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खुदा से नहीं तो खुद से पूछो

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गर मुझे इस बात का विश्वास हो जाए कि कुत्ते और बिल्लियां एक साथ रह सकते हैं, तो अपने शेल्टर से पांच बिल्लियां मैं तुरंत घर ले आऊं। इसका एक खास कारण है। बिल्लियां उन चूहों को मार भगाएंगी, जिन्होंने मेरे कपड़े और किताबों को कुतर डाला है। लेकिन यह सोचकर मन पीछे हट जाता है कि क्या उन बिल्लियों की मेरे कुत्तों के साथ निभ जाएगी? क्या वे बिल्लियां इन कुत्तों के साथ रहकर जिंदा भी रह पाएंगी, या नहीं!
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इस तरह की बात सोचते वक्त पैगम्बर मुहम्मद का भी ख्याल आता है, क्योंकि पैगम्बर साहब बिल्लियों से प्यार करते थे। उनकी चहेती बिल्ली का नाम मुएज्जा था। मुहम्मद साहब एक दिन अजान की आवाज सुनकर उठे और इबादत के लिए जाने की तैयारी करने लगे। जब वे कपड़े बदलने के लिए गए तो देखा कि मुएज्जा इबादत वाले उनके कपड़ों की बांह में छिपकर सो रही थी। उन्होंने मुएज्जा को जगाकर परेशान करने की बजाय कपडे़ की बाजू को काट डाला और उसे ही पहनकर चले गए।

एक संदर्भ और भी है। एक बार पैगम्बर मुहम्मद साहब कुछ लोगों के बीच रेगिस्तान में कुरान पढ़ रहे थे। तभी एक बीमार सी दिखने वाली बिल्ली आकर उनकी कीमती पोशाक पर बैठ गई और वहीं सो गई। शाम ढलने पर लोग अपने घरों को लौट गए। लेकिन बिल्ली सोती रही। ऐसे में पैगम्बर साहब ने चाकू से अपनी पोशाक का वह हिस्सा काटकर वहीं छोड़ दिया, जिसमें वह बीमार बिल्ली सो रही थी। मुएज्जा से तो उनका लगाव इतना था कि उपदेश देते वक्त वह पैगम्बर साहब की गोद में ही रहती थी।
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यही नहीं, मुएज्जा के पिए हुए पानी को पीने से भी उन्हें कोई गुरेज नहीं था। एक बार मुहम्मद साहब इबादत से पहले हाथ-मुंह धो रहे थे। उसी वक्त एक बिल्ली वहां आयी और प्यासी आंखों से पानी के घडे़ को देखने लगी। मुहम्मद साहब को यह समझने में देर न लगी कि बिल्ली को प्यास लगी है। उन्होंने घड़े में रखा वजू करने का पानी बिल्ली को पिला दिया।

मुहम्मद साहब के करीबी और उनके उपदेशों का प्रचार करने वाले अबू हुरयारह को यह नाम खुद पैगम्बर मुहम्मद ने ही दिया था। इसका अर्थ बिल्ली के बच्चों का पिता होता है। पैगम्बर साहब ने उन्हें यह नाम बिल्ली के बच्चों की देखभाल करते रहने के कारण दिया था। एक ऐसी घटना का जिक्र भी मिलता है, जब एक बिल्ली ने मुहम्मद साहब को एक खतरनाक सांप से बचाया था। बिल्लियों से मुहम्मद साहब के इसी लगाव की वजह से इस्लाम को मानने वाले लोग बिल्लियों से प्यार करते हैं।

मुहम्मद साहब से जुड़ी कहानियों में यह बात भी दर्ज है कि बिल्लियों के साथ बुरा व्यवहार करने वाले मुस्लिम सजा के पात्र होंगे। अल बुखारी ने हदीथ के हवाले से बताया है कि ‘एक बार एक महिला ने एक बिल्ली को कमरे में बिना खाने-पानी के मरने के लिए बंद कर दिया था। मुहम्मद साहब ने इस पर कहा कि-उस महिला को प्रताड़ना और नर्क नसीब होगा।’ इस्लाम में सीख दी जाती है कि बिल्लियों को सामान की तरह खरीदा और बेचा नहीं जाना चाहिए। यही नहीं, कहा तो यह भी जाता है कि बिल्ली की लार में जब तक साफ-साफ कोई अशुद्धता न दिखाई दे, उससे कोई नुकसान नहीं होता।

इसी आधार पर कहा गया है कि मुस्लिमों को बिल्लियों के साथ रहने से गुरेज नहीं करना चाहिए। बशर्ते, बिल्लियों की सही देखभाल और उन्हें घूमने-फिरने का समय दिया जाए। हजारों सूफी कहानियों में भी बिल्लियों का जिक्र है। शेख अशरफ के मदरसा की बिल्ली, जिसने टीचर्स को वहां व्यवस्था बनाने में मदद की और छात्रों के लिए कुर्बानी दी। इसी तरह बगदाद के सूफी उस्ताद शेख अबू बकर अल-शीबली का भी जिक्र मिलता है। शीबली की मौत के बाद वे अपने एक दोस्त के सपने में आए और बताया कि अल्लाह ने उन्हें स्वर्ग में जगह दी है। शीबली सोचने लगे कि आखिर ऐसा कौन सा पुण्य उन्होंने किया था, जिसकी वजह से उन्हें स्वर्ग नसीब हो गया।

तब अल्लाह ने कहा-‘तुम्हे याद है वो दिन जब बगदाद में कड़ाके की ठंड में सड़क पर ठिठुरती हुई एक बिल्ली को तुमने अपने गर्म कोट में पनाह दी थी। तुम्हे स्वर्ग उसी पुण्य के लिए मिला है।’ अगर हर मुसलमान बिल्लियों के साथ इसी तरह का व्यवहार करें तो उनका बुरा नहीं हो सकता। लेकिन यह विडंबना है कि आज बिल्लियों को हजारों की संख्या में उनके मांस के लिए और फर के लिए मारा जा रहा है।
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