वर्ष 1985 में एक भूखे परिवार ने ओडिशा के कालाहांडी में मात्र 40 रुपये के लिए अपनी बारह वर्ष की बेटी को बेच दिया था। उस खबर ने पूरे देश को स्तब्ध कर दिया था और तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी को वहां का दौरा करना पड़ा था। तब उनका वह बयान काफी चर्चित हुआ था कि गरीबी उन्मूलन कार्यक्रम के लिए केंद्र से भेजे गए सौ रुपये में से मात्र पंद्रह रुपये लक्षित लाभार्थी तक पहुंचते हैं।
पिछले हफ्ते तीन छोटी बच्चियां अपने घर में मृत पाई गईं। पोस्टमार्टम रिपोर्ट से पता चला कि वे कुपोषण, भूख और उससे संबंधित समस्याओं के कारण मरीं। कुछ महीने पहले झारखंड की ग्यारह वर्षीय लड़की संतोषी इसी तरह मर गई थी। 1985-86 में भारत खाद्य एवं उर्वरक सब्सिडी पर 3,500 करोड़ रुपये खर्च करता था। 2018-19 में अकेले खाद्य सब्सिडी का आवंटन 1.69 लाख करोड़ रुपये है। इसके अलावा 24,700 करोड़ रुपये समेकित बाल विकास सेवा और 10,500 करोड़ रुपये मध्याह्न भोजन के लिए आवंटित किया गया है।
शासन के बारे में राजीव गांधी की उस पारिभाषिक टिप्पणी के तीन दशक बीत चुके हैं। तबसे राशनिंग की प्रक्रिया पीडीएस से संशोधित पीडीएस और फिर लक्षित पीडीएस में बदल गई है। अक्तूबर, 2000 में वाजपेयी शासन में अत्यंत गरीबों के लिए अंत्योदय योजना शुरू की गई थी। 2001 में भूख से मौत के बाद सर्वोच्च न्यायालय में भोजन के अधिकार को बाध्यकारी अधिकार बनाने के लिए एक याचिका दायर की गई थी। अदालत ने केंद्र और छह राज्यों के लिए 40 से अधिक अंतरिम आदेश जारी किए। सितंबर, 2013 में संसद ने खाद्य सुरक्षा अधिनियम पारित किया-यह एक ऐसा कानून है, जो भोजन के अधिकार को न्यायसंगत बनाता है। देखने वाली बात यह है कि यह त्रासदी देश के बीमारू राज्यों में नहीं हुई है, बल्कि राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र नई दिल्ली में हुई है। यूनिसेफ का अध्ययन बताता है कि पांच वर्ष से कम उम्र के आधे से ज्यादा बच्चों की मौत कुपोषण के कारण होती है। आखिरी मील की विफलता विभिन्न क्षेत्रों और भूगोलों में शासन को प्रभावित करती है।
निर्भया मामले के बाद सरकार ने यौन अपराधों से संबंधित कानून में संशोधन किया था, ताकि अपराधियों में भय पैदा हो। पर पिछले महीने सरकार ने संसद को बताया कि 2014 से 2016 के बीच देश में बलात्कार के 1,10,333 मामले दर्ज हुए, यानी प्रतिवर्ष 36,777, प्रति महीने 3,064, प्रतिदिन 102 और प्रति घंटे चार।
रोकथाम सजे हुए शब्दों से ज्यादा की मांग करता है। गुणवत्ता और क्षमता के अभाव में कानून का राज स्थापित नहीं हो पाता-19.89 लाख पुलिस कर्मियों के स्वीकृत पदों में 4.43 लाख पद खाली हैं। अदालतों में बलात्कार के 1.33 लाख से ज्यादा मामले लंबित हैं और बच्चों से बलात्कार के मुश्किल से तीन फीसदी मामले में अपराधियों को सजा होती है। तीन कैदियों में से दो यानी 4.2 लाख कैदियों में 2.93 लाख कैदी विचाराधीन हैं।
