर भी भले कुछ हो, सारा कुछ इस पर निर्भर करेगा कि एसआईटी कितनी तत्परता से खातेधारकों के खिलाफ साक्ष्य जुटाती है। खासकर सुप्रीम कोर्ट के निर्णय के बाद वहीं से आगे की दिशा भी मिलेगी।
(लेखक सर्वोच्च न्यायालय के वरिष्ठ वकील हैं)