महान दार्शनिक जॉर्ज संतायना ने कहा था, “जो लोग इतिहास को याद नहीं रखते हैं उसे दोहराने की वजह से उनकी निंदा होती है।” भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन का इतिहास हैदराबाद की मुक्ति की कहानी के बिना अधूरा ही रहेगा।
एक ओर जहां 15 अगस्त 1947 को भारत का राष्ट्रीय ध्वज पूरे देश में हर्षोल्लास के साथ फहराया गया था, वहीं दूसरी ओर तत्कालीन हैदराबाद राज्य को ऐसा करने के लिए और 13 महीने तक तड़पते हुए इंतजार करना पड़ा, जब हैदराबाद के निजाम मीर उस्मान अली खान के अत्याचार और क्रूरता का राज यहां खत्म हो गया।
सरदार वल्लभभाई पटेल द्वारा ऑपरेशन पोलो के तहत सैन्य कार्रवाई का आदेश दिए जाने के साथ-साथ एक अथक संघर्ष के बाद ही 17 सितंबर,1948 को पूरे हैदराबाद डेक्कन को निज़ाम के आततायी शासन से मुक्ति मिल पाई थी।
इस 17 सितंबर को महाराष्ट्र राज्य अपना 73वां मराठवाड़ा मुक्ति संग्राम दिवस मना रहा है। सामान्य रूप से महाराष्ट्र के और विशेष रूप से मराठवाड़ा क्षेत्र के लोग निजाम से स्वतंत्रता प्राप्त करने के लिए स्वामी रामानंद तीर्थ, गोविंदभाई श्रॉफ,वजयंत्र काबरा, पी.एच. पटवर्धन और अन्य स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों के साहसी प्रयासों से अच्छी तरह से वाकिफ हैं।
दरअसल, इन नेताओं ने निजाम की निजी नागरिक-सेना, जिसे रज़ाकर नाम से जाना जाता था,के द्वारा फैलाई गई हिंसा का पूरी वीरता के साथ सामना किया, जो लिखित इतिहास में तो अच्छी तरह से प्रलेखित है ही बल्कि क्षेत्र की मौखिक विद्या में भी चर्चा में बना रहता है।
इसी तरह कर्नाटक भी 17 सितम्बर को अपने उत्तर पूर्वी जिलो (बीदर,कलबुरगी, और रायचूर), जो तत्कालीन हैदराबाद राज्य का हिस्सा थे, की आज़ादी के उपलक्ष में हैदराबाद-कर्नाटक मुक्ति दिवस मनाता है।
लेकिन दुर्भाग्य से मेरे अपने गृह राज्य तेलंगाना के हिस्से में यह उत्सव नहीं आ पाया है। वर्तमान का पूरा तेलंगाना राज्य एक ज़माने में निज़ाम के अधीन हैदराबाद डेक्कन राज्य का हिस्सा था, लेकिन इसके बावजूद इस क्षेत्र के उन नायकों को आज तक कोई मान्यता नहीं मिली है, जिन्होंने इस क्षेत्र की मुक्ति के लिए लड़ने में कोई कसर नहीं छोड़ी और जो रजाकरों के अत्याचारों से डर कर कभी भी पीछे नहीं हटे।
पीढ़ी दर पीढ़ी तेलंगाना क्षेत्र के नेताओं जैसे कि कोमाराम भीम, पीवी नरसिंहराव, मर्री चेन्न रेड्डी, शोएब उल्लाह खान, वन्देमातरम रामचंद्र राव, नारायण राव पवार , और चकाली ऐलम्मा के कारनामें और बलिदान हमारी सामूहिक स्मृति से धुंधले होते चले जा रहे हैं। यदि इनके महान कार्यों और अभूतपूर्व त्यागों को किताबों, स्मारकों और हमारी सामूहिक स्मृतियों में अमर कर के नहीं रखा गया तो इनके योगदान पूरी तरह से भुला दिए जाएंगे।