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हाइपरस्पेस: अगर प्रकाश की गति पार हो जाए...आखिर हम उस रफ्तार से यात्रा क्यों नहीं कर सकते?

रॉबर्ट शेरर
Updated Sun, 24 Sep 2023 08:01 AM IST

सार

भारतीय योगियों के बारे में कथाएं प्रचलित हैं कि वे समय को पार कर जाते थे। हाइपरस्पेस जैसी कल्पनाएं अगर सच साबित हों, तो सुदूर आकाशगंगाओं तक आसानी से पहुंचा जा सकता है, जहां प्रकाश की गति से पहुंचने में भी हजारों वर्ष लग जाएं। विज्ञान कथाकारों की मानें, तो इसका रहस्य दो क्षणों के बीच के अंतराल में छिपा है।
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सांकेतिक तस्वीर - फोटो : Pixabay


लेकिन सवाल यह उठता है कि ये अंतरिक्ष यान ग्रहों के बीच की अनंत खाई को पार कैसे करते हैं? असिमोव इस सवाल का जवाब देते हैं। अगर हम सामान्य अंतरिक्ष की बात करें, तो इन ग्रहों के बीच यात्रा अगर प्रकाश की गति से भी करें, तो कई हजार साल लगेंगे। लेकिन, हाइपरस्पेस के द्वारा कोई व्यक्ति हजारों वर्ष की यात्रा को कुछ ही क्षणों में पूरा कर सकता है। क्या है यह हाइपरस्पेस? हाइपरस्पेस दरअसल, एक काल्पनिक क्षेत्र है, जो न आकाश है, न समय, न पदार्थ है, न ऊर्जा, न तो यह ‘कुछ’ है और न ‘कुछ नहीं’। इस हाइपरस्पेस का रहस्य दो क्षणों के बीच के अंतराल में कहीं छिपा होता है। इसे आप अनुभव भी कर सकते हैं। अगर आप ध्यान या मेडिटेशन के अभ्यासी हैं, तो आप दो क्षणों के बीच उस बिंदु का अनुभव कर सकते हैं, जहां समय ठहरा हुआ प्रतीत होता है।


आखिर असिमोव किस अंतराल के बारे में बात कर रहे हैं? क्या वह प्रकाश से भी तेज गति से चलने के रहस्य से वाकिफ थे? जहां तक जानकारी की सीमा है, वहां तक प्रकाश से तेज चलना नामुमकिन है। जाहिर है कि दो आकाशगंगाओं के बीच की यात्राओं को वर्तमान ज्ञान के आधार पर करना संभव नहीं है। ब्रह्मांडीय गति को संभव बनाने के लिए असिमोव जैसे विज्ञान लेखकों ने अपनी कल्पना से हाइपरस्पेस, सबस्पेस, वार्प-ड्राइव्स जैसे जो विचार गढ़े, वे काल्पनिक होते हुए भी इतने आकर्षक हैं, मनुष्य सहसा उन पर यकीन करना चाहता है।


आखिर हम प्रकाश की गति से यात्रा क्यों नहीं कर सकते? पहले तो लोग ध्वनि के बारे में भी यही राय रखते थे। लेकिन, अब ध्वनि मनुष्य के लिए कोई बाधा नहीं रह गई है। हालांकि, प्रकाश की बाधा से पार पाना कुछ ज्यादा ही मुश्किल है। जब 19वीं सदी में वैज्ञानिकों ने प्रकाश का सिद्धांत विकसित किया, तब वह एक पहेली के साथ आया। प्रकाश की चाल होती है करीब 186000 मील प्रति सेकेंड। दिलचस्प बात यह है कि अगर आप इस चाल के 99 प्रतिशत चाल से चल रहे हों और आपका कोई दोस्त एकदम स्थिर खड़ा हो, तब भी आप दोनों को ही प्रकाश एक ही चाल से खुद से दूर जाता दिखेगा।