आपराधिक न्याय प्रणाली को न्याय प्रदान करना चाहिए, लेकिन वह दम तोड़ रही है। विभिन्न अदालतों में 3.3 करोड़ मामले लंबित हैं। सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश कुरियन जोसेफ ने सलाह दी थी कि लंबित मामलों को निपटाने के लिए जजों की सेवानिवृत्ति की उम्र 65 से बढ़ाकर 70 कर देनी चाहिए। सुप्रीम कोर्ट में जजों के स्वीकृत पद 31 हैं, जिनमें से आठ पद रिक्त हैं। उच्च न्यायालयों में जजों के 1,079 पद मंजूर हैं, लेकिन 411 पद रिक्त हैं, और निचली अदालतों में जजों के 5,925 पद रिक्त हैं। अप्रैल, 2015 में राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग की अधिसूचना जारी की गई, जिसे अक्तूबर, 2015 में सुप्रीम कोर्ट ने पलट दिया। नतीजतन गतिरोध बना हुआ है।
आखिरी मील पर शासन की विफलता बुनियादी सेवाओं में प्रकट होती है। हजारों स्कूल में बिजली नहीं है और सैकड़ों स्वास्थ्य केंद्रों में पेयजल की सुविधा नहीं है। शहरी क्षेत्र की दुर्दशा में शासन की उदासीनता दिखती है-चाहे वह हवा की गुणवत्ता या जलापूर्ति का मामला हो या ऊर्जा की विश्वसनीयता, सार्वजनिक परिवहन और बुनियादी ढांचे का मामला। कई शहरों में शहरी भारतीय अपना एक चौथाई समय काम पर जाने और घर लौटने में खर्च करते हैं। दिल्ली को 11,000 बसों की जरूरत है, पर सड़कों पर मात्र 5,554 बसें हैं। पुणे में पीएमपीएमएल बस सेवा में प्रतिदिन 150 से ज्यादा बसें खराब होती हैं, पिछले छह महीनों 30 हजार बार बसें खराब हुई हैं। जुलाई में महाराष्ट्र विधानसभा को स्थगित करना पड़ा, क्योंकि नागपुर (मुख्यमंत्री का गृहशहर) स्थित विधानभवन परिसर में बारिश का पानी घुस गया था। ऐसे ही दो घंटे की भारी बारिश ने दिल्ली को अपंग बना दिया। जैसे ही बरसात का मौसम आता है, प्रमुख मेट्रो शहर और राज्य की राजधानियां जलजमाव का शिकार हो जाती हैं। कहीं बहुत ज्यादा पानी है, तो कहीं पानी की कमी है। पानी का नियंत्रण कई कानूनों और केंद्र तथा राज्य के छह-छह मंत्रालयों के अलावा नगरपालिकाओं द्वारा होता है। नगर निकायों द्वारा पीने योग्य पानी उपलब्ध न करा पाने के कारण टैंकर माफिया फलते-फूलते हैं। पिछले महीने नीति आयोग ने बताया कि 21 शहरों में भूजल नहीं है और जहां है, वह काफी प्रदूषित है। शहरी भारत हर दिन 61,948 मिलियन (61.94 अरब) लीटर कचरा उत्पन्न करता है, जिनमें से मात्र एक तिहाई को संशोधित किया जाता है। यह कचरा और औद्योगिक प्रदूषण भूजल स्रोतों को विषाक्त बना देते हैं। बंगलूरू के बेलंदुर झील में समय-समय पर लगने वाली आग शहरी उपेक्षा की गवाही देती है।
कानून की किताबों में नीतियों और कानून की कोई कमी नहीं है। केंद्र और राज्य सरकारें कुल मिलाकर 35 लाख करोड़ रुपये खर्च करती है। भारत की संसद में 776 सीटें हैं। भारतीय 4120 विधायकों और स्थानीय निकाय के 2.6 लाख सदस्यों को चुनते हैं। लोगों का वास्तविक प्रतिनिधित्व करने के लिए इन निर्वाचित सदस्यों को सोचना चाहिए कि नीतियां क्यों विफल हुईं और आखिरी मील तक क्यों नहीं पहुंच सकीं।
-लेखक आईडीएफसी इंस्टीट्यूट के विजिटिंग फेलो हैं।