हम पिछली एक शताब्दी का सिंहावलोकन करें, तो पाएंगे कि इस दौरान हम बदले, समाज बदला, देश बदला और संसार भी बदला है। दुनिया ने जिस आधुनिक ‘विकास’ के मॉडल को अपनाया है, उसमें जल, जंगल, जमीन के साथ इंसान भी नफरत और हिंसा का शिकार हो रहा है। हिंसा की भावना पूरे जैव-जगत के लिए विध्वंसकारी होती है। ऐसे में हमें सबसे पहले महात्मा गांधी के बुनियादी विचार और जीवन शैली ही याद आती हैं। 150 बरस बाद भी हमें गांधी ‘पर्यावरण योद्धा’ के तौर पर नजर आते हैं, क्योंकि उनकी विचारधारा में हम ‘प्रकृतिवादी’ सोच को महसूस कर सकते हैं।
गांधी ने हमेशा ‘परिवर्तन’ की तुलना में ‘स्थिरता’ को प्राथमिकता दी थी। चरखे का प्रयोग, पानी संग्रहण का तरीका, सफाई, पर्यावरण प्रदूषण से निजात दिलाने के तरीके आदि उनके वैज्ञानिक सोच को दर्शाते हैं। गांधी के चरखे द्वारा ‘कपास से कपड़े’ तक के सफर को देखें, तो हम पाते हैं कि खादी के निर्माण में न बिजली का उपयोग होता है, न ही जल प्रदूषण होता है। इसलिए वे संयम की बात पर बल देते हुए कहते हैं कि हमें प्रकृति से उतना ही लेना चाहिए, जितना कि हम उसे लौटा सकें। जो लोग महात्मा गांधी की अहिंसा का दायरा सिर्फ मनुष्य द्वारा मनुष्य के खिलाफ हिंसा का निषेध या शाकाहार तक समझते हैं, वे उनकी अहिंसा का अधूरा पाठ समझते हैं। वस्तुत: जब तक विविध प्राकृतिक संसाधनों-वनस्पतियों, नदियों, पर्वतों, वन्य प्राणियों, पशु-पक्षियों की कीमत पर चलने वाली औद्योगिक पद्धति को बदल कर उसे मानव श्रम, प्रकृति की संगति पर आधारित नहीं करते, तब तक अहिंसा अपने संपूर्ण संदर्भ में अर्थपूर्ण नहीं हो सकती।
आज पर्यावरण प्रदूषण की समस्या विकराल होती जा रही है। ऐसे में कम उपभोग की नीति पर चलकर, लालच को कम करके ही पर्यावरण को बचाया जा सकता है। गांधीवाद हमें कुदरत के प्रति करुणा का भाव सिखाता है। अगर हमें आने वाली पीढ़ियों के लिए पर्यावरण को बचाए रखना है, तो गांधी के बताए रास्तों के अलावा और कोई दूसरा रास्ता नहीं हो सकता है। हम यदि महात्मा गांधी की पर्यावरणीय वैज्ञानिक सोच को अपना रास्ता बनाएं, तो स्वयं तो विनाश से बचेंगे ही, दुनिया के लिए भी एक आदर्श मॉडल प्रस्तुत कर सकेंगे।
आज देश-दुनिया में हुए पर्यावरणीय और सामाजिक आंदोलनों की बुनियाद में हम पाएंगे कि अहिंसक आंदोलन एक अलग छाप छोड़ता है, जो आमजन को जोड़ने में कामयाब होता है। इनकी बुनियाद में गांधीवाद की ही शक्ति निहित होती है। देश महात्मा गांधी को भूला नहीं है, बल्कि ‘गांधी’ को अपने इर्द-गिर्द ढूंढ़ रहा है। जहां-जहां उनका नाम है, विचार हैं, कार्यों का वृत्तांत है, उनके संदेश हैं, वहां से हमें निरंतर प्रेरणा मिलती रहेगी।