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जय हे, जय हे... जय हे : राष्ट्रीय उत्सव और यशगान के बीच वह भी तलाशिये जो है हमारी पहचान

डॉ. नंदितेश निलय Published by: शिव शुक्ला Updated Thu, 15 Aug 2024 07:00 AM IST

सार

जर्मन दार्शनिक और मनोवैज्ञानिक फ्रांज ब्रेंटानो का तर्क है कि मानसिक क्रियाकलापों के तीन प्रकार हैं, जो किसी मानसिक घटना को परिभाषित करते हैं और सबसे महत्वपूर्ण क्रियाओं में से एक प्रेम और घृणा है। और प्राइमेट्स से लेकर आज तक मानव ने अपने विकास या अस्तित्व के लिए किसी भी समुदाय से नफरत नहीं करने में विश्वास किया था। यहां तक कि मानवविज्ञानी मार्गरेट मीड द्वारा साझा की गई एक फीमर के उपचार की प्रसिद्ध कहानी किसी भी चीज से ऊपर प्रेम की भावना की वकालत करती है।
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स्वतंत्रता दिवस। - फोटो : instagram


लेकिन क्या आज की दुनिया उस भाईचारे से नहीं चूक रही? पोस्ट पैंडेमिक वह भाईचारा कहीं खो चुका है। जिस तरह से हमास ने इस्राइल के लोगों की नृशंस हत्या की, फिर इस्राइल ने गाजा पट्टी पर बमों की बौछार कर दी, जिस तरह से रूस-यूक्रेन एक अंतहीन युद्ध की ओर बढ़ चुके हैं, जिस तरह से बांग्लादेश में अवामी लीग के नेताओं और हिंदू अल्पसंख्यकों को लगातार निशाना बनाया गया है, ऐसी दुनिया में भारत की आजादी की कहानी हम भारतीयों से आग्रह करती है कि हम इस विभेद के स्याह रंग में न खुद फंसें और न औरों को फंसने दें। बांग्लादेश से मोहम्मद यूनुस ने भी उस सद्भाव की मांग रखी, तो भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी यूनुस से आग्रह किया कि वह हिंदू व अन्य अल्पसंख्यक वर्ग के लोगों की सुरक्षा करें। आजादी हमें उस शांति और सद्भाव का संदेश देती है, जहां यह दर्ज है कि मुल्क के आजाद होने का मतलब प्रेम और भाईचारे के साथ आजादी की हवा में सांस लेना होता है। साथ-साथ यह मानना भी कि मनुष्य से बड़ा कुछ नहीं होता, न हुकूमत और न हैसियत। और यह भी कि मनुष्य बंटने या बांटने के लिए नहीं बना है, बल्कि बना है, इन्सानी रंग में रंगने और रंगाने के लिए। 


