तौसिफ अब तक 49 गांव में काम कर चुके हैं और 4 हजार बच्चों को प्रशिक्षित कर चुके हैं।
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तौसिफ के प्रयास और हुनर की पाठशाला
“हुनर की पाठशाला” ने पहली बार में 100 युवा कोरकू (आदिवासी) जो पलायन करने वाले बेरोजगार थे। उन्हें रोजगार से जोड़ने के प्रयास किए, साथ ही आदिवासी क्षेत्र के 10 गांव में प्रशिक्षण शुरू किए जिसमें युवाओं को ब्लॉक प्रिटिंग, साइकिल रिपेयरिंग, सामूहिक खेती के प्रशिक्षण के साथ अपने रोजगार को गांव में शुरू करने के लिए सहयोग भी दिया।
“यह एक सीखने वाला समय रहा था, हमने 20 युवाओं के रोजगार की दुकान शुरू करने के लिए सामग्री सहयोग किया, लेकिन सिर्फ 2 दुकान ही चली बाकी बंद हो गईं”-
तौसिफ अफ़सोस से कहते हैं- यह प्रयास किया गया कि यह प्रकल्प फेल क्यों हुआ - गांव में बैठक में समझा कि - समुदाय के बीच शिक्षा का स्तर बहुत निम्न है, जिसके कारण उन्हें अपने हुनर, खेती और कार्यो का मूल्य नहीं मालूम, वे अपने कार्य या समुदाय को दूसरों से या शहरों से कम आंकते हैं, जिसके चलते वे अकुशल मजदूर के रूप में ही कार्य करते आ रहे हैं, और फिर यहां से शिक्षा और आजीविका की पहल को तौसिफ ने एक साथ करने का निर्णय लिया।
तौसिफ के लिए आगे मुश्किलें बहुत ज्यादा थींं। एक तो खुद के परिवार के लिए आमदनी जुटाना और दूसरा संस्था चलाने के लिए रुपयों की जरूरत- वे कहते है - “मेरे लिए यह बहुत मुश्किल कार्य था चूंकि कोई सहयोग नहीं था, हमने 2014 में संस्था को स्वरूप दिया, रजिस्ट्रेशन की प्रकिया पूर्ण हुई, लेकिन सहयोग कुछ नहीं था। मैं हफ्ते में 3 दिन सब्जी बेचता था और बाकी 4 दिन अपने साथियों को फील्ड में काम करने में मदद करता था, यहीं से हम अपना घर भी चलाते और संस्थागत गतिविधियों को भी पूरा करते रहे।
तौसिफ याद करते हैं- वह समय बड़ा खराब था। गेराज उनके भाई संभालने लगे थे, अब चिंता थी संस्था के साथियों को सहयोग पहुंचाने की थी, तब उन्होंने वापस अपनी सब्जी और फल की दुकान साप्ताहिक बाजारों में लगाना शुरू की। 2016 में एक साथी ने हमसे पूछा कि गांव में तुम्हें काम करने के लिए कितने रुपये प्रतिमाह की जरूरत है- हमने कहा 3 हजार रुपये महीने में हम अपना काम कर सकते हैं। उन्होंने हमें 1 वर्ष तक 3000 रुपये प्रति माह तक सहयोग किया और हमने अपने शिक्षा के कार्यो को जमीन पर करना शुरू किया।
अपनी उपलब्धियों के बारे में तौसिफ कहते हैं-
“अभी तक हमने कोरकू आदिवासी समुदाय के 7 से 14 वर्ष के 4000 बच्चों को केंद्र के माध्यम से गुणवत्तापूर्ण शिक्षा से जोड़ने के लिए 49 गांव में कार्य किया है। यह सहयोग दिल्ली के एक संस्थान द्वारा मिला।
2016 में 400 आदिवासी किसानों के साथ मिलकर समूह बनाकर कोरो किसान के नाम से प्याज को एक नाम के साथ स्टोर कर दिल्ली तक बेचा व किसानों को उचित दाम दिलवाया जोकि एक बड़ा काम था किसानों के हित में। 2017 में 2 सामुदायिक शिक्षा केन्द्र स्थापित किए जहां सीखने-सिखाने और पढ़ने-पढ़ाने को लेकर खुद की सीखा को बेहतर किया और स्थानीय बोली में बच्चों के लिए पाठ्यक्रम विकसित किया”।
पगडंडी यात्रा का काम
एक सबसे बड़ा काम जो हमने किया वो पगडंडी यात्रा का था जो 2017 से शुरू हुआ और जिसमें देशभर व अन्य देशों के युवाओं को आमंत्रित कर समुदाय के बीच 8 दिन रहने का अनुभव प्रदान करते थे। कोरकू आदिवासी समुदाय की संस्कृति को समझना, देखना और उन्हें क्या मदद की जा सकती है- इस पर यात्रा का जोर रहता था।
आठ दिन का यह शैक्षिक सफ़र सभी भागीदार तय करते हैं जिसमें कोरकू समुदाय के बारे में बाहरी दुनिया के लोगों को जानने समझने का मौका मिलता है, साथ ही शहरी युवाओं को ग्रामीण युवाओं से जोड़कर उनके सपनों को पाने के लिए एक रास्ता बनाने का प्रयास होता है।
यह यात्रा ट्रेक्टर पर बने एक घर मे होती है, जो सतपुड़ा के बीच उसमे फैली असीम कोरकू सभ्यता को जानने-समझने के साथ युवाओं को प्रेरित करती है कि युवा पुन: गांव की ओर वापस लौटें और सार्थक कार्य करें।
यात्रा के द्वारा अब तक 510 शाला त्यागी बच्चों की पहचानकर उन्हें स्कूल से जोड़ने का प्रयास किया गया है। यात्रा के ही एक यात्री द्वारा 100 बालिकाओं की शिक्षा के लिए 1 वर्ष के लिए सहयोग प्रदान किया गया- जिसमें उन बालिकाओं को किताबें, यूनिफार्म और ट्यूशन मुफ्त में दी गई। यात्रा के ही 10 युवा यात्रियों द्वारा गांव में लाइब्रेरी के लिए 1000 कहानियों की पुस्तक पहुंचाई गई।
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