प्रदूषण की इन निरन्तर जटिल हो रही समस्याओं के मूल में प्रकृति के प्रति मानव-व्यवहार और उसकी विभिन्न गतिविधियां ही जिम्मेदार हैं।
- फोटो : amar ujala
प्रकृति का नुकसान
प्रदूषण की इन निरन्तर जटिल हो रही समस्याओं के मूल में प्रकृति के प्रति मानव-व्यवहार और उसकी विभिन्न गतिविधियां ही जिम्मेदार हैं। प्रकृति के प्रति हमारा व्यवहार कैसा होना चाहिए? सभ्यता काल से ही हमारे वैदिक ऋषि हमें आगाह करते आ रहे हैं। हमारे दार्शनिक चिंतन के केंद्र में भी मनुष्य ही रहा है। वेद व्यास जी ने महाभारत के शांतिपर्व में हमें बताया है कि-
गुह्यं ब्रम्ह तदिदं ब्रवीमि
नहि मनुष्यात् श्रेष्ठतरं हि किंचित्
महर्षि वेदव्यास कहते हैं कि, यह रहस्य ज्ञान तुमको बताता हूं, मनुष्य से श्रेष्ठ अन्य कुछ भी नहीं है। लेकिन प्रकृति की सम्पूर्ण अनमोल धरोहर केवल मनुष्यों के सुख-सुबिधायें भोगने के लिए नहीं हैं। ऐसा ही ग्रीक दार्शनिक प्लेटो मानते है।
पृथ्वी जगत, भूजगत वनस्पति जगत और अंतरिक्ष जगत में शान्ति की प्रार्थना हमारे वैदिक ऋषियों ने इस लिए किया है ताकि इनमें साम्य बना रहे। इनमें किसी भी तरह की विषम स्थिति वायुमंडल में प्रदूषण का कारण हो सकती हैं। हमारे वैदिक ऋषियों ने कहा हैं-
घौ शान्ति अंतरिक्ष शांति: पृथ्वी शांतिराप:शांतिरोषधः शांति: वनस्पतयः शान्ति:शांति:शांतिरेव शांति: सामा शांतिरेधि।।
यजुर्वेद में हमने आदर के साथ- वनानां पतये नम:। वृक्षराणां पतये नम:।औषधीनां पतये नम:।। कहा है, इसका एक मतलब यह भी है कि, हमारे लिए नदियां-वनस्पतियां, हमारी पर्वत श्रृंखलाएं महज मिट्टी, पत्थर, नदियां जल की धारा और वनों के पेड़ निर्जीव काठ नहीं, पूज्य देवता हैं।
पृथ्वी को जहां अथर्ववेद में "माता भूमि: पुत्रोsहं पृथिव्या:" कहा है, वहीं भारत के उत्तर दिशा में स्थित पर्वतराज हिमालय को देवता तुल्य बताया गया है।
अस्त्युत्तरस्यां दिशि देवतात्मा,
हिमालयो नाम नागधिराज:।
पूर्वापरौ तोषनिधी वगाहय
स्थित: पृथिव्या इव मानदण्ड:।।
(कालिदास, कुमार सम्भव से)
अर्थात् उतर दिशा में हिमालय नाम का जो पर्वतराज है वह देवात्मा है, देवस्वरूप है। वह पूर्व और पश्चिम के समुद्रों के बीच में पृथ्वी के मानदण्ड की तरह व्याप्त है। हमारे ऋषियों ने तीर्थों का महात्म्य कल्पित कर उसे मोक्ष धाम बताया।
प्रकृति की पूजा का चलन
हमारी माताएं अखण्ड सौभाग्यवती होने के लिए बटवृक्ष की पूजा करती है। हमारे भविष्यदर्शी ऋषियों ने हमारे आसपास व्याप्त परिवेश को देवत्व प्रदान किया, जो नदी-पर्वत-वन-अंतरिक्ष और भूलोक के रूप में हमें आच्छादित किए हुए है।
ईशावास्योपनिषद के एक श्लोक में कहा गया है-
ईशावास्यमिदं सर्वं यत्किंच् , जगत्यां जगत् ।
तेन त्यक्तेन भुंजीथा मा गृद्व: कस्वसिद्वनम् ।।
अर्थात् इस जगत् के कण-कण में ईश्वर का वास है। इसलिए इसके प्रत्येक पदार्थ का त्याग पूर्वक उपभोग करना चाहिए। भोग के लिए लालच की दृष्टि से इन प्राकृतिक पदार्थों का उपभोग नहीं करना चाहिए। प्रकृति और पर्यावरण के प्रति हमारी यहीं सीख महात्मा गांधी को यह मानने के लिए विवश करती है कि, अगर सृष्टि के विनाश के बाद भी महज यही एक श्लोक बचा रहे तो भारत के लोग नई सभ्यता का निर्माण कर सकते हैं।
आज जलवायु परिवर्तन, पर्यावरण असंतुलन की मुख्य वजह यह है कि मनुष्य की जरूरत और लालच के बीच का फर्क मिट गया है। यही हमारी तमाम पर्यावर्णीय समस्याओं का मूल कारण है। प्रकृति के प्रति हमारी जिम्मेदारी को समझने-समझाने के लिए सन् 1972 से हम 5 जून को विश्व पर्यावरण दिवस मानते आ रहे हैं। इस अवसर पर हमें अपने ऋषयों को भी नमन करना चाहिए, जिन्होंने इन विकट परिस्थितियों के प्रति हमें सचेत किया है-
इदं नमः ऋषिभ्य: पूर्वजेभ्य: पूर्वेभ्य: पथिकद्भ्य:।
। ।ऋग्वेद 10.14.15 ।।
पूर्व के अपने उन ऋषयों को प्रणाम, जिन्होंने ज्ञान के अरण्य में पगडंडियों का निर्माण किया, ताकि हम अपने पथ से कभी विचलित न हों।
डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।