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सक्षम ग्राम का सपना

आर विक्रम सिंह
Updated Mon, 05 Mar 2018 06:43 PM IST
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गांव

सक्षम ग्राम! यह एक परिकल्पना है। ऐसे ग्राम, जो अपने ग्राम्य समाज की व्यवस्थाएं स्वयं अपने संसाधनों से कर सकें। यह विचार हमें स्वाभाविक रूप से आत्मनिर्भरता और ग्राम सशक्तिकरण की दिशा में ले जाता है। ट्रैक्टरों ने बैलों के साथ-साथ खेत मजदूरों को भी बेरोजगार कर दिया। बैल इधर-उधर खेतों में चरते हुए आतंक का माहौल बना रहे हैं और मजदूर, कुछ तो नगर में रोजगार पा गए, तो कुछ दूर केरल-ओडिशा चले गए। वास्तविकता यह है कि अभी हमें विकास के साथ सामंजस्य बिठाना नहीं आया।



आज गांवों तक सड़कें हैं, कल की कीचड़ भरी गलियों में अब खड़ंजा है, बिजली है, सोलर लाइट आ रही है। टीवी, मोबाइल गली-गली में है। लेकिन खाली वक्त ने युवकों को स्वरोजगार उद्यम की ओर प्रेरित नहीं किया। खाद है, बीज है, मिट्टी की जांच है, मनरेगा है। विकास के लिए शासन-प्रशासन का जबर्दस्त प्रोत्साहन भी है। लेकिन ग्राम स्वयं अपनी परवाह नहीं कर पा रहा है।


ग्रामों में भूमि संबंधी समाधान का निखिल शुक्ला 'श्रावस्ती मॉडल' अब पूरे प्रदेश में चल रहा है। तहसीलों से टीमें जा रही हैं। विवादों का निपटारा हो रहा है, अवैध कब्जे हट रहे हैं। लेकिन कब तक? अभियान के बाद क्या होगा? दरअसल ग्रामों में एक स्थिर व्यवस्था की आवश्यकता है, जो अभियानों के समापन के बाद भी नियमित रूप से अपना काम करती रहे। जरूरी हो चला है कि ग्राम अपनी समस्याओं के समाधान स्वयं कर सकने की क्षमता विकसित करंे, अपने निर्णय ले सकें सरकार से सहयोग अवश्य लें, लेकिन पूरी तरह निर्भर न हो जाएं। समस्याओं और समाधानों की उधेड़बुन के बीच ही अचानक 'ग्राम समाधान दिवस' का विचार उठा। समाधान का प्रथम प्रयास वहां हो, जहां से समस्याएं प्रारंभ हो रही हैं।


चूंकि विवादों के समाधान के लिए अब प्रेमचंद के पंच परमेश्वर नहीं हैं, इसलिए ग्राम समाधान दिवस इस खाली स्थान को भरने का विकल्प बन सकता है। तय किया गया कि ग्राम समाधान दिवस की बैठक प्रत्येक ग्रामसभा में महीने में एक बार हो। प्रत्येक ब्लॉक पर ग्राम प्रधानों से विमर्श किया जाए। कुछ अच्छे सुझाव भी आएंगे। एजेंडा तय हुआ, रोस्टर जारी किया गया।


लेकिन कुल तीस प्रतिशत ग्रामों में ही बैठकें हो सकीं। प्रधानपतियों और प्रधानपुत्रों की तो कोई कानूनी भूमिका है नहीं, उनको बैठक से बाहर ही रहना पड़ता। वहां बैठकें नहीं हो पाईं। कई गांवों में जातिगत पार्टीबंदी के कारण प्रधानों के लिए सहज स्वीकार्यता का अभाव देखा गया। हमारे गांव अभी सहज नेतृत्व विकसित नहीं कर सके हैं। फिर भी बहुत से ग्रामों से बहुत उत्साहजनक परिणाम भी आए।


