आज कोरोना का संकट हमारे सामने सुरसा की तरह मुंह बाए खड़ा है। लेकिन उससे भी अधिक चिंता का विषय बच्चों के पोषण पर पड़ने वाले इसके असर का है। स्वास्थ्य की दृष्टि से तो बच्चे इस महामारी को शायद झेल भी जाएं, लेकिन इस महामारी के दौरान और उसके बाद के आर्थिक संकट का सीधा दुष्प्रभाव महिलाओं और शिशुओं के पोषण पर पड़ेगा। इस संकट से लड़ने के लिए सरकार को बड़े पैमाने पर लोगों के लिए रोजगार के अवसर उपलब्ध कराने पड़ेंगे, माताओं और शिशुओं के लिए संतुलित आहार की व्यवस्था करनी पड़ेगी, और यह सब स्थानीय या गांवों के स्तर पर करना होगा, भले यह टेढ़ खीर ही क्यों न लगे। इसका एक संभावित समाधान है; और वह है सरकारी समर्थन से देश में व्यापक पैमाने पर पोषण वाटिकाएं स्थापित करना और उन्हें कायम रखना। पोषण वाटिका का मतलब भूमि के उस छोटे टुकड़े से है, जहां घर के लोग साग-सब्जी उपजाते हैं।
पोषण वाटिका वस्तुतः एक परिवार को पोषक तत्व देने वाली वाटिका है, जो पूरे साल कुछ न कुछ उपज देती रहती है, चाहे वह साग-सब्जी हो, फल हो, कंद या मूल हो, बीज हो या फिर सहजन की पत्तियां ही क्यों न हों। यह उपज परिवार में बच्चों को, आहार में विविधता की वजह से, सारे जरूरी पोषक तत्व, जैसे प्रोटीन, खनिज और अन्य सूक्ष्म तत्व देती है। ये पोषक तत्व बच्चों के शारीरिक और मानसिक विकास के लिए बहुत ही आवश्यक हैं। दाल-चावल से बच्चे का पेट तो भर जाता है, लेकिन उसका शरीर नहीं भरता। शरीर के विकास के लिए सूक्ष्म तत्व और आहार की विविधता अत्यावश्यक है, खासकर समाज के उस बड़े से तबके के लिए, जो शाकाहारी है। मांस, मछली या खासकर अंडे खाने वाले मांसाहारी परिवारों के बच्चों को ये सारे सूक्ष्म तत्व कमोबेश मिल ही जाते हैं, लेकिन शाकाहारी बच्चों को ये तत्व सहज तौर पर नहीं मिलते। ऐसे परिवारों की संख्या लाखों में है और उनको पोषण वाटिकाएं स्थापित करने के लिए आर्थिक सहायता सरकारी कोष को छोड़कर और कहीं से मिलनी मुश्किल है।
पोषण वाटिका की इस पहल का सबसे बड़ा फायदा छोटे बच्चों को मिलेगा। यह सबको पता है कि सुपोषण की नींव गर्भावस्था में और जीवन के पहले दो वर्षों में पड़ती है। गर्भ में और जन्म के बाद पहले छह महीने में तो मां का दूध ही शिशु को सुरक्षा कवच प्रदान करता है। लेकिन समस्या अगले अट्ठारह महीनों में आती है, जो पूरक आहार के महीने होते हैं। इन महीनों के दौरान शिशु पर खतरे काफी बढ़ जाते हैं, जो कुपोषण के, दस्त के, सांस के कष्ट और निमोनिया के होते हैं। क्रिकेट की भाषा में अगर कहें, तो ये अट्ठारह महीने वस्तुतः पावर प्ले वाले वे पांच ओवर हैं, जहां रन तो कठिनाई से बनते ही हैं, साथ में विकेट गंवाने का खतरा भी बढ़ता है। डायरिया और निमोनिया इसके दो मुख्य कारण हैं।