तभी तो 26 जनवरी, 1930 को जब पहला स्वतंत्रता दिवस मनाया जा रहा था, तब भारत के लोग अनेकता में एकता का तिरंगा फहराने में लगे हुए थे। और साथ ही वे यह समझना चाहते थे कि क्या आजादी का मतलब या तिरंगे का रंग कुछ बदल-सा जाता है, जब मजहब या जाति से इन्सान की पहचान निर्धारित होती है? और तब भारतीय स्वतंत्रता की दहलीज पर होमो सेपियंस यानी उस बुद्धिमान व्यक्ति ने नस्ल, धर्म, जाति के भेद से ऊपर रखा इन्सान के किरदार को, उस इकबाल को, उस देशभक्ति के इकरार को, जो गंगा- जमुनी तहजीब से फूटे भीमसेन जोशी के आलाप और बिस्मिल्ला खान की शहनाई से सुने जा सकते थे। वह आवाम की आवाज, जिसमें सिर्फ और सिर्फ भाईचारे की गुंजाइश थी। तभी तो जब 1947 में भारत के विभिन्न हिस्सों में एक अद्वितीय सौहार्द के साथ झंडा फहराया जा रहा था, तो पूर्वोत्तर के पहाड़ी शहर शिलांग में भी चार युवाओं (हिंदू और मुस्लिम) ने एक साथ नए भारत के जन्म का झंडा फहराया था। आजादी मिली, लेकिन हमने महात्मा गांधी को खोया और उस भाईचारे को भी, जिसने भारत की एकता की बुनियाद रखी थी। विभाजन ने हमसे सिर्फ जमीन का टुकड़ा नहीं, बल्कि वह जमीर भी दोनों तरफ से छीन िलया, जिसने मनुष्य के भाईचारे पर कभी संदेह नहीं किया था। आखिर मानव संस्कृति क्या है और वह कहां रहती है? समुदायों में, मंदिर, मस्जिद, गुरुद्वारे या चर्च में, या मनुष्य में? फ्रीडमैन की दुनिया सपाट हो गई, लेकिन क्या देश में सिर्फ बाजार की संस्कृति ही मानव व्यवहार के नियम तय करती है या मनुष्य सबसे पहले मनुष्यता की संस्कृति बनाता है। अगर हां, तो वहां भाईचारे की गुंजाइश बनी रहती है।


जर्मन दार्शनिक और मनोवैज्ञानिक फ्रांज ब्रेंटानो का तर्क है कि मानसिक क्रियाकलापों के तीन प्रकार हैं, जो किसी मानसिक घटना को परिभाषित करते हैं और सबसे महत्वपूर्ण क्रियाओं में से एक प्रेम और घृणा है। और प्राइमेट्स से लेकर आज तक मानव ने अपने विकास या अस्तित्व के लिए किसी भी समुदाय से नफरत नहीं करने में विश्वास किया था। यहां तक कि मानवविज्ञानी मार्गरेट मीड द्वारा साझा की गई एक फीमर के उपचार की प्रसिद्ध कहानी किसी भी चीज से ऊपर प्रेम की भावना की वकालत करती है। यहां तक कि जानवरों ने भी मानव जाति के लिए प्रेम का प्रस्ताव ही रखा। तभी तो आक्रामक और कैनाइन से लैस होने के बावजूद मनुष्य और जानवर एक साथ रहना सीख गए-साथ टहलना, बात करना, खेलना, और सुख-दुख बांटना भी। तो क्या नागरिक व्यवहार में वह भाईचारा नजर नहीं आ सकता, हर व्यक्ति के मन में, संसद में, समाज में, परिवार में? हमारे परिवारों में वह एकसाथ या साथ-साथ की मिठास कहीं खो तो नहीं गई? मध्य वर्ग कहीं संविधान की प्रस्तावना ‘हम भारत के लोग’ को भूल तो नहीं रहा? क्या भाईचारा या एकता सिर्फ सैनिक या खिलाड़ियों की जिम्मेदारी है या एक आम नागरिक की भी? हमारे सैनिक तो देश के प्रति प्रेम के पर्याय हैं और देशभक्ति को सार्वभौमिक रूप से परिभाषित करते हैं। वे पीड़ितों का वीडियो नहीं बनाते, बल्कि किसी भी परिस्थिति में मदद के लिए आगे आते हैं। एक सैनिक के निर्माण में धर्म, जाति, वर्ग, भूगोल के लिए कोई जगह नहीं होती, बल्कि सिर्फ और सिर्फ देश और भाईचारे की जगह होती है। वे होते तो बेसमेंट में कोई नहीं डूबता और न ही सपने देखने के लिए कोई बिजली के तार से चिपक जाता। वे तो दिल में भाईचारा लिए दुश्मनों से सरहद की रक्षा करते हैं और कृतज्ञ रहते हैं अपने हिंद की मिट्टी के प्रति। याद कीजिए, हिंदी भाषा के महान लेखक चंद्रधर शर्मा गुलेरी की कहानी, ‘उसने कहा था’ का प्रसिद्ध पात्र लहना सिंह, जो युद्ध के मैदान में मृत्युशैया पर अपनी प्रेमिका का वादा निभाने से नहीं चूका और इसलिए उसने उसके पति को बचा लिया। वह आसमान की ओर देख रहा था और उसने अपने देश के साथ-साथ अपने वादे को भी बचा लिया, क्योंकि ‘उसने कहा था।’ 


