तीन तलाक के कानून का जमीन पर कितना भय है?
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इस स्थिति को सुधारने के लिए महिलाओं के हक में जो कानून बना है उसकी सहायता लेकर महिलाएं शिकायत दर्ज करवाने पहुंच रहीं हैं। पर, इन शिकायतों की जो खबरें कानून बन जाने के बावजूद आ रहीं हैं वह बहुत हैरान और परेशान करने वाली हैं।
एक खबर यह थी कि खाविंद ने इसलिए तलाक दे दिया कि बच्ची बहुत रो रही थी और उसकी बीवी बच्ची को चुप नहीं करवा पा रही थी। इसी पर खाविंद ने तलाक-तलाक कह दिया। एक अन्य केस में बीवी ने शौहर से बच्चे की दवाई के लिए केवल 30 रुपए मांग लिए तो उसे तलाक मिल गया।
एक घर में बीवी ने दाल पका दी थी तो उसे तलाक मिल गया। जब शौहर पैसे ही नहीं देता तो बीवी पकवान कहां से बनाए? वॉट्स ऐप पर तलाक का मैसेज देने की बात तो बहुत कॉमन हो गई है। यूं तो कॉल करके भी तलाक दिए जा रहे हैं। एक दिलचस्प खबर यह है कि शौहर को बीवी के पहने हुए कपड़े या यूं कहें वेशभूषा बहुत दकियानूसी लगी तो उसने तलाक दे दिया।
इससे क्या मतलब निकाला जाए? तलाक के लिए महिलाओं के हित में बनाए गए कानून से पुरुषों की मानसिकता में कोई फर्क नहीं आया या फिर वह इस कानून के बन जाने से चिढ़कर बेतुकी बातों को आधार बनाकर तलाक दे रहे हैं।
दअरसल, जिन अन्य देशों में तलाक के विरुद्ध कानून बने हुए हैं उनके बारे में हमें कोई जानकारी नहीं है कि वहां भी क्या ऐसी मामूली खीझ को लेकर भी तलाक दिए जाते हैं? या कि महिलाओं को वहां न्याय मिलता है? यह तो साफ पुरुष मानसिकता का वह प्रदर्शन है जिसमें वह बेवजह दिखाना चाहता है कि कानून बनाने से क्या होता है और अभी भी वहीं मालिक है और वह जब चाहे औरत को एक वस्तु समझकर एक ओर फेंक सकता है तथा वह भी बच्चों सहित जिनका वह खुद बाप है।
अभी भी जो तलाक देने के किस्से सुनाई दे रहे हैं उनसे यह नतीजा तो नहीं निकाला जाना चाहिए कि कानून बनने से क्या फर्क पड़ेगा। कानून तो बनाया ही जाना चाहिए था। उसकी अपनी हैसियत है शायद धीरे-धीरे इसका प्रभाव व इसके परिणाम सामने आएंगे।
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