बहुत से लोग समाज में नेताओं के सामाजिक दबदबे के लिए सियासत में एंट्री लेते हैं।
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क्या राजनीति वाकई करियर है?
पहले राजनीति को कॅरियर मानने की बात। इस संदर्भ में पहला सवाल तो यह कि कोई व्यक्ति राजनीति में क्यों आता है? कौन सा दबाव या अंत:प्रेरणा उसे ऐसा करने पर विवश करती है? क्योंकि राजनीति में प्रवेश या राजनीति करना आजीविका के लिए किए जाने वाले किसी भी उपक्रम से अलग और स्वैच्छिक है। इसका पहला उत्तर तो सत्ता और सामाजिक प्रतिष्ठा की चाह है।
दूसरा कुछ अंश समाज सेवा का भी हो सकता है। लेकिन तीसरा और सबसे अहम मुद्दा किसी राजनीतिक दल की विचारधारा से उसका किसी न किसी रूप में सहमत होना या उसकी तरफ स्वाभाविक झुकाव होता है। वरना वो राजनीतिक दल से सम्बद्ध होने के बजाए अ- राजनीतिक या आध्यात्मिक रहकर भी समाज सेवा कर सकता है।
किसी विशिष्ट राजनीतिक विचार के प्रति यह झुकाव या उसे आत्मसात करने के पीछे सम-सामयिक राजनीतिक- सामाजिक परिस्थिति, अंतर्द्वंद्व, पारिवारिक संस्कार या फिर वर्तमान के प्रति आक्रोश के कारण भी हो सकता है। वह इसे कुछ सीमा तक बदलना या फिर उसका अपने हित में दोहन करना चाहता है।
बहुत से लोग समाज में नेताओं के सामाजिक दबदबे और उनके हमेशा चंपुओं से घिरे रहने को ही असली जलवा मानकर स्वयं भी उसी स्थिति को प्राप्त करने की आकांक्षा से राजनीति में आते हैं। लेकिन किसी विचार को जीवित रखने, उसे आगे बढ़ाने, उसकी रक्षा के लिए जी-जान लगाने, सब कुछ लुटाने का भाव रखने वाले उंगली पर गिनने लायक ही होते हैं।
और मलाई खाने के वक्त ऐसे चेहरों को अक्सर पीछे धकेल दिया जाता है। बल्कि आजकल तो इसे राजनीतिक पिछड़ापन ही माना जाता है। लुब्बोलुआब यह कि राजनीति में जाना भी मूलत: वैचारिक प्रतिबद्धता के कारण ही होता है न कि केवल किसी तरह सत्ता हासिल करने के मकसद से। स्वतंत्रता आंदोलन भी इसी भाव से प्रेरित हस्तियों ने खड़ा किया, चलाया और अंतत: सफलता प्राप्त की। वैचारिक मतभेद तब भी होते थे, लेकिन अंतरात्मा की सरेआम नीलामी नहीं होती थी, जैसे कि आज होती है।
राजनीति का अपराधीकरण भी तेजी से हुआ है।
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आजकल एक तर्क बहुत दिया जाता है कि राजनीति भी अंतत: एक प्रोफेशन ( व्यवसाय) है। इसकी अपनी नैतिकता और मूल्य हैं, जो ‘प्रोफेशनल प्रोग्रेस’ की आकांक्षा से जन्मते और व्यवह्रत होते हैं। इसमें वैचारिक निष्ठा का क्रम बहुत नीचे होता है, जैसे कि बायोडाटा में यह बहुत संक्षेप में दिया जाता है कि आपने कहां-कहां नौकरी की।
महत्वपूर्ण होता है कि आप का अगला ‘जम्प’ कितना और कैसा है? इसी कड़ी में राजनीति को खानदानी पेशा बताने की वकालत यह कहकर की जाती है कि जब इंजीनियर का बेटा इंजीनियर, वकील का बेटा वकील और कलाकार का बेटा कलाकार हो सकता है तो राजनेता का बेटा राजनेता बने तो गलत क्या है?
