कोविड काल में पश्चिमी मीडिया ने रिपोर्ट्स में अतिरंजना पैदा की।
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कोविड का संकट और भारत की तस्वीर
कोविड की दूसरी लहर ने भारत में अप्रत्याशित रूप से व्यापक जनहानि की परिस्थिति निर्मित की इससे इनकार नहीं किया जा सकता है लेकिन इस दूसरी लहर में मानो पश्चिमी मीडिया को भारत के विरुद्ध आपदा में अवसर मिल गया हो।
इस दौरान बीबीसी, न्यूयॉर्क टाइम्स, वॉशिंगटनपोस्ट जैसे संस्थानों ने अस्पतालों, श्मशानों से लेकर गंगा में जलदाह से जुड़ी अतिरंजित, डरावनी और भयादोहित करने वाली रिपोर्ट प्रकाशित की हैं। इन खबरों से यह साबित होता है कि पश्चिमी मीडिया किस हद दर्जे की दुराग्रही, दोहरी एवं औपनिवेशिक मानसिकता की ग्रन्थि से पीड़ित है।
अमेरिका में जब 9/11की आतंकी घटना हुई थी तब न्यूयॉर्क टाइम्स, वॉशिंगटन पोस्ट और बीबीसी ने खून का एक कतरा भी नहीं दिखाने का निर्णय लिया था। तर्क यह दिया गया कि सच्चाई और जवाबदेही मिलकर पत्रकारिता को निष्पक्ष बनाते हैं इसलिए मृतकों के परिजनों के प्रति जबाबदेही और समाज को भयादोहित होने से बचाने के लिए ऐसा किया जा रहा है।
भारत का मामला बनते ही यह जवाबदेही और निष्पक्षता खूंटी पर टांग दी गई। हमारे लोकजीवन में भी अंतिम संस्कार एक बेहद ही संवेदनशील मामला होता है, क्या जिन तस्वीरों को विदेशी अखबारों ने पहले पन्ने पर जलती लाशों या जलदाह के रूप में छापा वह जवाबदेही के आदर्श पर खरी कही जा सकती थी? एक विदेशी फोटो एजेंसी ने तो भारत में अंतिम संस्कार की तस्वीरों को बकायदा 23 हजार की बोली लगाकर बेचा है।
आईआईएमसी शोध में कोविड-19 मार्च 2020 से जून 2021 के मध्य करीब 700 रिपोर्टस गार्डियन,वाशिंगटन,पोस्ट,बीबीसी,अलजजीरा,फॉक्स न्यूज,न्यूयॉर्क टाइम्स,द इकोनोमिस्ट,सीएनएन जैसे संस्थानों में छपी है। यह सभी खबरें भारतीय समाज में भय निर्मित करने वाली, अतिरंजित, अनावश्यक आलोचनाओं एवं मैदानी तथ्यों से परे थी। यानी जिस जवाबदेही और सच्चाई के युग्म की बातें पश्चिमी मीडिया द्वारा अपने देशों में रिपोर्टिंग के लिए कही जातीं हैं वे भारत के मामले में खुद के ऊपर लागू नहीं की गईं।
शरारती मानसिकता के उद्देश्य से दूसरी लहर में संक्रमितों एवं मृतकों के आंकड़े हेडलाइन में सजाए गए। बीबीसी की कुल रिपोर्ट्स में से 98 फीसदी समाज को भयादोहित और उपचार प्रविधियों से लेकर वैक्सीनेशन के प्रति समाज में भ्रम फैलाने वाली रही हैं। संक्रमितों के आंकड़े बड़ी चालाकी से बदनामी के उद्देश्य से पेश किए गए मसलन 7 सितंबर 2020 को बीबीसी ने हैडिंग लगाई "भारत ने ब्राजील को पछाड़ा"।
पश्चिमी मीडिया ने भारत की तस्वीर ऐसे रखी जैसे यहां केवल लाशें जल रही हों।
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डराती हैं ये तुलनाएं
