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पाकिस्तान में उम्मीद की हवा

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विदेशी पत्रकार दिल्ली में कुछ वक्त बिताने के बाद अक्सर कहा करते हैं कि उनकी राय में भारत एक बड़ा देश है, जिसकी मानसिकता छोटे देश की है और पाकिस्तान एक छोटा देश है, जिसकी मानसिकता बड़े देश की है।
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मैंने जब भी यह बात सुनी, ऐतराज जताया, लेकिन पिछले सप्ताह वाघा सीमा पार कर पाकिस्तान जाने के बाद मुझे यकीन हो गया कि इस बात में सच्चाई है। सुनिए जरा कि इस सीमा पर क्या होता है।

और शायद आपको भी यकीन हो जाए कि अमन-शांति हमारे दो मुल्कों के बीच तब ही आएगी, जब भारत अपनी सोच बदलने की कोशिश करेगा। जब हमारे राजनेताओं को एहसास होगा कि एक विशाल देश की बागडोर उनके हाथों में है, न कि एक दुर्बल, भयभीत देश की।
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पाकिस्तान कई बार गई हूं मैं, लेकिन वाघा से पहली बार जाना हुआ। आने-जाने में विलंब और लालफीताशाही सब इस पार दिखी, उस पार नहीं, जैसे कि भारतीय अधिकारियों को डर था कि सीमा पार करने वाले जितने भी लोग हैं, वे सब आतंकवादी ही होते हैं।

यहां तक कि जब मैंने बस की खिड़की का परदा हटाने की कोशिश की, तो मुझे रोका गया। क्यों यह मैं समझ नहीं पाई। बस में बैठने से पहले मुझे कोई दस बार अपना नाम लिखना पड़ा, कभी किसी पुलिस वाले की किताब में, तो कभी किसी पर्चे पर। इन पर्चों को भरने के बाद जब पासपोर्ट पेश किया इमीग्रेशन अफसर को, तो उसने मुझे थोड़ी देर बैठ जाने को कहा। मेरे अलावा एक ही दूसरा यात्री था उस समय और अधिकारी थे कोई तीन-चार।

जब मैंने पूछा कि देर किस बात की है, तो अधिकारी ने कहा,‘जी, आपका क्योंकि वीजा नया लगा है, तो आपका बायोडाटा भरना पड़ेगा कंप्यूटर में।’ इसके बाद जब सुरक्षा जांच हुई, तो फिर मुझे किसी पुलिस वाले की किताब में अपना नाम लिखना पड़ा उस बस में चढ़ने से पहले, जो मुझे पाकिस्तान के गेट तक लेकर गई।

उस पार पहुंची, तो न ही अफसरों और पुलिसवालों ने मेरी तहकीकात की और न ही मुझे अपना नाम और पासपोर्ट नंबर दस बार लिखना पड़ा। बिजली गई हुई थी, सो मुझे एक घंटा इंतजार करना पड़ा, लेकिन अच्छा गुजरा वह घंटा, क्योंकि पाकिस्तानी अफसरों ने मुझे और मेरी दोस्त नशी को आराम से एक कमरे में बैठा दिया।

उन अधिकारियों ने बेझिझक स्वीकार किया कि अमन-शांति की तरफ अगर चलना है, तो पहला कदम होना चाहिए आना-जाना आसान करना। दूसरा कदम होना चाहिए कि रोज शाम को जो तमाशा होता है हमारे सिपाहियों के बीच वाघा बॉर्डर पर, उसको समाप्त कर दें। तो क्या अमन-शांति की कोशिश नए सिरे से हो सकती है वहां नई सरकार बन जाने के बाद?

लाहौर में तीन दिन गुजारने के बाद मुझे पूरा यकीन है कि उस मुल्क में एक सुहानी हवा चलने लगी है। एक तो इसलिए कि नवाज शरीफ जब पिछली बार प्रधानमंत्री थे, उन्होंने ईमानदारी से दोस्ती का हाथ बढ़ाया था। अगर उसी समय परवेज मुशर्रफ कारगिल युद्ध की तैयारी न कर रहे होते, तो कौन जानता है कि इतिहास किस रंग का होता आज।

गुजिश्ता चुनाव में न सेना ने दखल दिया उतना, न इस्लामीकरण मुद्दा बना, न कश्मीर और न ही भारत। विदेश नीति का जिक्र किया अगर नवाज शरीफ या इमरान खान ने, तो बातें हुईं अमेरिकी ड्रोन हमलों की। चुनाव के दिन मैंने लाहौर के बाजारों और गलियों में दिन भर घूमकर लोगों से बाते कीं और जहां गई, मिले ऐसे लोग, जिनके लिए इस चुनाव में मुद्दे थे बिजली, रोजगार और वही रोटी, कपड़ा, मकान, जो सीमा के इस पार भी अहम हैं।

पाकिस्तान में मुझे दिखे परिवर्तन के इतने आसार कि हमारे राजनेताओं को चाहिए इसका फायदा उठाना। लेकिन यह तब होगा, जब हम यह याद रखें कि भारत एक बड़ा देश है और पाकिस्तान इतना छोटा कि हमारे कई राज्य उससे बड़े हैं।

माना कि इतिहास की कड़वी यादों से छुटकारा पाना आसान न होगा, पर कड़वाहट में वक्त आ गया है थोड़ी-सी उम्मीदें घोलने का। बरसों की दुश्मनी के बाद आया है मौका दोस्ती का, जिसे हमें गंवाना नहीं चाहिए, बावजूद इसके कि आज भी बैठे हैं वहां ऐसे जरनैल, जो पूरी कोशिश करेंगे कि दोनों देशों के बीच दोस्ती न हो। उनका मुकाबला करना तभी सफल होगा, जब दोनों देशों के राजनेता कंधे से कंधा मिलाकर उनका मुकाबला करेंगे।
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