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प्रशासन यानी विचारों की अकाल मौत

आर विक्रम सिंह
Updated Sun, 25 Jun 2017 05:13 PM IST
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आर विक्रम सिंह
लक्ष्य विहीनता एक प्रमुख प्रशासनिक समस्या है। अब वर्ष 2022 तक किसानों की आय दोगुना करने का लक्ष्य नियत किया गया है। यह एक आर्थिक लक्ष्य है। जाहिर है कि कृषि, ग्रामीण विकास, पशुपालन, कृषि भंडारण, सहकारिता, कृषि व्यापार, सिंचाई आदि से संबंधित विभागों  में बेहतर सामंजस्य की आवश्यकता होगी। लेकिन विडंबना यह है कि हमारी प्रशासनिक व्यवस्थाएं लक्ष्यों का उस तरह से पीछा नहीं करतीं, जैसा कि कॉरपोरेट दुनिया में चलन है। इसके लिए आवश्यक यह है कि प्रत्येक प्रदेश में संबंधित विभागीय मंत्रियों की समिति का गठन हो एवं वरिष्ठतम मंत्री के मार्गदर्शन में एक समेकित योजना पर कार्य प्रारंभ कर दिया जाए। ग्रामीण विकास का एक विभाग के रूप में न होना एवं विभिन्न विभागों में उसका विभाजित होना इस लक्ष्य की पूर्ति में बड़ी बाधा है। अगर उपरोक्त विभाग ग्रामीण विकास के छत्र के नीचे उप विभाग जैसे होते, तो काम आसान था। पर कमजोर सरकारों के दौर में मंत्रियों की बढ़ती हुई संख्या ने कभी मुख्यमंत्री को मजबूर किया होगा कि एक ही विभाग को अस्वाभाविक रूप से ही सही, खंड-खंड कर टुकड़ों में बांटा जाए। विभागों के बन जाने के बाद उनके विभागीय हित उत्पन्न हो जाते हैं। वैसे में पुनः एकीकरण का कार्य टेढ़ी खीर हो जाता है। परिणामस्वरूप आज कृषकों की आय दोगुना करने के संकल्प को पूर्ण करना एक बड़ी आर्थिक एवं प्रशासनिक चुनौती है।


इसी प्रकार का मसला नगर विकास और आवास का भी है। क्या नगर विकास और नगरीय आवास को अलग करके देखा जा सकता है? नगर निगम में कार्यकाल के दौरान यह अस्वाभाविकता स्पष्ट रूप से सामने आई। नगर निगमों में तो कर्मचारियों के लिए प्रायः वेतन की व्यवस्था भी मुश्किल से हो पाती थी, जबकि विकास प्राधिकरणों में उसी नगर से वसूल किए गए विकास शुल्क की सैकड़ों करोड़ रुपये की धनराशि फिक्स डिपोजिट में जमा रहती है। एक ओर तो नगर निगमों के मुख्य संसाधनों को उनसे काटकर विकास के  नाम पर प्राधिकरण बनाकर नगर निगमों को अभावग्रस्त छोड़ दिया गया, दूसरी ओर विकास प्राधिकरण बगैर जवाबदेही वाली संस्था बन गए। फिर अनियमित अवैध निर्माणों पर कोई सवाल पूछने वाला भी न रहा। विरोधाभास का दूसरा उदाहरण यह कि नगरों में संपत्तियों के क्रय-विक्रय से प्राप्त होने वाले स्टैम्प शुल्क का मात्र डेढ़ प्रतिशत हिस्सा ही नगरों को प्राप्त होता है। अब संपत्ति नगर की, विक्रेता-क्रेता नगर के, और नगर की आय मात्र डेढ़ प्रतिशत? यह मजाक नहीं, तो और क्या है?


