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कलयुग के युग चार

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ऐसा क्यों होता है कि आदमी युगपुरुष होने के लिए बेताब रहता है। उसे लगता है कि अपने युग को दिशा देने का धंधा संभाल लेना सबसे पहला काम है। लोग श्रद्धांजलि देते हैं तो कोई भी मरे, युगपुरुष ही बताते हैं। अगर युगपुरुष, मरने वाला था तो श्रद्धांजलि देने वाला कौन है? गुपचुप में वह बता देगा कि असल युगपुरुष तो वह खुद है। मरने वाले को हर जीवित युगपुरुष इसी तरह संबोधित करता है। आप उस पर भरोसा कीजिए।
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मुझे ऐसे पलों में हर बार यह लगता रहा कि परीक्षित के बाद से सालों गुजर गए कलयुग चल रहा है, फिर भी लोग कलयुग पुरुष क्यों नहीं होते? इसका समाधान हमारे अखबार सुझाते हैं। शीर्षक छपा मिलेगा-'कलयुगी मां ने बेटे का खून कर दिया।' इससे पता लगता है कि आमतौर पर मांएं कलयुग में नहीं जी रहीं। एक यही मां चली है, जिसने कलयुगी होने का सबूत दिया। कभी-कभार कुछ बाप ऐसे निकलते हैं। इनकी वजह से युग की लाज बची रहती है।

हमारे एक संवाददाता को कलयुग-थ्योरी बड़ी पसंद थी। हत्या हुई, बलात्कार हुआ, उनकी थ्योरी ड्यूटी पर तैनात हो जाती। वे मानकर चलते थे कि हफ्ते में तीन खबरें कलयुगी चरित्रों के जरिये होंगी। एक दफे एक रिक्शे वाले ने थानेदार का इसलिए कत्ल कर दिया कि वह थानेदार की रिश्वतखोरी से बुरी तरह तंग आ चुका था। संवाददाता ने समाचार बनाया,'कलयुगी रिक्शेवाले ने थानेदार का खून किया'। उनका मानना था कि थानेदार को रिश्वत का हक है। जो अपने हक के लिए लड़ रहा था, उसे रिक्शेवाले ने मार दिया। यह घोर कलयुग की निशानी है। मैं अब तक ऐसे इतिहास को ढूंढ रहा हूं, जो इस बात की पुष्टि कर दे कि कलयुग में रिक्शे होते थे।
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मशीनों को 'कल' भी कहा जाता है, इसका मतलब मशीनी युग, कलयुग है। पर शास्त्र जानने वाले मानते हैं कि कल और कलि में किस तरह का रिश्ता है। कई कारखानेदार कलयुग का सुंदर उपयोग करते हैं। वे एक कारखाने में मजूदरों का बोनस खाते हैं, दूसरे का जहरीला पानी गायों को मारने के लिए नदी में बहा देते हैं और तीसरे की बैलेंस शीट से एक खूबसूरत मंदिर बना देते हैं। इन्हीं में से एक उद्योगपति ने मुझे कलयुग का एक और अद्भुत प्रयोग बताया। उसने कहा कि एक नेता से मिलकर प्रधानमंत्री के लिए सिरदर्द की गोली तय करवाकर आप पूरे कलयुग को जीत सकते हैं। मैंने पूरा फॉर्मूला जानना चाहा तो वे बोले, पहले आप गुड़गांव से प्रॉपर्टी का और इटली में हेलीकॉप्टर का धंधा कर लें, फिर बताऊंगा।

मैं उनके 'कलयुगी' दादाजी से मिल चुका हूं। अध्यात्म से भरी कविताएं लिखते थे। बड़े सात्विक थे इसलिए आमलेट खाते थे। मगर प्याज हर्गिज नहीं डलवाते थे। मरने से पहले पड़ोस की गली में कुत्तों को रोटियां डालकर आए थे, गाय ने सींग मार दिया। बस मर गए। पोते का कहना है, गाय कलयुगी थी। उसने सींग का उपयोगी पक्ष कलयुग से मिला दिया।

कलयुग बहुत कलात्मक चीज है। हिंदी फिल्मों की सासों ने अपनी बहुओं को पीटने में इसका इफरात से उपयोग किया। कई संवाद लेखकों की रोजी इसके बनाए मुहावरों पर चली। दिलीप कुमार ने कलयुग वाला रफी का गाना गाया-हंस के लिए दाना और कौए के लिए मोतियों की मौज। यह कलयुग की भविष्यवाणियों का दिलचस्प गीत था। आज तमाम दुखीजन इस गीत की पंक्तियों का दूसरों को कोसने में भारी इस्तेमाल करते हैं। ऐसा लगता है कि जिनके खिलाफ इसका इस्तेमाल किया जा रहा है, उन्हें छोड़कर तमाम लोग सतयुग में रहते हैं।

कलयुग के कुछ उपयोग मैंने महेश भट्टों, पप्पू यादवों वगैरह से भी सीखे। कलयुग वो पत्थर है, जिससे अच्छे-अच्छों की कनपटी पर घाव किया जा सकता है। मैं सोचता हूं, अगर कभी 2014 से पहले चुनाव हो गए तो कलयुग के सिवाय और कोई कैसे जिम्मेदार हो सकता है? शक है? तो, पीएम हाउस के किसी ज्योतिषी से पूछ लीजिए।
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