हर पुस्तक अपने ही जीवन से एक चोरी की घटना है। जितना अधिक पढ़ोगे, उतनी ही कम होगी स्वयं जीने की इच्छा और सामर्थ्य। जो बहुत पढ़ चुका है, वह सुखी नहीं रह सकता, क्योंकि सुख हमेशा चेतना से बाहर रहता है, सुख काल अज्ञानता है। सपने देखना और लिखना तब संभव नहीं होता, जब ऐसा करने की इच्छा न हो, बल्कि तब संभव होता है जब (कुछ) लिखे जाने की चाह हो, और सपना देखने की...।
लेखक के जीवन में मुख्य चीज है लिखना...तुम्हारे भीतर जो चीज छिपी और दबी हुई है और कविताओं में खुली तौर पर प्रकट हुई है, वही तुम्हारी कविता का 'मैं' है, सपने का 'मैं' है। दूसरे शब्दों में, कविता का 'मैं' उन शक्तियों के प्रति कवि-मन का समर्पण है...। समकालीनता का मतलब पूरे का पूरा अपना समय नहीं होता, और इसी तरह पूरे की पूरी समकालीनता उसके अनेक रूपों में से केवल एक रूप नहीं होती।
गोएथे का युग साथ-साथ नेपोलियन का भी युग है और बेथोविन का भी। श्रेष्ठ की समग्रता ही समकालीनता है। मेरे लिए जीवित या मृत, हर कवि मेरे जीवन का सक्रिय पात्र है। मैं जीवन और पुस्तक, सूर्यास्त और उसके चित्र में कोई फर्क नहीं करती।
जो कुछ मुझे पसंद है, पूरे मन से है। जीवन जैसा है, वह मुझे पसंद नहीं। मेरे लिए वह कुछ अर्थ रखना तभी शुरू होता है, जब वह रूपांतरित होकर कला में व्यक्त होता है। यदि मुझे कोई समुद्र तट पर ले जाए या स्वर्ग में ले जाए और लिखने की मनाही करे, तो मैं समुद्र और स्वर्ग, दोनों को अस्वीकार कर दूंगी।
मेरे जीवन का उत्सव कविताएं हैं। मुझे ईश्वर और मृत्यु के बाद के जीवन पर विश्वास नहीं। यही कारण है निराशा, बुढ़ापे और मृत्यु के भय का। मैं पूजा-पाठ करने में बिल्कुल असमर्थ हूं। जीवन के प्रति पागलपन की हद तक प्रेम है और साथ में है जीने की उत्कट इच्छा।
(रूस की महत्वपूर्ण कवयित्री)