मुझे संसद में दिए गए प्रधानमंत्री के भाषण से संबंधित रिपोर्ट्स पढ़ते हुए फुले के इस लेखन की याद आ गई, जिसमें उन्होंने भारतीयों को 'विदेश की विध्वंसक विचारधारा'के प्रति चेतावनी दी। एक ओर अकेले संघर्षरत सुधारक का विशाल विश्वबंधुत्व है, तो उसके बरक्स दूसरी ओर भारत के सबसे शक्तिशाली व्यक्ति का व्यामोहग्रस्त विदेशी-द्वेष। स्पष्ट है कि हिंदू मन औपनिवेशिक शासन में अधिक खुला हुआ था, आज की तुलना में जब हम स्वाभिमानी और स्वतंत्र देश हैं। पूरी 19वीं सदी के दौरान और 20वीं सदी तक हिंदू समाज के नेता अपनी कमजोरियों के प्रति पूरी तरह से जागरूक थे। वे जानते थे कि हिंदू जिन निर्बलताओं से पीड़ित हैं, उसका बड़ा हिस्सा उनकी अपनी कमजोरियों से उपजा है। हमारी नाकामियों का ठीकरा उन द्वेषपूर्ण विदेशियों पर नहीं फोड़ा जा सकता, जिन्होंने हमें उपनिवेश बनाया था।
हिंदू सामाजिक सुधार की आधुनिक परंपरा राम मोहन राय से शुरू होती है। हिंदू शुद्ध, पूर्ण और अचूक हैं (जैसा कि हमारे आज के हिंदुत्ववादी मानते हैं) इस विचार से अलग होकर राय ने देशवासियों को तीन खामियों के कारण दोषी माना-महिलाओं के प्रति उनका व्यवहार, आधुनिक ज्ञान के प्रति उनकी कम रुचि और तर्क के बजाय धर्मग्रंथ में उनका भरोसा। समाज सुधार से जुड़ी इन तीन लड़ियों को राय से प्रेरित कार्यकर्ताओं ने आगे बढ़ाया, जिन्होंने अन्य चीजों के अलावा विवाह की उम्र बढ़ाने, विधवा विवाह, पुरुषों और महिलाओं के लिए आधुनिक शिक्षा को प्रोत्साहित करने, जाति संबंधी भेदभाव खत्म करने और स्वतंत्र प्रेस के जरिये खुली बहस की संस्कृति को बढ़ावा देने पर जोर दिया था। राम मोहन राय ने पश्चिम का व्यापक दौरा किया था और अनेक पश्चिमी विचारकों और कार्यकर्ताओं से मुलाकात की थी। संस्कृत, बंगाली और पर्सियन के एक विद्वान के रूप में राय की अपनी समझ थी, जिसके आधार पर वह कदम उठा सके और अपनी जगह सुनिश्चित कर सके।
राम मोहन राय की तरह टैगोर भी एक बंगाली के रूप में भारत के अन्य हिस्सों को लेकर गहराई से उत्सुक थे और एक भारतीय के रूप में दुनिया के दूसरे हिस्सों के बारे में उत्सुकता से जानने के इच्छुक थे। उल्लेखनीय है कि विश्वबंधुत्व की उनकी समझ (जैसा कि अक्सर भारतीयों के साथ होता है) सिर्फ यूरोप और उत्तर अमेरिका तक सीमित नहीं थी। ज्ञान की उनकी खोज उन्हें जापान, चीन, जावा, ईरान और लैटिन अमेरिका तक ले गई। इन यात्राओं के परिणामस्वरूप उन्होंने ग्रामीण बंगाल में एक विश्वविद्यालय की स्थापना की और उसका नाम रखा, 'विश्व भारती'। 1920 में महात्मा गांधी ने असहयोग आंदोलन शुरू किया था। महात्मा से एक निजी मुलाकात में टैगोर ने उनसे कहा था, आज सारी दुनिया स्वार्थी और संकीर्ण राष्ट्रवाद के पंथ से पीड़ित है...मैं इस निष्कर्ष पर पहुंचा हूं कि भारतीय होने के नाते हमें न केवल पश्चिम से काफी कुछ सीखने की जरूरत है, बल्कि हमें योगदान करने की भी जरूरत है। इसलिए हमें पश्चिम से मुंह नहीं मोड़ना चाहिए। लेकिन हमें खुद से भी सीखना होगा कि कैसे शिक्षा के जरिये एक साझा समझ हासिल की जाए और सहयोग किया जाए।
राम मोहन राय और रवींद्रनाथ टैगोर स्वप्नदर्शी थे, जिन्होंने अन्य संस्कृतियों से जुड़ाव में अपनी खुद की संस्कृति का संवर्धन देखा। यही बात उस समय के अन्य भारतीय सुधारकों पर भी लागू होती है। इसीलिए अमेरिका में दासता के उन्मूलन का फुले द्वारा उल्लेख करना जातिगत भेदभाव को खत्म करने के उनके खुद के जीवन भर के संघर्ष में एक प्रेरक उदाहरण बना। फुले खुद कभी भारत से बाहर नहीं गए; लेकिन उनके महान उत्तराधिकारी भीमराव आंबेडकर गए थे। फुले की तरह उन्होंने भी अश्वेतों के साथ अमेरिका में और भारत में दलितों के साथ होने वाले व्यवहार में समानताएं देखीं।
