कविता, उस आदमी को जिसने उसे लिखा है, एक बेहतर इंसान बनाती है। और नहीं बनाती है, तो वह कविता नहीं है। कविता क्या, कोई भी रचना नहीं है। हर रचना उसे हमेशा एक बेहतर व्यक्ति बनाती है, जिसने उसको किया है। क्योंकि पहले तो वह इन शर्तों का अनजाने पालन करता है कि उसके मन में द्वेष नहीं है। क्रोध हो सकता है, एक तरह की छटपटाहट हो सकती है, मजबूरी हो सकती है, लेकिन हताशा नहीं है और अन्याय भी नहीं है।
दूसरे कदम पर वह एक बेहतर इंसान इसीलिए बनता है कि हर रचना अपने व्यक्तित्व को बिखरने से बचाने का प्रयत्न है। अगर इंसान और इंसान के बीच एक गैरबराबरी का रिश्ता है और उस रिश्ते को कोई आदमी मानता है कि ऐसे ही रहना चाहिए, तो वह कोई रचना नहीं कर सकता। वह एक भी कविता नहीं लिख सकता-ऐसी जिसको पढ़ कर मैं खुश होऊं कि यह कविता है।
इसके उलट अगर आप यह मानें कि जो आदमी इस गैरबराबरी को हटाना चाहता है, तो मैं समझता हूं कि वह रचना करने में समर्थ और योग्य बना रहता है। बार-बार ऐसा वक्त आता है कि कवि को जीने का उद्देश्य समझ में नहीं आ रहा होता है। उसी वक्त कविता की जरूरत कवि को होती है। कविता उसे जीने का उद्देश्य बता नहीं देती। वह स्वयं उद्देश्य बन जाती है।
कह सकते हैं कि वह जीवन का उद्देश्य नहीं बनती, खुद एक जीवन बन जाती है, जिसका उदेश्य वह स्वयं होती है। 'कविता खुद एक जीवन बन जाती है' के क्या माने? इस जीवन में जो भी है-रहस्य, बोध, जिज्ञासा, राग, विरक्ति, भय और साहस-वह सब कविता में एक दर्जा फर्क हो जाता है-उसमें से ममत्व छूट जाता है। कविता नामक जीवन में मृत्यु नहीं होती, मृत्यु तो ममत्व का ही दूसरा नाम है।
(दिवंगत हिंदी कवि)