एक अन्य मुद्दा, शांति व्यवस्था या लॉ ऐंड ऑर्डर हमारे प्रदेशों की भीषण समस्या है। गृह विभाग 38 अनुभागों का भारी-भरकम विभाग है। जब मैं गृह विभाग में पहुंचा, तो लंका में विचरण कर रहे हनुमान जी के समान मैं भी बहुत आश्चर्यचकित हुआ। शांति व्यवस्था जो मुख्य दायित्व है, उसका कार्य भांति-भांति के अधिकारियों एवं बहुत से अनुभागों में बंटा हुआ है। मुझे महसूस हुआ कि यदि शांति व्यवस्था से जुड़े समस्त अनुभाग अन्य दायित्वों से मुक्त होकर मात्र इसी एक दायित्व का निर्वहन करते, तो बेहतर होता। गृह विभाग में सचिव, शांति व्यवस्था जैसा कोई पद नहीं है। ऐसे किसी पद के बारे में अभी तक सोचा भी नहीं गया है। विभागीय पुनर्गठन के मेरे प्रस्ताव पर यह सहमति बनी कि समस्त अधिकारियों की बैठक बुलाकर पहले इस पर चर्चा की जाए। ‘मक्षिका स्थाने मक्षिका‘ की नीति पर संचालित विभाग प्रायः किसी भी परिवर्तन के घोर विरोधी होते हैं। पर दूसरे दिन प्रमुख सचिव, गृह का स्थानांतरण हो गया। इस तरह बात वहीं खत्म हो गई और मेरा प्रस्ताव मेरे पेनड्राइव में ही रह गया।


हमारे प्रशासन में ऐसा कोई फोरम नहीं है, जहां नए प्रस्तावों, विचारों को रखा जा सके। इसलिए विचारों को अकाल मौत मरते देखा गया है।  विकास प्राधिकरण में तैनाती के दौरान देखा गया कि अवैध निर्माण एक बड़ी समस्या है। नोटिसें जारी होती थीं, अवैध निर्माण चलते भी रहते थे। ऐसे में यह व्यवस्था की गई कि अवैध निर्माण की फोटो सहित नोटिस जारी की जाए। फोटो छपी नोटिसों के जारी होते ही जैसे भूकंप आ गया। उस प्राधिकरण में अक्सर राजनीतिक रसूख वाले नेताओं के पति अथवा पत्नियां, अफसर होते थे। फोटो की नोटिसों से अवैध निर्माणकर्ताओं से ज्यादा परेशान तो विभागीय अधिकारी हो गए, क्योंकि फोटो स्वयं में ही प्रमाण थी कि नोटिस के वक्त क्या निर्माण था और अब बढ़कर कितना हो गया है। शोर यहां तक मचा कि हम लोग लखनऊ बुलाकर फटकारे गए। फोटो नोटिस का सिलसिला बंद हुआ, तो जैसे सबकी जान में जान आई।


हमारे विभाग प्रायः उन दायित्वों के विपरीत कार्य करते हैं, जिनके लिए वे बने हैं। प्रत्येक स्तर पर नियमित समीक्षाएं जरूरी हैं, जिससे यह पता चल सके कि क्या विभाग अपने दायित्वों की पूर्ति कर पा रहा है। बाजार में बिकती बच्चों की पंजीरी और पंजीरी खाकर मोटी हुई प्रधान की बछिया तो अब लोकगीतों में भी आ चुकी हैं। खनन, खाद्यान्न घोटाले विभागीय दुरभिसंधि के ही तो उदाहरण हैं। अगर ग्राम पंचायत अधिकारी का बेटा या पत्नी पंचायत अध्यक्ष हो जाए, तो राजनीति और स्थानीय प्रशासन के इस गठजोड़ से कैसे निपटा जाएगा? इस तरह के बहुत से प्रश्न सामने आते हैं। कर्मचारी हित और जनहित प्रायः हमें विपरीत ध्रुवों पर खड़े मिलते हैं। लक्ष्यों का निर्धारण एवं उनका संधान एक गंभीर विषय है। इसलिए प्रशासनिक बेहतरी के रास्ते लगातार खोजना आवश्यक है। यह भी जरूरी है कि एक ऐसा फोरम हो, जहां व्यवस्थाओं में आ रही अस्वाभाविकताओं को संबोधित करने के साथ-साथ नए विचारों के स्वागत की राह हमवार की जाए।


-लेखक भारतीय प्रशासनिक सेवा के सदस्य हैं।
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