आजादी हमें देशभक्ति सिखाती है और तराशती है देश की मिट्टी को, जहां एक साथ रहने और जीने की संभावना बनती है। और उन पूर्वाग्रहों और जड़ विचारों को गुलाम बनाती है, जो शक्ति से स्वतंत्रता के भाईचारे के तारों को तोड़ते और मरोड़ते हैं। संसद भी पूछती है कि हमारा और तुम्हारा परिचय आजादी के इतने सालों बाद जाति या धर्म ही क्यों है, और क्यों भाषा का स्तर इतना गिर रहा है और क्यों गिर रहा है आचरण मनुष्य का? क्यों इतनी घृणा बेसमेंट के पानी की तरह मन में भरती जा रही है और अगर प्रजातंत्र उस जनमानस का प्रतिनिधित्व है, तो क्या वह जनमानस इस टूटते भाईचारे की आवाज बनना चाहता है? अगर नहीं, तो फिर इतना हंगामा क्यों है और महात्मा गांधी का देश, मानवता के लिए वह आत्मिक भाईचारे की आवाज क्यों नहीं बन सकता! क्योंकि भाईचारा वह सत्य है, जहां मनुष्य होने की आवाज सुनाई पड़ती है। महात्मा गांधी ने कहा था, ‘सत्याग्रह शुद्ध आत्मिक शक्ति है। इसमें प्रेम की लौ जलती है... अहिंसा ही परम धर्म है।’ और अब समय आ गया है कि संसार की नई पीढ़ी को सिखाया जाए कि राजनीति और नैतिकता कोई अलग विषय नहीं है, बल्कि एकीकृत और समग्र है। ऐसा दृष्टिकोण हम सभी को अहिंसा और शांति की नींव पर एक देशभक्त नागरिक के रूप में उभरने, विकसित होने, और सामाजिक सद्भाव को बढ़ाने में मदद करेगा और उस प्रक्रिया को रोकेगा, जो हमें मनुष्य के अलावा कुछ और बनाना चाहती है। आर.के. नारायण के उपन्यास वेटिंग फॉर द महात्मा का नायक सियाराम जब महात्मा गांधी से मिलता है, तो वह उनके पास बैठने से कतराता है। हालांकि, वह यह वादा जरूर करता है कि अगली मुलाकात में वह एक नए सियाराम के रूप में सामने आएगा। और यहीं पर महात्मा गांधी उसे आजादी का मतलब समझाते हैं और बताते हैं कि आजादी का मतलब कुछ नया बनना नहीं है, बल्कि इन्सानियत के साथ खुद को समझना और खुद को और जानना है। इस ओलंपिक में अरशद नदीम को गोल्ड मिला और नीरज गोल्ड से चूक गए, लेकिन इस बार भी वे भाईचारे और प्रेम के सद्भाव से नहीं चूके। यहां तक कि उनकी मां भी नहीं चूकीं और उन्होंने अरशद के लिए कहा,’हम बहुत खुश हैं। हमारे लिए तो सिल्वर भी गोल्ड के ही बराबर है। गोल्ड जीतने वाला भी हमारा ही लड़का है। मेहनत करता है।’ हम भी आजादी का अर्थ फिर से समझें और कभी भी भाईचारे से न चूकें, क्योंकि नीरज चोपड़ा की पहचान सिर्फ कोई भाला और कुछेक मीटर नहीं है, बल्कि वह तहजीब है, जिससे एक ही आवाज आती है और जो सरहद के पार भी जाती है। वह आवाज है-जय हे, जय हे, जय हे।

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