विकसित देशों में यह सोच आम है कि परिवार में बच्चा आता है, तो अपने साथ खर्च लेकर आता है। जबकि भारत में बच्चे के जन्म को परिवार की खुशी से जोड़ा जाता था। अब हमारे यहां भी बच्चों को जन्म देना इतना आर्थिक बोझ लगने लगा है कि बड़े शहरों के लोग एक से ज्यादा बच्चे के इच्छुक नहीं हैं। यह नया चलन हाल में औद्योगिक संगठन एसोचैम के एक सर्वेक्षण से भी साबित हुआ है। देश के दस बड़े शहरों में डेढ़ हजार कामकाजी महिलाओं से उनकी आर्थिक हैसियत के बारे में ये विवरण एसोचैम सोशल डेवलपमेंट फाउंडेशन ने जुटाए हैं। यह रिपोर्ट बताती है कि 35 फीसदी महिलाएं परवरिश पर ज्यादा ध्यान की मांग और भारी खर्च के कारण सिर्फ एक बच्चे की हिमायती हैं। घर और दफ्तर में बेहतर प्रदर्शन का दबाव और करियर पर ध्यान देने की अपेक्षाओं के मुताबिक महिलाओं को सीमित परिवार जरूरी लगने लगा है। इस सर्वेक्षण में हालांकि यह साफ नहीं है कि एक बच्चे वाली मांओं में कितनी ऐसी हैं, जिनकी इकलौती संतान लड़की है। अब बेशक लोग लड़कियों को अहमियत देने लगे हैं, पर जिस परिवार में पहली संतान लड़की होती है, वहां महिलाओं पर दूसरा बच्चा यानी लड़का पैदा करने का पारिवारिक-सामाजिक दबाव होता है।