एक व्याध देविका नदी के तट पर तपस्या कर रहा था। तभी दुर्वासा ऋषि वहां आ पहुंचे। उन्होंने देविका में स्नान के बाद पूजा-अर्चना करके व्याध से कहा, मुझे जौ, गेहूं और चावल से बना भोजन उपलब्ध कराओ।
व्याध दुर्वासा जी के क्रोध से परिचित था, इसलिए चिंतित हो उठा कि उन्हें भोजन कैसे उपलब्ध करवाया जाए। वह वन में जाकर वनदेवियों से शुद्ध आहार तैयार कराकर ले आया। उसने श्रद्धा भाव से दुर्वासा जी को भोजन कराया।
दुर्वासा जी ने तृप्त होकर वर दिया, तुम सत्यतपा ऋषि के नाम से ख्याति प्राप्त करोगे। इंद्र एवं विष्णु तुम्हारी परीक्षा लें, तब भी तुम सत्य पर अडिग रहोगे। बहुत दिनों बाद एक दिन सत्यतपा ऋषि वन में बैठे थे। अचानक एक वराह सामने से गुजरा और ओझल हो गया। उसके पीछे शिकारी भी पहुंचा।
उसने मुनि से पूछा, क्या तुमने वराह को जाते देखा है? मुनि ने सोचा, यदि वह सच बताता है, तो शिकारी वराह को मार डालेगा, और यदि नहीं बताता है, तो शिकारी का परिवार भूखा रह जाएगा। मुनि ने कहा, वराह को आंखों ने देखा है, पर वे बोल नहीं सकतीं।
जिह्वा बोल सकती है, किंतु उसने वराह को देखा नहीं है। तभी मुनि ने देखा कि शिकारी की जगह विष्णु और इंद्र खड़े हैं। उन्होंने कहा, आप सत्य-असत्य के रहस्य और उसके परिणाम को समझते हैं। सत्य बोलते समय उसका परिणाम क्या होगा, यह विवेक ही उचित निर्णय ले सकता है।