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शिक्षक दिवस 2020: अपनी सामाजिक भूमिका को कितनी गंभीरता से समझ रहे हैं शिक्षक?

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एक व्यक्ति के जीवन में जन्म दाता से ज्यादा महत्व शिक्षक का होता है- सांकेतिक तस्वीर - फोटो : Pixabay
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गुरु ब्रह्मा गुरुर्विष्णु: गुरुदेव महेश्वर:।

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गुरु साक्षात्परब्रह्म तस्मैश्री गुरुवे नम:॥


एक व्यक्ति के जीवन में जन्म दाता से ज्यादा महत्व शिक्षक का होता है, क्योंकि ज्ञान ही व्यक्ति को इंसान बनाता है, जीने योग्य जीवन देता है और वह ज्ञान सिवाए एक शिक्षक के कोई नहीं बांट सकता। हर वर्ष की भांति इस वर्ष भी शिक्षक दिवस मनाया जा रहा है। इसको मनाने के पीछे का कारण सभी जानते होंगे की इस दिन आजाद भारत के पहले उपराष्ट्रपति डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णनन का जन्मदिन आता है। 

डॉ. राधाकृष्णनन एक टीचर भी थे। उपराष्ट्रपति बनने के बाद इन्होंने जब राष्ट्रपति पद की जिम्मेदारी संभाली तो 5 सितंबर को उनके जन्मदिन पर कुछ पूर्व स्टूडेंट बधाई देने पहुंचे। ये सब डॉ. राधाकृष्णनन का जन्मदिन मनाना चाहते थे, लेकिन डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णनन ने कहा कि मेरा जन्मदिन मनाने की बजाए आप इस दिन को 'शिक्षक दिवस' के रूप में मनाएं।
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यह बात उन्होंने खुद को याद करने के उद्देश्य से नहीं अपितु शिक्षक को सम्मान देने के उद्देश्य से कही ताकि अन्य देशों की भांति भारतवर्ष में भी "शिक्षक दिवस" मनाया जा सके और इस बहाने शिक्षक को सम्मानित किया जा सके। 

आज के परिदृश्य में क्या सच में ही एक शिक्षक को सम्मानित करने के लिए इस दिन की उपयोगिता रह गई है? क्या सच में आज का विद्यार्थी "शिक्षक दिवस" पर अपने शिक्षक को सम्मानित करना चाहता है। पुरातन काल में गुरु द्रोणाचार्य ने पांडव-पुत्रों विशेषकर अर्जुन को जो शिक्षा दी, उसी की बदौलत महाभारत में पांडव विजयी हुए। 

वह स्वयं कौरवों की तरफ से लड़े पर कौरवों को विजय नहीं दिला सके। पांडवों को दी शिक्षा खुद उन पर भी भारी पड़ गई। भारत में गुरु-शिष्य की बड़ी लंबी परंपरा रही है। पहले राजकुमार भी गुरुकुल में ही जाकर शिक्षा ग्रहण करते थे और विद्यार्जन के साथ-साथ गुरु की सेवा भी करते थे।

राम-विश्वामित्र, कृष्ण-संदीपनी, अर्जुन-द्रोणाचार्य से लेकर चंद्रगुप्त मौर्य-चाणक्य एवं विवेकानंद-रामकृष्ण परमहंस आदि शिष्य-गुरु की एक ऐसी परंपरा रही है, जो एक शिक्षक व शिष्य के लिए मार्गदर्शी शिक्षा की भूमिका निभाने में अहम योगदान अदा करती है। 

वर्तमान परिदृश्य में शिक्षक इन बातों से कोसों दूर जा रहा है। उसकी साख दिन ब दिन गिर रही है। ऐसा प्रतीत होता है कि वह अपना उत्थान तो किसी भी कीमत पर चाहता है, परंतु जिस उद्देश्य के लिए वह शिक्षा जैसे इस नेक कार्य के लिए अपने कर्म क्षेत्र में आया है, वह उससे कोसों दूर जा रहा है। इसमें कभी वह व्यवस्था को दोष देता है तो कभी समाज को, लेकिन अपने दोष पर चाहते हुए भी नजर नहीं दौड़ाना चाहता आखिर क्यों? 

आए दिन शिक्षकों द्वारा विद्यार्थियों के साथ या विद्यार्थियों द्वारा शिक्षकों के साथ दुर्व्यवहार की खबरें पढ़ने-सुनने को मिलती रहती हैं। कभी-कभी तो पवित्र रिश्ते की हदों को पार कर शिक्षकों को अपनी ही छात्राओं से अश्लील हरकतों में लिप्त पाए जाने की खबरों से उस शिक्षक का मनोबल व आत्मसम्मान भी चकनाचूर हो जाता है जो बस अपने शिक्षण को ही सबकुछ मान चुका है।

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"शिक्षक दिवस" जैसे पावन पर्व की महत्ता तभी बरकरार रह पाएगी जब गुरु और शिष्य दोनों अपनी- अपनी जिम्मेदारी व कर्तव्यों का इमानदारी से निर्वाह कर पाएंगे...