कोरोना की महामारी में यह संकट और भी गहरा सकता है। पूरक आहार और उसके जरिये आहार में विविधता लाना उनके लिए अहम हो जाता है और इसी कारण वर्तमान समय में पोषण वाटिकाओं की अहमियत और बढ़ जाती है। ऐसे में, आवश्यक यह है कि आने वाले महीने में सभी ग्रामीण इलाकों में पोषण वाटिकाओं का बड़े पैमाने पर प्रसार किया जाए। इसी साल ग्रामीण विकास के क्षेत्र में एक बड़ी पहल की गई है, जिसका बाल-कुपोषण से निपटने में बड़ा और दूरगामी योगदान हो सकता है। विगत चार मई को की गई इस पहल के तहत अब निजी या सामुदायिक जमीन पर पोषण वाटिका स्थापित करने और इसके रख-रखाव पर होने वाले खर्च में मनरेगा से सहायता ली जा सकती है। सारे छोटे और नाममात्र के किसान परिवारों, आंगनबाड़ी केंद्रों और आश्रमशालाओं को इसका लाभ मिलना चाहिए।
इसमें मनरेगा के साथ ही साथ सीएसआर (कॉरपोरेट सोशल रेस्पांसिबिलिटी) और पंचायतों को मिलनेवाली वित्त आयोग की राशि का भी इस्तेमाल होना चाहिए। इस निर्णय से पोषण वाटिकाओं के बड़े पैमाने पर प्रसार के रास्ते में आनेवाली आर्थिक बाधाएं दूर हो जाएंगी। मनरेगा के सहारे का एक और फायदा यह है कि पोषण वाटिकाओं की स्थापना और रख-रखाव में मिलने वाली मजदूरी की राशि मां को मिल सकती है। इसका लाभ यह होगा कि शराब या तंबाकू पर खर्च होने के बजाय यह राशि निश्चित तौर पर परिवार के सुपोषण के काम आएगी। इस पहल का लाभ महिलाओं के स्वयं सहायता समूह भी बड़े पैमाने पर उठा सकते हैं। उन्हें अगर सामूहिक आधार पर उपलब्ध सरकारी जमीन पर पोषण वाटिकाएं स्थापित करने का अवसर दिया जाए, तो यह उनके लिए आय का भी एक जरिया बन सकता है। पोषण वाटिकाओं से होनेवाली अतिरिक्त उपज को ऐसे समूह बाहर बाजार में भी बेच सकते हैं। इतना ही नहीं, ऐसी वाटिकाओं को बहुत सहजता के साथ मुर्गा और मछली पालन की छोटी इकाइयों से भी जोड़ा जा सकता है।
एक तरह से अगर हम देखें, तो पोषण वाटिकाओं में निवेश के जरिये एक तीर से तीन शिकार किए जा सकते हैं-इससे स्थानीय अर्थव्यवस्था और रोजगार को बढ़ावा मिलेगा, अभाव के माहौल में खाद्य विविधता सुनिश्चित की जा सकेगी और महिलाओं के लिए गांवों में ही आय का एक साधन मुहैया कराया जा सकेगा। इसलिए यह कोई आश्चर्य की बात नहीं कि ओडिशा सरकार ने मनरेगा के जरिये लगभग पांच लाख परिवारों को 500 करोड़ रुपये की आर्थिक सहायता देने का निर्णय ले लिया है। क्या देश के दूसरे राज्य इसका अनुसरण करेंगे? यह उम्मीद की जानी चाहिए कि देश की सारी पंचायतों में इस पहल का बड़े पैमाने पर लाभ उठाया जाएगा, ताकि बाल कुपोषण और बाल मृत्यु से बचा जा सके। इससे समाज के पास कम से कम संसाधनों की कमी का बहाना तो नहीं रहेगा।
(-लेखक केंद्र सरकार के सचिव के पद से सेवानिवृत्त होकर संप्रति आईआईटी, बॉम्बे में प्राध्यापक हैं।)