राय से लेकर आंबेडकर और फुले, गोखले, टैगोर, गांधी, पेरियार, कमलादेवी चट्टोपाध्याय तथा अनेक अन्य लोगों तक समाज सुधारकों की लंबी शृंखला है, जिन्होंने अपने देशवासियों को अतीत के बोझ से मुक्त करने के लिए अनथक काम किया। वे जानते थे और जैसा कि उन्होंने खुद भी अनुभव किया कि हिंदू समाज असमान, अशिक्षित और अमुक्त है। ये सुधारक अपने समाज को, महिलाओं और निचली जातियों के प्रति भेदभाव को खत्म कर कहीं अधिक समान; स्कूल और कॉलेजों में आधुनिक सेकुलर शिक्षा को बढ़ावा देकर और इस तक सबकी पहंच बनाकर अधिक शिक्षित; और सार्वजनिक विमर्श तथा बहस की संस्कृति को प्रोत्साहित कर और अधिक उदार बनाने के लिए प्रतिबद्ध थे। हिंदू मन को खोलने के लिए सुधारकों की पीढ़ियों ने जो काम किए वह भारत के संविधान के निर्माण और उसे अंतिम रूप देने में परिलक्षित होता है। इसमें दुनिया की श्रेष्ठ चीजों, यूरोप और अमेरिका के कानूनों और विचारों को समाहित किया गया।
उल्लेखनीय है कि अन्य सांविधानिक परंपराओं के प्रति इस उदारता ने राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ को नाराज कर दिया। 1949 के नवंबर के आखिरी हफ्ते में भीमराव आंबेडकर द्वारा संविधान का अंतिम मसौदा प्रस्तुत किए जाने के बाद आरएसएस के मुखपत्र ऑर्गनाइजर ने शिकायत की, 'भारत के नए संविधान के बारे में सबसे खराब बात यह है कि इसमें कुछ भी भारतीय नहीं है...इसमें प्राचीन भारतीय सांविधानिक कानूनों , संस्थानों, नामावलियों और पदावलियों का जिक्र नहीं है।' संघ सोचता है कि हिंदुओं को अन्य संस्कृतियों और देशों से कुछ सीखने की जरूरत नहीं है। उसने दावा किया कि हिंदुओं को दूसरों को ज्ञान देने के लिए धरती पर भेजा गया। एम एस गोलवलकर से लेकर आरएसएस के तमाम विचारकों के लेखन में यह नजर आता है जिसमें हिंदुओं को 'विश्व गुरु' बताया जाता है। आरएसएस का वैश्विक दृष्टिकोण विजयोन्माद और व्यामोह का मिश्रण है। एक ओर तो हिंदुओं के वैश्विक प्रभुत्व की जोशीली घोषणा है। दूसरी ओर अन्य धर्मों खासतौर से मुस्लिम धर्म को मानने वाले भारतीयों को कलंकित किया जाता है।
संघ परिवार के सत्ता में उभार और बढते प्रभाव के बाद से हिंदू मन संकीर्ण होता जा रहा है, मुक्त विचार में, आत्मालोचना में और आत्मनिरीक्षण में। अब जबकि हमारे राजनीतिक और सांस्थानिक जीवन में भाजपा और आरएसएस का प्रभुत्व है, सरकार के उच्च स्तर पर मन का बंद होना कई गुना बढ़ गया है, जैसा कि केंद्रीय मंत्री और मुख्यमंत्री विज्ञान पर अंधविश्वास को तरजीह दे रहे हैं, महिलाओं की स्वतंत्रता पर अंकुश लगा रहे हैं और पश्चिम को एक अंतराल के बाद निशाना बना रहे हैं। हिंदू मन के बंद होने का प्रदर्शन उन पत्रकारों, कलाकारों, लेखकों और फिल्मकारों पर हमले के रूप में प्रदर्शित हो रहा है, जो हमारे समाज में लगातार हो रहे अन्याय से जुड़े सच को सामने लाने का साहस करते हैं।
हवाई यात्रा और इंटरनेट का ईजाद होने से पहले ज्योतिराव फुले सामाजिक उद्धार की प्रक्रिया के अध्ययन के लिए उस देश में मानसिक रूप से पहुंच गए थे, जो कि उनकी अपनी भूमि से सुदूर स्थित था। आज जब 21 वीं सदी में दुनिया एक दूसरे से गुंथ गई है, भारत के प्रधानमंत्री हमसे कह रहे हैं कि हमें अपने भीतर सिमट जाना चाहिए। हम उनकी बात नहीं सुनेंगे।