हाल ही में सर्वोच्च न्यायालय ने पुरुषों से दुष्कर्म संबंधी जनहित याचिका को खारिज कर दिया है। याचिका में मांग की गई थी कि महिलाओं को भी पुरुषों की तरह दुष्कर्म और यौन उत्पीड़न जैसे मामलों में दंडित किया जाए, क्योंकि पुरुष भी दुष्कर्म पीडि़त हो सकते हैं। न्यायालय ने यह कहकर याचिका खारिज कर दी कि कानून बनाना संसद का काम है और वही इस पर फैसला ले सकती है। याचिका में संविधान के अनुच्छेद 14 और 15 में दिए गए बराबरी के अधिकार को आधार बनाते हुए, भारतीय दंड विधान की धारा 354(छेड़खानी), 354 ए, बी, सी, डी (यौन उत्पीड़न) और धारा 375 (दुष्कर्म) की वैधानिकता को चुनौती दी गई थी। याचिका में उस सर्वे का भी जिक्र था, जो हाल ही में 222 भारतीय पुरुषों पर किया गया, और जिसमें यह पाया गया कि 16.1 प्रतिशत पुरुषों को संबंध बनाने के लिए बाध्य किया गया था।
यह सच है कि भारतीय संविधान का मूलाधार 'समानता' है परंतु अनेक वैधानिक प्रावधान इस कसौटी पर खरे नहीं उतरते, क्योंकि समाज से लेकर विधि निर्माता तक यह मान कर चलते हैं कि पुरुष की भूमिका सदैव शोषक की रही है। यही कारण है कि महिलाओं से दुष्कर्म की तरह पुरुषों से दुष्कर्म के मामले पर कोई व्यापक अध्ययन नहीं हुआ है। विश्व भर में यह मानसिकता व्याप्त है, जबकि अनेक ऐसे मामले सामने आए हैं, जो इस सोच को नकार देते हैं। उल्लेखनीय है कि लाइबेरिया में 14 साल तक चले गृहयुद्ध में महिलाएं ही नहीं, पुरुष भी यौन-उत्पीड़न और यौन-हिंसा के इस हद तक शिकार हुए कि वे अब मानसिक रूप से बीमार हो चुके हैं। डेनमार्क के 7,603 कर्मचारियों से जुड़े एक अध्ययन के अनुसार, 48 महिलाओं की तुलना में 31 पुरुषों ने सहकर्मियों द्वारा यौन उत्पीड़न की बात स्वीकार की है।
वहीं 2009 में ईक्वल एंप्लॉयमेंट अमेरिका ऑपर्च्युनिटी कमीशन ने कार्यक्षेत्र में यौन उत्पीड़न का सर्वे कराया, और उन्होंने पाया कि कार्यक्षेत्र में पुरुषों के यौन उत्पीड़न की 2,094 शिकायतें आईं। यह कमीशन के सामने आई कुल शिकायतों का 16.4 प्रतिशत था। इस संदर्भ में अगर भारत की बात की जाए, तो उंगलियों पर गिने जाने वाले शोधों में से एक शोध, जो कि 2010 में ईटी-साइनोवेट ने देश के सात शहरों में करवाया था, बताता है कि बंगलूरू में 32 प्रतिशत पुरुषों ने यौन उत्पीड़न झेला है, वहीं दिल्ली में उत्पीड़न के शिकार पुरुषों में से 43 प्रतिशत ने महिलाओं और 43 प्रतिशत ने पुरुष बॉस और सहकर्मी को दोषी ठहराया है।
सोशल मीडिया पर हैशटैग 'मी टू' में महिलाओं ने अपने यौन उत्पीड़न के अनुभव साझा किए थे, लेकिन क्या सिर्फ महिलाएं ही यौन शोषण का सामना करती हैं या फिर समाज में ऐसे भी लोग हैं, जो लड़कों, युवकों या पुरुषों को भी निशाना बनाते हैं? यौन हिंसा एक लैंगिक प्रश्न है और ज्यादातर मामलों में इस अत्याचार की शिकार स्त्रियां होती हैं, लेकिन पुरुष भी यौन-हिंसा का शिकार होते हैं, यह सच स्वीकार कर, इस बात पर चर्चा करने की जरूरत है। क्या हम इस सच को अस्वीकार कर सकते हैं कि बाल यौन शोषण में आधे से ज्यादा दुष्कर्म पीडि़त लड़के हैं? यहां तक कि भारतीय जेलों में आत्महत्या की बड़ी वजह साथी कैदियों द्वारा किया गया दुष्कर्म है। अमेरिका से लेकर यूरोपीय देशों तक में जेंडर न्यूट्रल कानून है और अगर हम इस दिशा में आगे नहीं बढ़ते, तो तय है कि संविधान में उल्लिखित लैंगिक 'समानता' का मूल भाव स्वत: ही शून्य हो जाता है।