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तकनीक: कृत्रिम मेधा के दम पर उदासी और अवसाद से दो-दो हाथ

साराह हेलेवैल, रिसर्च फेलो (हेल्थ साइंस), कर्टिन यूनिवर्सिटी Published by: गुलाम अहमद Updated Fri, 29 Dec 2023 06:57 AM IST

सार

अब सोशल मीडिया पर आपकी पोस्ट या इमोजी को देखकर भी एआई आपके अवसाद का स्तर जांच लेगी। चैटजीपीटी लिंग, और सामाजिक-आर्थिक पूर्वाग्रहों से भी प्रभावित नहीं है, जबकि चिकित्सकों में ऐसा देखने को नहीं मिलता।
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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : iStock


अवसाद का निदान इतना मुश्किल होता है कि सामान्य चिकित्सक तो अवसाद के आधे से भी कम मामलों का सही-सही पता लगा पाते हैं। ऐसा इसलिए, क्योंकि इसके निदान के लिए चिकित्सक मरीज द्वारा बताए लक्षणों, मरीज से पूछे जाने वाले सवालों से निकले जवाबों और नैदानिक रिपोर्टों का ही सहारा लेते हैं।


जिन लोगों में अवसाद का सही-सही निदान हो जाता है, उनके इलाज के बहुत से तरीके हैं, जिनमें संवाद, ध्यान और जीवन शैली में बदलाव जैसे उपाय भी शामिल हैं। हालांकि हर व्यक्ति के मामले में इलाज की प्रतिक्रिया अलग-अलग देखने को मिलती है और हमारे पास पहले से यह जानने का कोई तरीका नहीं है कि कौन इलाज कारगर होगा और कौन-सा नहीं। एआई कंप्यूटरों को इंसान की तरह सोचने के लिए प्रशिक्षित करती है, जिसमें तीन इंसानी व्यवहारों पर जोर दिया जाता है। ये हैं- सीखना, तर्क करना और सुधार करना। एआई की एक शाखा मशीन लर्निंग है, जिसका उद्देश्य सीखने, डाटा में प्रतिरूपों का पता लगाने और इंसान के मार्गनिर्देशन के बिना डाटा युक्त भविष्यवाणी करने के लिए कंप्यूटरों को प्रशिक्षित करना है। हाल के वर्षों में अवसाद जैसी बीमारियों के, निदान में एआई का उपयोग करने वाले शोध काफी हो रहे हैं।


वैज्ञानिकों ने जब चैटजीपीटी के निदानों और डॉक्टरों द्वारा किए गए निदानों की तुलना की, तो हैरान करने वाले नतीजे मिले। जब अवसाद की गंभीरता, लिंग और सामाजिक-आर्थिक स्थिति वाले विभिन्न काल्पनिक मरीजों के बारे में चैटजीपीटी को बताया गया, तो उसने ज्यादातर मरीजों के लिए टॉक थैरेपी यानी संवाद से इलाज का तरीका सुझाया। जबकि चिकित्सकों ने ऐसे रोगियों के लिए अवसाद रोधी दवाएं दिए जाने का सुझाव दिया। चैटजीपीटी लिंग, और सामाजिक-आर्थिक पूर्वाग्रहों से भी प्रभावित नहीं है, जबकि चिकित्सकों में ऐसा देखने को नहीं मिलता, वे शारीरिक श्रम से जुड़े नौकरी करने वालों को अक्सर अवसादरोधी दवाएं ही लिखते हैं।


एमआरआई-आधारित एआई मशीनें केवल शोध में ही उपयोग की जाती हैं, पर जैसे-जैसे एमआरआई स्कैन सस्ते, तेज और एक जगह से दूसरी जगह ले जाने में सक्षम हो रहे हैं, उससे पूरी संभावना है कि यह नई तकनीक चिकित्सा सामान का हिस्सा बन जाएगी। वैज्ञानिकों ने एआई का उपयोग करते हुए सोशल मीडिया पोस्ट और इमोजी के विश्लेषण से भी अवसाद का पता लगाया है।

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