सिलक्यारा सुंरग में फंसे मजदूर बाहर निकले
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सिलक्यारा टनल रेक्स्यू ऑपरेशन की कहानी भी पल- पल उभरती नई चुनौतियों और उनसे जूझने के अथक परिश्रम की रोमांचक कहानी है। टनल में फंसे मजदूरों ने वो टनल के अंधेरे में वो 17 दिन और रातें किस तरह काटी होंगी, इसका खुलासा तो कुछ दिन बाद ही होगा। लेकिन जो हुआ होगा, उसकी कल्पना भी सिहरा देने वाली है।
न खाने का पूरा इंतजाम, न सोने की जगह और न नित्य कर्म की कोई सुविधा। ऐसे में आशा और निराशा की लहरों के बीच 17 दिन गुजारना और वो भी बगैर अवसाद का शिकार हुए, अपने आप में बहुत बड़ी और प्रेरक बात है। हालांकि, उन मजदूरों तक खाना, पानी और ऑक्सीजन पहुंचाने के इंतजाम संभव हो सके थे। उनसे टेलीफोन के जरिए बातचीत भी हो रही थी। लेकिन इस बात की गारंटी देने की स्थिति में कोई नहीं था कि टनल में फंसे मजदूर नई सुबह कब देख सकेंगे।
फिर भी अपनों से संपर्क ने उम्मीद की किरण कायम रखी। टनल में फंसे ये मजदूर जब बाहर आए तब भी उनके चेहरे राहत का भाव स्पष्ट था, लेकिन व्यवहार में कहीं कोई असामान्यता नहीं थी। बेशक उत्तरकाशी का यह टनल बचाव अभियान भारत का सबसे लंबा और सफल बचाव अभियान था।
इसमें भी एनडीआरएफ, भारतीय सेना, उत्तराखंड सरकार की सभी एजेंसियां और अंतरराष्ट्रीय टनल एक्सपर्ट रात दिन लगे थे। समय लग रहा था, लेकिन प्रयासों और इच्छाशक्ति में कहीं कोई कमी नहीं थी। वैसे भी प्रकृति से लड़ना मनुष्य के लिए सबसे कठिन है। इस बचाव अभियान में भी कई प्लान बने। कई नाकामयाब हुए तो कुछ कामयाब भी हुए। जीवन बचाने की दौड़ में मशीनें ज्यादा साथ नहीं दे पाईं।
अंतत: मनुष्य की ताकत और इच्छाशक्ति पर भरोसा किया गया। वही काम भी आया। इस अभियान में देवदूत बने रैट होल माइनर मजदूरों का यह कहना बहुत मायने रखता है कि हमारे सामने बस एक लक्ष्य था, अपने मजदूर भाइयों को बचाना है। वो हमने कर दिखाया। यह बात अलग है कि दुर्गम पहाड़ों और धरती की गहराइयों को अपनी खुदाई के हुनर से नापने वालों की तुलना अंग्रेजी में चूहों से की जाती है।
असल में इन मजदूरों के हाथ मृत्यु की चट्टानों को जीवन की छेनी से भेदने वाले हाथ हैं, जो खुद मौत के खतरों को अपने कंधों पर थामे चलते हैं। इनकी मेहनत रंग लाई और आखिरकार मलबे में उस पार फंसे मजदूरों तक फिर से जीवन रेखा खिंच गई। हालांकि, रेट होल माइनिंग में होने वाले हादसों के मद्देनजर हाई कोर्ट ने पांच साल से इस पर रोक लगा रखी है, लेकिन यह प्रतिबंधित तकनीक ही आड़े वक्त पर संजीवनी साबित हुई।
मंगलवार की शाम 7 बजकर 5 मिनट पर टनल में कैद जिंदगियों तक रिहाई की रोशनी पहुंची और दो ढाई घंटों में सभी को मौत के कुएं से बाहर खींच लिया गया। 41 मजदूरों को बचाने में प्रयत्नों की पराकाष्ठा में असफलता के खतरे भी छिपे हुए थे। लेकिन प्रधानमंत्री से लेकर स्थानीय स्तर पर समूचे बचाव अभियान की निरंतर मॉनिटरिंग और आपसी समन्वय ने इस महाभियान को सफलता की मंजिल तक पहुंचाया।
आस्था के पुट ने इस महा बचाव अभियान को अपने ढंग से ताकत दी। कुछ लोग इसे अंधविश्वास अथवा महज संयोग भी मान सकते हैं, लेकिन सुरंग के मुहाने पर बने स्थानीय देवता बाबा बौखनाग की प्रतिमा के आगे टनल विशेषज्ञ और इंटरनेशनल टनलिंग एंड अंडरग्राउंड स्पेस एसोसिएशन (आइटीयूएसए) के प्रेजिडेंट अर्नाल्ड डिक्स यूं रोज सिर नहीं नवाते, लेकिन इस समूचे हादसे ने जीवन रेखा को अधोरेखित करने के साथ सवालों और चेतावनियों की लाल रेखाएं भी हाई लाइट कर दी हैं।
पहला तो यह अपेक्षाकृत कच्ची चट्टानों से बने हिमालय से साथ विकास के नाम पर मानवीय छेड़छाड़ कितनी घातक है। और दूसरा यह कि क्या ऐसे संभावित हादसों का पूर्वानुमान लगाते हुए एहतियाती उपाय नहीं किए जाने चाहिए? पर्यावरणविदों का कहना है कि यह हादसा हम सभी के लिए सीखने का एक मौका है।
रोमन दार्शनिक ल्युसियस एनायस सेनेका का वाक्य है दुनिया में सबसे बहादुर दृष्टि किसी महान व्यक्ति को आपदा से लड़ते हुए देखना है। इसी तरह कन्हैयालाल नंदन की कविता की पंक्ति है- जीवन के साथ थोड़ा-बहुत मृत्यु भी मरती है। इसीलिये मृत्यु जिजीविषा से बहुत डरती है।
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