क्या इतनी विविधताओं वाले भारत देश में समान नागरिक संहिता व्यवहारिक है?
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रायशुमारी एक औपचारिकता
गौर करने वाली बात यह है कि 22 वां विधि आयोग समान नागरिक संहिता को लेकर जो सार्वजनिक रायशुमारी कर रहा है उसकी सीख आयोग को उत्तराखण्ड की समान नागरिक संहिता ड्राफ्ट कमेटी ने दी है। कमेटी की अध्यक्षा जस्टिस रंजना देसाई ने केन्द्रीय आयोग से मिलने के बाद दावा किया था कि समान नागरिक संहिता के पक्ष में उत्तराखण्ड का भारी बहुमत है और बहुत थोड़े लोगों ने इसका विरोध किया है।
उत्तराखण्ड में 85 प्रतिशत जनसंख्या हिन्दुओं की है जिसे समान नागरिक संहिता से कोई परेशानी इसलिए नहीं है कि उनके लिए 1955 और 56 में ही नागरिक संहिताएं बन चुकी हैं। वैसे भी कमेटी ने न्याविदों, कानूनविदों और बुद्धिजीवियों के बजाय आम जनता और खास कर एक राजनीतिक तथा धार्मिक विचारधारा के लोगों की राय एकत्र की थी।
राय देने वाले अधिसंख्य लोग किसी अन्य समुदाय के लिए व्यक्तिगत मामलों में विशेषाधिकार क्यों चाहेंगे? ऐसी ही रायशुमारी राष्ट्रीय स्तर पर भी होनी है और समान नागरिक संहिता के पक्ष में उत्तराखण्ड की तरह राष्ट्रीय स्तर पर भी हिन्दुओं का भारी बहुमत आना लाजिमी है। विधि आयोग के कानों में यह मंत्र उत्तराखण्ड की कमेटी फूंक गई थी।
जनजातियों में कैसे लागू होगा कानून?
इधर, सवाल यह उठता है कि क्या इतनी विविधताओं वाले भारत देश में समान नागरिक संहिता व्यवहारिक है? अगर व्यवहारिक होती तो संविधान सभा इस मुद्दे को नीति-निर्देशक तत्वों में नहीं डालती? अगर इतना आसान होता तो धारा 370 के सफाए से पहले ही देश में यह कानून आ जाता।
दरअसल, जब धारा 370 हटाई गई तो कहा गया था कि एक देश में एक जैसा ही कानून और प्रशासन होना चाहिए इसलिए अलग धारा हटा दी गई, लेकिन अनुच्छेद 371 की कई उपधाराएं आज भी मौजूद हैं और पूछ रही हैं कि एक देश एक कानून कहां है? अगर एक देश एक कानून व्यवहारिक है तो फिर नवीन पंचायती राज के लिए संविधान का 73वां और 74वां संशोधन पूर्वोत्तर राज्यों में लागू क्यों नहीं है?
संविधान के अनुच्छेद 25 से लेकर 28 तक भारत के नागरिकों को न केवल धार्मिक स्वतंतत्रता की अपितु, धार्मिक रीति-रिवाजों की स्वतंत्रता की गारंटी भी देते हैं।
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आसान नहीं एक देश एक कानून
संविधान के अनुच्छेद 25 से लेकर 28 तक भारत के नागरिकों को न केवल धार्मिक स्वतंतत्रता की अपितु, धार्मिक रीति-रिवाजों की स्वतंत्रता की गारंटी भी देते हैं। वैयक्तिक कानून भी धार्मिक रीति-रिवाजों में ही आते हैं। संविधान देश की 7 सौ से अधिक जनजातियों के प्रथागत् कानूनों को मान्यता देने के साथ ही उनके रीति-रिवाजों को मानने की गारंटी भी देता है, इसलिए अनुसूची-6 के क्षेत्रों में स्वायत्तशासी जिलों में उन जनजातीय परम्परागत पंचायतों को मान्यता दी गई है जिन्हें थोड़े न्यायिक अधिकार भी प्राप्त हैं, इसलिए वहां संविधान के 73वें और 74वें संशोधन लागू नहीं हो सके। जनजातियों में बहुपति और बहुपत्नी प्रथा अब भी चलती है।
समान नागरिक संहिता कैसे हस्तक्षेप करेगी। जनजातियों को छेड़ने का नतीजा मणिपुर में दिखाई दे रहा है। भारत में पारसियों की जनसंख्या एक लाख से भी बहुत कम है। भारत के चहुमुखी विकास में असाधारण योगदान देने वाले पारसियों की जनसंख्या एक लाख भी नहीं है। बिरादरी से बाहर शादी करने का मतलब वहां जायदाद से हाथ धोना है।
ये सख्त नागरिक कानून इसलिए है ताकि इस मानव वंश का अतित्व बना रह सके। किसी खास वर्ग या समुदाय से जोर-जबरदस्ती करके भले ही वोटों का इजाफा हो जाएगा, लेकिन जनजातियों को छेड़ोगे तो अपना अस्तित्व बचाने के लिए कई बिरसामुंडा खड़े हो सकते हैं।
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