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वेबिनार हमें क्या दे रहे हैं, बता रहे हैं गौतम चटर्जी

गौतम चटर्जी
Updated Mon, 21 Sep 2020 04:09 AM IST
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वेबिनार - फोटो : pixabay

कोरोना काल में सेमिनार की जगह वेबिनार ने ली है। यानी किसी खास जगह पर सशरीर उपस्थित होने के बजाय ऑनलाइन उपस्थिति। जीवन के अलग-अलग क्षेत्रों के अनेक ऐसे लोग हैं, जो इस महामारी में भी वेबिनार के जरिये अपनी प्रासंगिकता बनाए रखने में सक्षम हुए हैं।



और इन वेबिनारों के कारण ही फिल्म, कला और साहित्य के क्षेत्रों की बीते दौर की अनेक ऐसी प्रतिभाओं के बारे में युवा पीढ़ी को मालूम चला है, जो कि डर और आशंका के इस वातावरण में अन्यथा संभव ही नहीं था। बेशक ये सेमिनार का विकल्प न हों, पर इस मुश्किल वक्त में वेबिनार ने अपनी उपयोगिता तो साबित की ही है।


लेकिन वेबिनार का दूसरा पक्ष उतना ही ध्यान देने की मांग करता है। पहली बात यह है कि इसका स्तर सेमिनार जैसा नहीं है। ऐसा शायद संभव भी नहीं है। सेमिनार स्थलों में बौद्धिक व्याख्यान देने वाले शिखर व्यक्तित्व वेबिनार में अपनी बात रखें ही, यह जरूरी नहीं है। ऐसे बहुत से व्यक्तित्व तकनीक के वैसे आदी भी नहीं हैं। दूसरी बात वेबिनार के आर्थिक पक्ष से जुड़ी है।


पिछले महीनों में जब मैंने कला पर लाइव व्याख्यान दिया, तो कई वरिष्ठ कलाकारों ने मुझसे पूछा कि ऐसे व्याख्यान पर आयोजक कितना पारिश्रमिक दे रहे हैं। पारिश्रमिक न मिलने की जानकारी देने पर वे बोले, इस बारे में आप पूछिए, आखिर कोई तो पूछेगा। उनकी शिकायत थी कि संगीत समारोह की ऑनलाइन घोषणा कर गायन, वादन और नृत्य कार्यक्रम तो वे हमसे करा ले रहे हैं, पर हम कलाकार पारिश्रमिक के बारे में चुप रह जा रहे हैं, क्योंकि संकोच है कि आयोजक को कैसा लगेगा और फिर शायद भविष्य में कार्यक्रम ही न मिले।


जब मैंने एक केंद्रीय विश्वविद्यालय के वेबिनार में व्याख्यान दिया, तब भी यही सवाल कई प्रोफेसरों ने मुझसे किया। उन्होंने कहा कि हर साल देश भर के सभी विश्वविद्यालयों में सेमिनार के लिए काफी पैसा सरकार से आता है। कोविड के कारण अभी यह बंद नहीं हुआ है। सत्र के अंत में विभागाध्यक्ष या संकाय प्रमुख को सरकार को यह दिखाना पड़ता है कि उस पैसे का उन्होंने क्या किया।


सेमिनार के लिए अक्सर दूसरे शहरों से ही प्रोफेसर आते हैं। उनके आने-जाने, रहने-खाने का खर्च भी आयोजक विभाग वहन करता है। पर वेबिनार करने पर यह खर्च बच जा रहा और वे पारिश्रमिक भी नहीं दे रहे। तो प्रश्न यह है कि उस सरकारी राशि का खर्च, जो जन-धन है, विभाग सरकार को ‘कैसे’ दिखा रहा है।


इसका समाधान आसान है। सरकारी विश्वविद्यालयों में सेमिनार के लिए दी जाने वाली राशि को सरकार फिलहाल तुरंत बंद कर सकती है, निजी विश्वविद्यालय पारिश्रमिक दे सकते हैं, और संगीत समारोहों के आयोजक, चाहे वे पुराने हों या नए हों, कलाकारों को पारिश्रमिक देना शुरू कर दें। पर समस्या क्या इतनी ही है?
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देश की शिक्षा व्यवस्था, शिक्षा और संस्कृति के सरकारी प्रतिष्ठान और शिक्षण संस्थाएं क्या कोविड-परिस्थिति में इस भ्रष्ट आचार से मुक्त हो चुकी हैं ? प्रवेश, परीक्षा और नौकरी की परेशानियों के पीछे क्या इन क्षेत्रों में वह सब अब भी जारी नहीं है, जो कोविड से पहले से है और जिस आचरण पर महामारी का कोई असर अभी तक देखने को नहीं मिला है?


वेबिनार के ज्वार में व्यवस्था और अर्थव्यवस्था का क्षेत्र अपने को नए रूपों में ढाल चुका है, जहां पुराने रोग अपने लिए नए रोगों को पालने लगे हैं और उनसे मिलने वाले लाभ की अद्यतन व्यवस्था कर चुके हैं। मृत्यु के राष्ट्रव्यापी परिवेश में भी लोभ और लिप्सा का ज्वार बढ़ता ही गया है। किसी भी विषम परिस्थिति में मनुष्य की लिप्सा इतनी बढ़ कैसे जाती है?


चाहे देश विभाजन की परिस्थिति हो या रेल दुर्घटना की, छोटे निजी स्कूल हों या विश्वविद्यालय, कला अकादमियां हों या संस्कृति के प्रतिष्ठान, हर जगह प्रतिकूल परिस्थिति में भी मनुष्य का लोभ-लालच क्यों नहीं बदलता? रामायण और महाभारत की शिक्षा का असर यदि वाल्मीकि और वेदव्यास के ही देश में नहीं हुआ है, तो इसका कारण सिर्फ यह है कि मनुष्य ने परिवर्तन या रूपांतरण का असल अर्थ कभी जाना ही नहीं।


लेकिन चाहते सभी हैं कि मनुष्य का आंतरिक रूपांतरण हो, क्रांति पहले भीतर हो। विडंबना यह है कि मनुष्य के आंतरिक रूपांतरण का पाठ न विश्वविद्यालय पढ़ाते हैं, न वेबिनार से इस बारे में जाना जा सकता है।

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