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शिवाजी महाराज के बारे में यह बात आप नहीं जानते होंगे

Fri, 20 Feb 2015 09:01 AM IST
सत्यकाम शास्त्री
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छत्रपति शिवाजी वीरता और सुशासन के लिए प्रसिद्ध थे। समर्थ रामदास के मार्गदर्शन में उन्होंने अपने राज्य की स्थापना और लोक स्वाभिमान के जागरण के साथ आध्यात्मिक विकास के लिए भी काम किया था। एक बार अपने गुरु के साथ वह कहीं भ्रमण पर जा रहे थे। अपनी सफलताओं और नीति-न्यायनिष्ठा के कारण उन्हें कभी-कभी अभिमान भी होने लगता।
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गुरु के साथ प्रवास करते हुए उन्हें और गुरु को भी भान हुआ कि लोग वाकई सुखी और संतुष्ट होने लगे थे। यह देखकर शिवाजी के मन में अभिमान जोरों से उभरने लगा। वह सोचने लगे कि सचमुच वह एक महान राजा हैं।

समर्थ रामदास सर्वज्ञानी थे। वह अपने शिष्य के भावों को समझ गए और तत्काल उसे सुधारने का निर्णय लिया। चलते-चलते उन्होंने देखा कि रास्ते में ही पत्थर का बड़ा-सा टुकड़ा पड़ा था। गुरु जी ने सैनिकों को उसे तोड़ने का निर्देश दिया। जैसे ही सैनिकों ने पत्थर के दो टुकड़े किए, एक अविश्वसनीय दृश्य दिखा। पत्थर के बीचोबीच कुछ पानी जमा था और उसमें एक छोटा-सा मेंढक रह रहा था। पत्थर टूटते ही वह अपनी कैद से निकल कर भागा।
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सब अचरज में थे कि आखिर वह इस तरह कैसे कैद हो गया और इस स्थिति में भी वह अब तक जीवित कैसे था? अब समर्थ रामदास राजा की तरफ पलटे और पूछा, अगर आप ऐसा सोचते हैं कि आप इस राज्य में हर किसी का ध्यान रख रहे हैं, तो बताइए, पत्थरों के बीच फंसे उस मेंढक का ध्यान कौन रख रहा था?

राजा को अपनी गलती का एहसास हो चुका था। उन्हें अपने अभिमान पर पछतावा होने लगा। गुरु की कृपा से वह जान चुके थे कि ईश्वर ने ही हर एक जीव को बनाया है, और वही है, जो सबका ध्यान रखता है।
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