इटली की पुलिस ने अपने ही यहां की रक्षा कंपनी फिनमैकानिका के मुख्य कार्यकारी अधिकारी को रिश्वत देकर सौदा हासिल करने के आरोप में गिरफ्तार किया है तथा इसकी सहयोगी अगस्ता-वेस्टलैंड के प्रमुख को नजरबंद किया गया है, तो ऐसा केवल सामान्य संदेह के आधार पर संभव नहीं है। इसलिए तत्काल तो यह मानना ही होगा कि अति विशिष्ट लोगों के लिए इटली से खरीदे गए वीवीआइपी हेलीकॉप्टरों के करीब 3,600 करोड़ रुपये के सौदे में दलाली दी और ली गई।
हां, यह राशि साढ़े तीन सौ करोड़ रुपये है या नहीं, इस बारे में निश्चित तौर पर कुछ कहा नहीं जा सकता। इसके बाद अपनी सरकार के लिए मामले की जांच सीबीआई से कराने का आदेश देने तथा फिलहाल इन हेलीकॉप्टरों की अगली खेप लेने पर रोक लगाने के अलावा दूसरा विकल्प नहीं था। अगर आरोप प्रमाणित हुए, तो सौदा भी रद्द करना पड़ेगा।
सरकार ने बेशक राजनीतिक विरोध की धार कमजोर करने के लिए ये दोनों फैसले किए हैं, पर देश इससे शांत होकर जांच के परिणामों की प्रतीक्षा करने का धैर्य खो चुका है। आखिर बोफोर्स तोप जांच की परिणति हमारे सामने है। दरअसल हमारी सरकार ने 2010 में फिनमैकानिका की सहयोगी अगस्ता-वेस्टलैंड (यूके) के साथ वायुसेना के एलिट कम्युनिकेशन स्क्वॉड्रन के लिए 12 एडब्ल्यू-101 वीवीआईपी हेलीकॉप्टरों की खरीद का सौदा किया था।
इनमें से कुछ की आपूर्ति हो चुकी है। अगर इटली में जांच आगे नहीं बढ़ती, तो हेलीकॉप्टरों की आपूर्ति यथासमय हो जाती एवं भुगतान भी। वस्ततः इन दिनों इटली में कई कंपनियों पर ठेके या सौदे के लिए घूस देने के आरोपों की जांच चल रही है।
अभी तक हालांकि हेलीकॉप्टरों की गुणवत्ता पर सवाल नहीं उठे हैं। यह -45 डिग्री न्यूनतम तापमान में उड़ने के साथ रेगिस्तानी इलाकों में भी काम करने की क्षमता रखता है। आरंभ में वित्त मंत्रालय ने इस पर प्रश्न उठाए थे, पर रक्षा मामलों की मंत्रिमंडलीय समिति ने इसे स्वीकृति दी और बाद में वित्त मंत्रालय भी सहमत हो गया।
दरअसल वायुसेना लंबे समय से बदलते सुरक्षा माहौल के मुताबिक अत्याधुनिक हेलीकॉप्टरों की मांग कर रही थी। रक्षा आधुनिकीकरण की दृष्टि से अत्याधुनिक और ऐसे अन्य उपकरणों, वायुयानों आदि की खरीद अपरिहार्य है। लिहाजा अगर सौदा रद्द होता है, तो यह आधुनिकीकरण के लिए धक्का होगा। किंतु सौदा पारदर्शी होना चाहिए।
जब एक बार यह नियम बन गया कि रक्षा खरीद में किसी बिचैलिये की मदद नहीं ली जाएगी, तो फिर पूरा सौदा सरकार और कंपनी के अधिकारियों के बीच ही संपन्न होना चाहिए था। लेकिन इटली में हुई जांच प्रगति से इसके काला होने का प्रमाण मिल रहा है। वैसे यह सच है कि अपनी सरकार की ओर से अप्रैल और अक्तूबर में इटली और ब्रिटेन से मदद मांगी गई थी।
हम रक्षा मंत्रालय की यह बात मान लेते हैं कि जांच में प्राप्त जानकारियों को लेकर बार-बार आग्रह के बावजूद इटली और ब्रिटेन सरकार की ओर से कोई जानकारी नहीं दी गई। पर वहां की समाचार एजेंसियों से सूचनाएं छन-छनकर आती रही हैं। लिहाजा यह सरकार का दायित्व था कि उसका संज्ञान लेकर पहले ही जांच आरंभ कर देती।
अगर इस कंपनी के भारत में विस्तार को देखें, तो ब्रिटिश काल में भी हेलीकॉप्टरों की आपूर्ति करने वाली यह कंपनी पिछले चार दशकों से लगातार आपूर्ति कर रही है। कंपनी की भारत के वाणिज्यिक हेलीकॉप्टर बाजार में करीब आधे की हिस्सेदारी है। अगर ऐसी कंपनी द्वारा घूस देकर सौदा पाने का आरोप लगा है, तो फिर इसकी सारी व्यापारिक गतिविधियां संदेह के घेरे में आ जातीं हैं। अगर कंपनी सौदे के लिए दलाली का इस्तेमाल कर रही है, तो ऐसा पहले भी हुआ होगा और भारत के बाहर भी।
वैसे रक्षा कंपनियां अपना उत्पाद बेचने के लिए घूस और लॉबिंग पर भारी खर्च करती है, लेकिन यूरोप की कोई जांच एजेंसी अगर इस पर रोशनी डालती है, तो वह अधिकृत माना जाएगा। रक्षा कंपनियां और इसके बिचैलिये कभी नहीं चाहेंगे कि सौदों के तौर-तरीकों की परत औपचारिक रूप से कभी उघड़े, इसलिए यह भी देखना होगा कि इटली की जांच एजेंसी ही इस मामले की कितनी ईमानदारी और पारदर्शिता से जांच कर पाती है।