अर्थशास्त्रियों के लिए तिमाही या वार्षिक जीडीपी की वृद्धि के आंकड़ों की घोषणा हमेशा एक अवसर होती है, जबकि आम आदमी हमेशा उस पुराने सवाल के साथ उलझा रहता है कि हमारे लिए इन आंकड़ों का क्या मतलब है। कोरोना से पहले के सामान्य परिदृश्य में इसका बहुत अलग मतलब नहीं था, लेकिन अब है। पहले अर्थव्यवस्था के पटरी पर लौटने की उम्मीद थी, और कोई भी गिरावट एक झटके की तरह लगती थी। लेकिन यह दौर अलग है, क्योंकि यह निराशा पिछले कुछ वर्षों की नीतिगत अपंगता और संघर्षरत भारतीय अर्थव्यवस्था के चरम पर आई है।
वित्त वर्ष 2020-21 की पहली तिमाही के लिए -23.9 फीसदी की जीडीपी विकास दर स्पष्ट रूप से कोर सेक्टर में कम आर्थिक गतिविधि का संकेत देती है। यह विशेषज्ञों और आम आदमी, किसी के लिए भी हैरानी की बात नहीं है, क्योंकि 2016 से ही हमारी अर्थव्यवस्था की दयनीय स्थिति सतह पर आ गई थी। रोजगार के मामले में इस आर्थिक निष्क्रियता की गंभीरता अब सबके सामने स्पष्ट है। रोजगार के परिदृश्य पर ध्यान केंद्रित करना सबसे महत्वपूर्ण है। सेंटर फॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकनॉमी (सीएमआईई) की रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2017-18 में वेतनभोगी रोजगार में 1.6 फीसदी की वृद्धि हुई, जबकि 2018-19 में 0.1 फीसदी की मामूली वृद्धि दर्ज की गई।
तब से स्थिति निरंतर खराब ही हुई है। 2019-20 में वेतनभोगी नौकरियों की संख्या में 1.8 फीसदी की कमी हुई। कोरोना के कहर से पहले ही हम वेतनभोगी नौकरियां पैदा करने के लिए जूझ रहे थे। इसलिए जुलाई, 2020 तक हमारे देश में एक करोड़ 90 लाख वेतनभोगी नौकरियां खत्म हो गई, जिनमें शहरी और ग्रामीण वेतनभोगी नौकरियां शामिल थीं। इससे 20-29 और 30-39 आयु वर्ग के लोग सबसे ज्यादा प्रभावित हुए। अप्रैल से जुलाई, 2020 के बीच इन आयु वर्गों के 1.76 करोड़ लोगों की नौकरियां चली गईं। सवाल यह है कि हमारी अर्थव्यवस्था युवाओं के लिए रोजगार पैदा करने में नाकाम क्यों है। क्या यह बड़ी वैश्विक अर्थव्यवस्थाओं की आम समस्या है?
हर वैश्विक अर्थव्यवस्था अपनी संरचना में अलग होती है। इसलिए, आंकड़ों को देखना बहुत फायदेमंद नहीं हो सकता है। लेकिन अगर हम 2014-19 के बीच पांच साल के रुझान पर ध्यान केंद्रित करें, तो यह हमें एक कहानी बताती है-अमेरिका, ब्रिटेन, जर्मनी और जापान जैसी अन्य सभी प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं की नीतियां असरकारी साबित हुई हैं। अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन के अनुसार, 2014-19 के बीच उनकी बेरोजगारी दर में लगातार गिरावट आई है। अमेरिका और ब्रिटेन में 2014 में बेरोजगारी दर क्रमशः लगभग 6.2 फीसदी और 6.1 फीसदी थी, जो 2019 में घटकर क्रमशः 3.7 फीसदी और 3.9 फीसदी पर आ गई। यानी रोजगार के मामले में भारत बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में एकमात्र अपवाद है। भारत में 2014 से 2019 के बीच कुल निवेश 30.1 फीसदी से घटकर 27.4 फीसदी रह गया है। चार साल से मांग न होने से आर्थिक वृद्धि नहीं है। कृषि क्षेत्र में अब भी कुल कार्यबल का 42 फीसदी है। जीडीपी में मैन्यूफैक्चरिंग क्षेत्र की हिस्सेदारी घटी है, जबकि इस क्षेत्र में रोजगार वृद्धि की अपार संभावनाएं हैं।
तो फिर ज्यादा रोजगार सृजन के लिए क्या करना चाहिए? चार महीने पहले सरकार की प्राथमिकता व्यवसाय की मदद करने और आर्थिक निष्क्रियता से बचने के लिए नए क्रेडिट लाइन खोलने और ऋण पुनर्गठन की थी। अभी सरकार की प्राथमिकता मांग बनाए रखने की होनी चाहिए। जब तक मांग नहीं बढ़ेगी, औद्योगिक गतिविधि नहीं बढ़ेगी। उद्योग 70 फीसदी से कम की क्षमता पर काम कर रहे हैं। मांग बढ़ने से औद्योगिक गतिविधि बढ़ेगी, तो उससे आगे अधिक रोजगार पैदा होंगे। गैर-जरूरी वस्तुओं में से कुछ के लिए जीएसटी स्लैब को 28 फीसदी से घटाकर 18 फीसदी करने से बिक्री बढ़ेगी और मांग बढ़ाने में मदद मिलेगी। बेरोजगारी भत्ता तंत्र विकसित करके बेरोजगारों के हाथ में पैसा देने से भी मांग के स्तर को बनाए रखने में मदद मिलेगी।
केंद्र को बुनियादी ढांचे पर खर्च भी बढ़ाना चाहिए। अप्रैल और जुलाई 2019 के बीच केंद्र द्वारा 9.47 लाख करोड़ रुपये खर्च करने की तुलना में, इस साल यह बढ़कर केवल 10.54 लाख करोड़ रुपये हुआ है, इसमें से भी ज्यादातर वेतन और अन्य नियमित खर्चों में जाएंगे। ज्यादा रोजगार पैदा करने के लिए खर्च बढ़ाना चाहिए। लोगों के हाथों में पैसा देना चाहिए, ताकि खपत बढ़े। बेरोजगारों के समायोजन में मदद के लिए औद्योगिक क्षेत्र को मजबूत बनाना चाहिए।
ग्रामीण रोजगार में फिर से कमी आई है। लगभग 60 फीसदी ग्रामीण आय गैर-कृषि क्षेत्रों से आती है। मनरेगा के दायरे को आगे बढ़ाना इसका एक उपाय हो सकता है। शहरों को गांवों से जोड़ना बहुत महत्वपूर्ण है। गांवों में गैर-कृषि रोजगार के अवसर या तो निजी निवेश को बढ़ाने से या सार्वजनिक खर्च बढ़ाने से पैदा होते हैं।