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पश्चिम बंगाल: चुनाव बाद की हिंसा पर क्यों मुश्किल में है ममता सरकार?

सार

हाईकोर्ट ने बीते सप्ताह ममता सरकार से कहा था कि राज्य ने चुनाव के बाद की हिंसा से संबंधित शिकायतों के समाधान के लिए कोई ठोस कदम नहीं उठाया है।

हाईकोर्ट ने कहा था कि हिंसा के ऐसे मामलों में सरकार को अपनी मर्जी के मुताबिक काम करने की अनुमति नहीं दी जा सकती है। इन शिकायतों पर तत्काल कार्रवाई की जरूरत है।
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कलकत्ता हाईकोर्ट ने बीते 18 जून के अपने फैसले में ममता सरकार को फटकार लगाई थी। - फोटो : ANI
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विस्तार
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पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी सरकार चुनाव बाद की हिंसा पर घिरती जा रही है। पहले तो राज्यपाल जगदीप धनखड़ और बीजेपी ही इस मुद्दे पर उसके खिलाफ हमलावर मूड में थी। लेकिन अब कलकत्ता हाईकोर्ट ने भी उसे करारा झटका दिया है। इस बीच, राज्यपाल ने कहा है कि आजादी के बाद देश में ऐसी अशांति देखने को नहीं मिली थी। बीजेपी ने हिंसा के खिलाफ राज्यव्यापी आंदोलन छेड़ने का फैसला किया है।

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कलकत्ता हाईकोर्ट ने क्या कहा? 
कलकत्ता हाईकोर्ट ने बीते 18 जून के अपने फैसले में हिंसा के मामलों की जांच आयोग से कराने का निर्देश देते हुए सरकार को इसमें सहयोग करने को कहा था। इसके लिए आयोग से एक तीन-सदस्यीय समिति बनाने को कहा गया था जिसमें राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग, पश्चिम बंगाल मानवाधिकार आयोग और राज्य कानूनी सेवा प्राधिकरण के एक-एक सदस्य शामिल होंगे।

यह समिति राज्य के हिंसा प्रभावित इलाकों का दौरा कर 30 जून को हाईकोर्ट को अपनी रिपोर्ट सौंपेगी। हाईकोर्ट ने चुनाव के बाद होने वाली हिंसा के मामले में दायर जनहित याचिकाओं पर सुनवाई के बाद उक्त निर्देश दिया था।
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अदालत के निर्देश पर राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने हिंसा के मामलों की जांच के लिए एक सात-सदस्यीय समिति का गठन किया है।इसकी अध्यक्षता मानवाधिकार आयोग के सदस्य राजीव जैन करेंगे। समिति के सदस्यों में राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग के उपाध्यक्ष आतिफ रशीद, राष्ट्रीय महिला आयोग की सदस्य राजूलबेन एल। देसाई, आयोग के महानिदेशक (जांच) संतोष मेहरा, पश्चिम बंगाल राज्य मानवाधिकार आयोग के रजिस्ट्रार प्रदीप कुमार पांजा, पश्चिम बंगाल राज्य कानूनी सेवा प्राधिकरण के सदस्य सचिव राजू मुखर्जी और मंजिल सैनी शामिल होंगे।

राज्य सरकार ने अदालत के 18 जून के फैसले के खिलाफ पुनर्विचार याचिका भी दायर की थी। लेकिन  उसे खारिज करते हुए अदालत ने एक बार फिर सरकार की आलोचना की है। कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश राजेश बिंदल ने साफ कहा कि अदालत को इस मामले में सरकार पर भरोसा नहीं है। उन्होंने सवाल किया कि आखिर राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग की जांच पर सरकार को आपत्ति क्यों है?

पांच जजों की वृहत्तर पीठ ने कहा था कि पहले तो राज्य सरकार हिंसा के आरोपों को स्वीकार नहीं कर रही। लेकिन अदालत के पास ऐसी कई घटनाओं के सबूत हैं। इस तरह के आरोपों को लेकर राज्य सरकार चुप नहीं रह सकती। राज्य सरकार ने इसी फैसले के खिलाफ याचिका दायर की थी। लेकिन अदालत ने सोमवार को उसे खारिज कर दिया। इस मामले की अगली सुनवाई 30 जून को होगी।

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मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि चुनाव नतीजे के डेढ़ महीने बाद भी हिंसा की खबरें आ रही हैं। - फोटो : Amar Ujala
ममता सरकार और अदालत 
अदालत ने कहा कि राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के पास 541 शिकायतें दर्ज हुई है, जबकि राज्य मानवाधिकार आयोग के पास एक भी शिकायत दर्ज नहीं हुई है। चुनाव के बाद भी हिंसा जारी रहना चिंताजनक है। मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि चुनाव नतीजे के डेढ़ महीने बाद भी हिंसा की खबरें आ रही हैं। पुलिस के खिलाफ ऐसे मामले दर्ज नहीं करने के आरोप लग रहे हैं। जो मामले दर्ज हुए हैं उनकी भी ठीक से जांच नहीं हो रही है। लेकिन सरकार ने इस मामले में चुप्पी साध रखी है।

हाईकोर्ट ने बीते सप्ताह कहा था कि राज्य ने चुनाव के बाद की हिंसा से संबंधित शिकायतों के समाधान के लिए कोई ठोस कदम नहीं उठाया है। हाईकोर्ट ने कहा था कि हिंसा के ऐसे मामलों में सरकार को अपनी मर्जी के मुताबिक काम करने की अनुमति नहीं दी जा सकती है। इन शिकायतों पर तत्काल कार्रवाई की जरूरत है।

कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश राजेश बिंदल की अध्यक्षता वाली पांच न्यायाधीशों की पीठ ने पश्चिम बंगाल सरकार को याद दिलाया था कि राज्य में कानून-व्यवस्था की स्थिति बनाए रखना और लोगों में विश्वास पैदा करना उनका कर्तव्य है। उस पीठ में न्यायमूर्ति आईपी मुखर्जी, हरीश टंडन, सौमेन सेन और सुब्रत तालुकदार भी शामिल हैं। 

इससे पहले बीते सप्ताह राज्यपाल जगदीप धनखड़ ने मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को पत्र लिखकर आरोप लगाया था कि राज्य सरकार चुनाव के बाद की हिंसा के कारण लोगों की पीड़ा के प्रति निष्क्रिय और उदासीन बनी हुई है। इस बीच, सोमवार को सात दिनों के उत्तर बंगाल दौरे पर पहुंचे राज्यपाल ने कहा है कि चुनाव के बाद ही राज्य के विभिन्न हिस्सों में बड़े पैमाने पर हिंसा जारी है। उन्होंने इसे लोकतंत्र पर हमला करार देते हुए कहा कि अनुसूचित जाति/जनजाति और आदिवासी भी इसका शिकार हो रहे हैं। लेकिन बावजूद इसके सरकार ने इस पर अंकुश लगाने के लिए कोई कदम नहीं उठाया है।

राज्यपाल ने हाल में हिंसा के मुद्दे पर दिल्ली में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के अलावा कई अन्य नेताओं से भी मुलाकात कर अपनी रिपोर्ट सौंपी थी।

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।
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