भारत में पेशा और सियासत
दरअसल, यह अर्द्धसत्य है, इसलिए क्योंकि बहुत कम लोग हैं जो पारंपरिक पेशे को ही आगे बढ़ाना चाहते हैं। और उसे अपनाते भी हैं, तो वह मूलत: आजीविका के लिए तथा स्थापित व्यवसाय को आगे बढ़ाने के लिए होता है। इसमें समाज या व्यवस्थाल परिवर्तन का कोई आग्रह नहीं होता। वह शुद्ध रूप से कारोबार होता है। आर्थिक नफा- नुकसान और गादी चलाते रहना ही उसका पैमाना होता है। लेकिन राजनीतिक विचारधाराएं किसी कारोबार को चलाने या बढ़ाने के लिए नहीं जन्मतीं। वह समूची व्यवस्था और समाज को बदलने का वैचारिक विकल्प प्रस्तुत करती हैं।
देश उससे कितना सहमत होता है, यह अलग बात है। अगर होता है तो वह उसी विचार को राजनीतिक दल के रूप में प्रमोट करता है। सत्ता सौंपता है। मानकर कि दल या दल के नेता सत्ता को बपौती नहीं समझेंगे बल्कि व्यवस्था संचालन या बदलाव के लिए मिला संवैधानिक दायित्व समझेंगे। अर्थात् किसी भी नेता को अपनी वैचारिक निष्ठा को केवल ‘लिव इन रिलेशनशिप’ नहीं मानना चाहिए। लेकिन आज जो हो रहा है वह वैचारिक निष्ठा की निर्लज्ज नीलामी जैसा है।
दलों की सियासत और नेता
इस दौर में नेता रहता एक दल में है और मनमाफिक महत्व न मिलने पर दूसरे में जाने के लिए भीतर से तार जोड़े रखता है, जिस दल में रहते हुए वह ‘दिन को दिन’ कहता था, दूसरे दल में जाते ही वह उसी दिन को ‘रात’ कहने में नहीं हिचकता। उसी प्रकार पार्टी की निगाह में भी जो नेता कल तक बहुत ‘महत्वपूर्ण’ था, पार्टी छोड़ते ही सबसे ‘नालायक’ बन जाता है। सबसे हैरानी की बात तो यह होती है कि वह ‘निष्ठावान’ होने के कारण ही पार्टी छोड़ने पर ‘विवश’ होता है और ‘निष्ठावान’ होने के कारण ही दूसरी पार्टी में जाता है।
यहां निष्ठा ‘गांव की भौजाई’ की माफिक होती है। जब चाहे जिसके साथ हो ली, क्योंकि नेता को चाह भौतिक सुख-साधनों और सत्ता की है और उसके लिए यही राजनीति है और किसी प्रकार से सत्ता के काफिले में शामिल हो जाना ही ‘राजनीतिक मोक्ष’ है।
जाहिर है कि यह शुद्ध राजनीतिक कॅरियर वाद है, जिसका लक्ष्य केवल आत्म या अपनो का कल्याण है। जबकि वैचारिक लड़ाई में विचार की विजय और उसकी सामाजिक-राजनीतिक प्रतिष्ठापना राजनेता का अंतिम लक्ष्य होती हैं। क्रांतियां इसी अडिग प्रतिबद्धता से जन्म लेती हैं। लेकिन कॅरियरवादी राजनेता कोई क्रांति नहीं करते न कर सकते हैं, सिवाय अपने ही उसूलों की भ्रूण हत्या के। चलती गाड़ी में सवारी की यह मानसिकता किसी भी देश के नैतिक, सामाजिक और राजनीतिक पतन का स्पष्ट संकेत है।
वंशवाद इस पतन की गति और तेज करता है बजाए उसे थामने के। या फिर वह यथास्थिति को बनाए रखने के लिए पूरी ताकत लगा देता है। किसी राजनेता की वैचारिकता के बिकने का सीधा अर्थ उसकी आत्मा के बिकने जैसा है। और आत्माविहीन कोई कॅरियर भी वैध कैसे हो सकता है? जरा सोचें !
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