इस पहेली को हल करने के बजाय अल्बर्ट आइंस्टीन ने इसे अपना लिया और इसके आधार पर ही एक सिद्धांत बनाया, जिसे विशेष सापेक्षता का सिद्धांत कहते हैं। इस सिद्धांत के अनुसार, प्रकाश की गति सभी के लिए बराबर होती है। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि कोई प्रकाश की तुलना में कितनी गति से चल रहा है। प्रकाश के इस व्यवहार के आधार पर आइंस्टीन ने यह विचार दिया कि जब कोई व्यक्ति ज्यादा गति से यात्रा करेगा और अगर वह अपनी गति लगातार बढ़ाता जाए, तो दिक यानी स्थान और काल, दोनों में ही खिंचाव आएगा। जाहिर है कि विशेष सापेक्षता का सिद्धांत ब्रह्माण्डीय गति की सीमा बनाता है।


सापेक्षता दरअसल आधुनिक भौतिक विज्ञान की बुनियाद है। हमारे पास इस बात पर संदेह का कोई कारण नहीं है कि किसी ने प्रकाश से तेज चलने वाली कोई वस्तु देखी हो। लेकिन यहां एक दिलचस्प बात छिपी है। हम जब प्रकाश की गति की बात करते हैं, तो हम निर्वात में प्रकाश की गति की बात करते हैं। लेकिन जब यही प्रकाश किसी दूसरे माध्यम में, मिसाल के लिए पानी या कांच में, चलता है, तब इसकी गति कम हो जाती है। पानी या कांच में जो चीज प्रकाश से भी ज्यादा तेज गति से चलती है, उसे सेरेनेकोव विकिरण कहा जाता है, जो वही है, जो नाभिकीय रियेक्टरों में पानी के नीचे नीली चमक के साथ दिखता है।


हालांकि, प्रकाश की गति से पार पाने का सबसे प्रशंसनीय सिद्धांत भौतिक विज्ञानी मिगुएल अल्क्यूबिएरे ने दिया। अगर किसी बर्तन में ग्रीस लगी हो और आप उसमें पानी भर दें। फिर जब आप उसमें साबुन की एक बूंद डालेंगे, तो ग्रीस उड़कर बर्तन के किनारों पर चली जाएगी। अल्क्यूबिएरे का ‘वार्प ड्राइव’ सिद्धांत अंतरिक्ष में यही काम करता है। इसके अनुसार, पदार्थ के उपयुक्त वितरण से अंतरिक्ष यान के आगे के अंतरिक्ष को सिकोड़ा जा सकता है। फिर, इसे पीछे की तरफ खींचते हुए अंतरिक्ष यान के चारों ओर एक बुलबुला तैयार किया जा सकता है। अब अंतरिक्ष यान पूरी तरह से बुलबुले के भीतर होगा और यह बुलबुला आपकी इच्छानुसार गति से चल सकता है। अब चूंकि बुलबुले के सापेक्ष अंतरिक्ष यान आराम की स्थिति में है, इसलिए यान और उसमें बैठे हुए लोगों को यह गति बिल्कुल महसूस नहीं होगी।
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लेकिन, यहां बस एक समस्या होगी। अल्क्यूबिएरे का यह अंतरिक्षीय बुलबुला बनने के लिए कुछ खास अंतरिक्षीय दशाओं की जरूरत होगी। वैज्ञानिक इन दशाओं के बारे में निश्चित तौर पर कुछ भी कह पा रहे हैं। इसके अलावा, अगर अंतरिक्ष में ऐसा बुलबुला तैयार करने की कोशिश होती है, तो इसके नतीजे कुछ भी हो सकते हैं। नकारात्मक ऊर्जा घनत्व, या वार्म होल या फिर टाइम मशीन जैसा कुछ अनुभव भी हो सकता है। जाहिर है कि अल्क्यूबिएरे के सिद्धांत को पूरी तरह खारिज बेशक न किया जा सकता हो, लेकिन इसे स्वीकारा भी नहीं जा सकता। और, इसके साथ ही सवाल घूम कर फिर वहीं खड़ा हो जाता है कि क्या मानवता कभी सुदूर आकाश गंगाओं तक पहुंच सकेगी? फिलहाल तो यही लगता है कि प्रकाश से तेज गति से चलने का दरवाजा तो हमारे मुंह पर बंद कर दिया गया है। क्या हमें सुदूर अंतरिक्ष में यात्रा करने का कोई और मार्ग तलाशना होगा?

-लेखक वेंडरबिल्ट यूनिवर्सिटी में भौतिकी व अंतरिक्ष विज्ञान के प्रोफेसर हैं।

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