अब ध्यान देने वाली बात यह है कि भारत की आबादी ब्राजील से छह गुना है। यानी हमारी कुल आबादी के तथ्य को दरकिनार कर दहशत फैलाने में बीबीसी जैसे मीडिया हाउस अग्रणी रहे। यूरोप में कुल 48 देश है जहां साढ़े पांच करोड़ लोग कोविड से संक्रमित हुए और अब तक करीब 11 लाख लोगों की मौत हो चुकी है।
इन सभी 48 देशों की आबादी मिलाकर 75 करोड़ है। उत्तरी अमेरिका के 39 मुल्कों को मिला दिया जाए तो इन 87 देशों की सम्मिलित आबादी 134 करोड़ होती है। यानी दुनिया के 87 देशों से अधिक लोग भारत में रहते हैंं, इसके बावजूद संक्रमित और मृतकों की संख्या इन देशों से आज भी हमारे यहां कम हैं।
87 देशों की आबादी को समेटे हुए विविधताओं से भरे भारत में किसी एक कोने की घटना को भी पश्चिमी जगत ने सामान्यीकरण की तरह पेश करने में बेशर्मी की सीमाएं लांघ दीं। गंगा के तटों पर लाशों के फोटो या मुक्तिधामों पर सामूहिक संस्कारों को ऐसे दिखाया गया मानों भारत में लाशों के सिवाय कुछ भी अच्छा नहीं है।
बेशक वह दुःखद और कल्पना से परे कालखंड था, लेकिन यह भी सच है कि अमेरिका, स्पेन, इटली, इंग्लैंड में भी इससे बुरे हालात थे' लेकिन फरवरी 2020 से जुलाई 2021 तक अगर पश्चिमी मीडिया हाउस की कोविड से जुड़ी स्थानीय खबरों को सिलसिलेबार देखा जाए तो पत्रकारिता के एथिक्स के नाम पर दोगला और दोहरापन स्वयंसिद्ध है।
करीब 700 स्टोरीज को गहराई से विश्लेषित किया जाए तो हम पाते है कि विदेशी मीडिया का यह स्थाई दुराग्रह भाव 15 अगस्त को प्रधानमंत्री मोदी के उस एलान के बाद औऱ भी आक्रमक हो गया जिसमें उन्होंने वैक्सीन उत्पादन और वैक्सीनेशन की कार्ययोजना का खाका दुनिया के सामने रखा।
दरअसल, यह कोविड की पहली लहर पर मोदी के परिणामोन्मुखी प्रयासों को वैश्विक अधिमान्यता का दौर भी था। इस आक्रमकता का आधार इसलिए भी बना क्योंकि तब तक यूरोप और उत्तरी अमेरिका के धनीमानी और सर्वोत्कृष्ठ स्वास्थ्य सेवा तंत्र वाले मुल्क कोरोना से हाहाकार कर रहे थे।
भारत में प्रति मिलियन आबादी पर मौत का आंकड़ा 287 है। इसकी तुलना दुनिया से भी जरूरी है।
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दुर्भाग्य से दूसरी लहर में भारतीय व्यवस्था और प्रशासन तंत्र लड़खड़ाया यह तथ्य है लेकिन यह भी समानान्तर तथ्य था कि भारत संक्रमण और मौतों के मामले में जनसंख्या के पैरामीटर्स पर आज भी दुनिया में विकसित राष्ट्रों से पीछे है। किसी मीडिया हाउस ने कभी यह नहीं बताया कि भारत में दुनिया का हर छठा आदमी निवास करता है इसके बावजूद कोविड में भारतीय स्वास्थ्य तंत्र ने बहुत अच्छा काम भी किया है।
इन पंक्तियों को लिखे जाने तक भारत में प्रति मिलियन आबादी पर मौत का आंकड़ा 287 है वहीं रूस में यह समंक 2021, अमेरिका में1857, ब्रिटेन में 1899, इटली में 2025, पेरू में 5765, जर्मनी में 1012, कनाडा में 649 दर्ज किया जा रहा है। इस सांख्यिकीय सच्चाई को पूरी तरह से पश्चिमी मीडिया हाउस छिपाए हुए है।
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