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काबुल में अमेरिकी रणनीति

कुलदीप तलवार Updated Mon, 05 Mar 2018 06:36 PM IST
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कुलदीप तलवार

अफगानिस्तान के मौजूदा संगीन हालात को देखते हुए ऐसा लग रहा है कि वह अमेरिका के नियंत्रण से बाहर होता जा रहा है। तालिबान जहां चाहते हैं, वहां हमला कर देते हैं। देश के 70 प्रतिशत इलाके पर तालिबान का, जबकि केवल 30 प्रतिशत क्षेत्र पर सरकार का नियंत्रण रह गया है। विगत 24 फरवरी को तालिबान के हमले में वहां पच्चीस सुरक्षाकर्मी समेत 30 लोग मारे गए। राजधानी काबुल में ठीक उसी दिन तालिबान के एक आत्मघाती हमले में तीन लोगों की जान गई। जहां यह हमला हुआ, उसके निकट अफगान खुफिया विभाग का मुख्यालय व अन्य सरकारी महत्वपूर्ण इमारतें हैं। विगत जनवरी में केवल 10 दिन में काबुल में तालिबान के तीन बड़े हमले हुए, जिनमें करीब 200 लोग मारे गए और सैकड़ों घायल हुए।



अमेरिकी सरकार की एजेंसी ‘स्पेशल इंस्पेक्टर जनरल फॉर अफगानिस्तान रिकन्स्ट्रक्शन’ ने अपनी एक रिपोर्ट अमेरिकी कांग्रेस, सुरक्षा और गृह विभाग को भेजी है, जिसमें स्वीकारा गया है कि अमेरिका अफगानिस्तान में नियंत्रण खो रहा है और तालिबान का नियंत्रण लगातार बढ़ रहा है। पिछले साल डोनाल्ड ट्रंप ने जब नई अफगान नीति की घोषणा की थी, तब तालिबान के खिलाफ हवाई इमले और सैन्य कार्रवाई में भारी बढ़ोतरी हुई थी, पर उसका कोई बहुत बड़ा असर दिखाई नहीं दिया। अफगान सरकार का कहना है कि हाल ही में काबुल में पकड़े गए एक दहशतगर्द ने अदालत के सामने अपने इकबालिया बयान में कहा है कि उसे अफगानिस्तान में हिंसा फैलाने के लिए पाकिस्तान में प्रशिक्षण दिया गया था। काबुल के होटल और कंधार सैन्य शिविर पर हुए हमले में पाक स्थित आतंकी गुटों का जिम्मेदारी लेना बताता है कि आईएसआई कैसा खतरनाक खेल खेल रही है।

 

संयुक्त राष्ट्र की ताजा रिपोर्ट के अनुसार, अफगानिस्तान में जारी हिंसा का कोई फौजी हल नहीं है। बातचीत से ही शांति बहाल हो सकती है। हाल ही में काबुल में ‘काबुल प्रोसेस’ नाम से एक वैश्विक सम्मेलन में अफगान राष्ट्रपति ने शांति बहाली के लिए तालिबान से बिना शर्त बातचीत का प्रस्ताव रखा और उसे राजनीतिक संगठन के तौर पर मान्यता देने की भी घोषणा की। पर तालिबान ने इस पर चुप्पी साध रखी है। आम ख्याल यह है कि तालिबान अफगान इस पेशकश को मंजूर नहीं करेंगे। उन्हें मालूम है कि वे काफी मजबूत हो गए हैं और आईएसआई भी उसका साथ दे रही है। इसलिए अमेरिका के अफगानिस्तान छोड़कर जाने के बाद वे देश में फिर अपना शासन स्थापित करेंगे। तालिबान ने अमेरिका से सीधी बातचीत की पेशकश की है। अमेरिका पहले इसके लिए तैयार था, पर अब इसमें उसकी कोई रुचि नहीं है।


ट्रंप ने आतंकवाद के प्रति पाकिस्तान के ढुलमुल रवैये पर भी नाराजगी जताई है। अमेरिकी कोशिशों से ही पेरिस में फाइनेंशियल ऐक्शन टास्क फोर्स (एफएटीएफ) की हाल ही में आयोजित बैठक में शामिल 37 में से 36 देशों ने अमेरिका के प्रस्ताव का समर्थन करते हुए पाकिस्तान को ‘ग्रे लिस्ट’ में डाल दिया है। इस पर चीन ने भी सहमति जताई है। ऐसे में, अब पाकिस्तान का अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संस्थानों से कारोबार करना मुश्किल हो जाएगा। उसकी अर्थव्यस्था पहले से ही बहुत खराब है। ऐसे में, अगर उक्त फैसले पर पूरी तरह अमल होता है, तो अफगानिस्तान में पाक समर्थित तालिबान और दूसरे आतंकी गुटों को मदद देना इस्लामाबाद के लिए बहुत ही मुश्किल हो जाएगा, जिसका असर तालिबान द्वारा अफगानिस्तान में चलाई जा रही दहशतगर्दी पर पड़ेगा।

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