मैंने भी कई ग्रामों का भ्रमण किया। अपने प्रधानों को मैंने मुख्यतः पांच लक्ष्य दिए। पहला यह कि ग्राम समाधान दिवस में पक्षकारों से वार्ता कर फिर राजस्व/पुलिस की संयुक्त टीम से पैमाइश कराकर विवादों का समाधान किया जाए। विवादों के समाधान के साथ-साथ ग्राम समाज की भूमि को अवैध कब्जों से मुक्त कराना जरूरी है।


दूसरा, ग्राम के कुपोषित बच्चों की देखभाल सरकार के साथ पूरे ग्राम का भी दायित्व है, अर्थात कुपोषण मुक्ति हमारा लक्ष्य है।


तीसरा, ऋणग्रस्तता से मुक्ति एवं छोटे सरल ऋणों की व्यवस्था का लक्ष्य है। बैंक पांच-दस हजार रुपये के ऋण नहीं देते, इसलिए लोगों को महाजनों से दस रुपये प्रति सैकड़ा प्रतिमाह पर ऋण लेना पड़ता है, जो 120 प्रतिशत वार्षिक पर पहुंचता है। ग्रामीण ऋण प्रबंधन के लिए प्रत्येक ग्राम से एक या दो पढ़े-लिखे समर्थ ग्रामीण युवकों को साहूकारी अधिनियम के तहत लाइसेंस दिलाकर छोटे ऋण देने के लिए प्रोत्साहन दिया जाए।

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चौथा, खुले में शौच से मुक्ति का लक्ष्य और पांचवां यह कि ग्रामीण अपनी पहल पर अपने संसाधनों से ग्राम में कृषि, पशुपालन, बागवानी आदि किसी एक क्षेत्र में कोऑपरेटिव संस्था गठित कर खेती व उत्पाद के विक्रय की व्यवस्थाएं करें। चर्चाएं हुईं, तो उम्मीद जगी कि बरेली के किसानों में इस प्रयोग की स्वीकार्यता हो सकती है।


ग्राम समाधान दिवस को स्थायित्व देने के लिए जरूरी है कि 'श्रावस्ती मॉडल' को ग्राम समाधान दिवस के दायरे में ले आया जाए। पंचायती राज अधिनियम की धारा 28 क एवं राजस्व संहिता की धारा 60 के अनुसार, प्रत्येक ग्राम में भूमि प्रबंधक समिति प्रधान की अध्यक्षता में गठित होती है। लेखपाल इसका सचिव होता है। ग्रामसभा की भूमियों का प्रबंधन एवं ग्राम का विकास इसके दायित्वों में है। इस समिति के क्षेत्राधिकार को राजस्व संहिता की धारा 70 के तहत विस्तार देते हुए उसमें उपरोक्त पांच बिंदु समाहित कर लिए गए।

 


इस प्रकार ग्राम समाधान दिवस को भूमि प्रबंधक समिति के रूप में एक विधिक अधिकार प्राप्त हो गया। प्रति माह बैठक होगी, तो समाधान निकलेंगे एवं विकास की बातें भी होंगी। जब ग्राम अपनी समस्याओं का समाधान स्वयं करने लगेंगे, तो यह आत्मविश्वास उन्हें आत्मनिर्भर बनाएगा। जो निस्तारण ग्राम स्तर पर नहीं हो सकेगा, वह तहसील स्तरीय समग्र समाधान दिवस की ओर रुख करेगा।


प्राचीन भारत में स्वनिर्भर ग्रामों की शृंखला रही है। यही गांधी का भी स्वप्न था। सवाल यह है कि क्या आधुनिकता के अधकचरेपन में उन खोए हुए ग्रामों को नए रूप में पुराने मूल्यों के साथ वापस ले आ पाना संभव होगा। इसका जवाब तो भविष्य के गर्भ में है, लेकिन हम प्रयास तो कर ही सकते हैं। हो सकता है कि ग्रामीण सशक्तिकरण की दिशा में उठा यह छोटा-सा कदम बड़ा काम कर जाए।


लेखक भारतीय प्रशासनिकसेवा के अधिकारी हैं

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