शिक्षक तो विद्यार्थी और शिक्षा में वह कड़ी है जिससे समाज की अन्य सभी कड़ियां जुड़ती हैं- सांकेतिक तस्वीर - फोटो : social media
कभी सुनने को मिलता है कि शराब के नशे में चूर शिक्षक विद्यालय में पहुंचे, कभी देखा जाता है कि शिक्षक विद्यालय में होकर भी अपने शिक्षण में कोताही बरतते हैं। हद तो तब हो जाती है जब छोटे-छोटे बच्चों में भी प्राथमिक स्तर पर जातिगत भेद-भाव सामने आता है। बेशक सभी शिक्षक ऐसे कृत्यों में संलिप्त नहीं होते लेकिन जो होते हैं उनकी वजह से साख तो प्रत्येक शिक्षक की गिरती है। 

एक शिक्षक वह था जिसका एकमात्र उद्देश्य केवल पठन-पाठन था चाहे उसके सामने कैसा भी बच्चा या कोई भी कक्षा होती। आज के शिक्षक को इसलिए आक्रोशित होते देखा जा सकता है कि उसे अपने ओहदे के माफिक छोटी कक्षाओं को पढ़ाना गंवारा नहीं। फिर कैसे वह शिक्षक एक बच्चे से उस सम्मान की उम्मीद करता है जिसकी दुहाई वह हर समय देता फिरता है। 

कक्षा कभी छोटी बड़ी नहीं हो सकती सोच जरूर छोटी या बड़ी हो सकती है। शिक्षक तो वह है जो किसी भी परिस्थिति में अपने पेशे से ईमानदारी के साथ पेश आए। आज प्रत्येक शिक्षक सम्मान तो चाहता है पर क्या वह सम्मान शर्तों पर आधारित होना चाहिए? यह मंथन करने का विषय है। 

आज शिक्षा एक नेक कार्य नहीं रहा अपितु यह मात्र धन अर्जित करने का संसाधन बन कर रह गई है। हम ने भौतिकता के इस युग में शिक्षा का भी व्यापारीकरण करने में कोई कोर कसर बाकी नहीं रखी। जिस शिक्षक को कभी शिक्षा जैसे पुण्य कार्य से जोड़कर देखा जाता था आज धन बल कमाना ही उसके लिए सर्वोपरि बन गया है। 

शिक्षक तो विद्यार्थी और शिक्षा में वह कड़ी है जिससे समाज की अन्य सभी कड़ियां जुड़ती हैं। यदि इनके बीच की शिक्षक रूपी "कड़ी" कमजोर होगी तो समाज का बिखरना निश्चित है। आज जरूरत है एक शिक्षक द्वारा अपने विद्यार्थियों को न केवल किताबी ज्ञान ही बांटा जाए बल्कि उनके चरित्र निर्माण में भी वह अपनी भूमिका को अदा करे। 

बिना नैतिक मूल्यों के सभी शिक्षाएं शून्य हैं। इस समय हमारे देश-प्रदेश को जरूरत भी है ऐसी शिक्षाओं की जो चरित्र निर्माण व नैतिक मूल्यों से परिपूर्ण हो। जन्म दाता से ज्यादा महत्व शिक्षक का होता हैं, क्यूंकि ज्ञान ही व्यक्ति को इंसान बनाता हैं जीने योग्य जीवन देता है।

वहीं सफलता किसी की भी हो उस नींव में अहम योगदान शिक्षक का ही होता है, बिना शिक्षक न तो कोई व्यक्ति महान बन पाएगा न ही बिना गुरु-शिष्य कोई देश महान बनने का सपना देख सकता है। 



आज जरूरत है शिक्षक को अपने ही अंदर छिपे उस शिक्षक को बाहर निकालने की जो उसको तो सत्य मार्ग दिखाए ही साथ ही देश के विद्यार्थियों को भी उस मार्ग पर प्रशस्त कर सके जिसकी देश को इस समय सबसे ज्यादा जरूरत है।

"शिक्षक दिवस" जैसे पावन पर्व की महत्ता तभी बरकरार रह पाएगी जब गुरु और शिष्य दोनों अपनी- अपनी जिम्मेदारी व कर्तव्यों का इमानदारी से निर्वाह कर पाएंगे अन्यथा प्रतिवर्ष ऐसे ही कई "शिक्षक दिवस" आएंगे व जाएंगे। 


डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।
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