विवेकानंद भारत में आधुनिक विचारों को देने वाले सबसे अलग विचारक हैं।
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स्वामी जी अपने शिष्यों से अक्सर कहा करते थे- “ धर्म का मूल उद्देश्य है मनुष्य को सुखी करना, किंतु परजन्म में सुखी होने के लिए इस जन्म में दु:ख भोग करना कोई बुद्धिमानी का काम नहीं है। इस जन्म में ही, इसी मुहुर्त से सुखी होना होगा, जिस धर्म के द्वारा ये संपन्न होगा, वहीं मनुष्य के लिए उपयुक्त धर्म है।”
अक्सर मैं देखते आया हूं कि विश्वविद्यालय की कक्षाओं में ‘धर्म’ शब्द का नाम आते ही तर्क-वितर्क की मुद्राएं एक दूसरे के कॉलर तक पहुंच जाती हैं। वाद-विवाद का मैदान युद्ध में तब्दील हो जाता है। क्या धर्म ये ही है? या हमने इसे हिंसात्मक और बांटने वाला बना दिया है। इस प्रसंग के माध्यम से हम इस पर विचार कर सकते हैं।