राम लोक को सत्य से जीतते हैं, दीन-दुखियों को परोपकार से, गुरुओं को सेवा से और शत्रुओं को धनुष की शक्ति से।
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वन में विराध, खर-दूषण को मारने वाले राम तुरंत शक्ति प्रदर्शन करते हैं, इसलिए वे आशुविक्रम हैं। राम सभी प्राणियों के हित में रत हैं और प्रथित या प्रसिद्ध हैं। वे परम मित्र (सुहृद्) हैं। वे सुग्रीव का उपकार मानते (कृतज्ञ) हैं।
सीता की खोज में वन-वन भटकते राम कहते हैं-
संसार मुझे करुणवेदिन् (दयालु) तो समझेगा, लेकिन दुर्बल भी मानेगा।
राम शत्रुओं को मारने वाले हैं इसलिए उन्हें अरिन्दम या अरिघ्न भी कहा गया है। वे रावण को हराकर युद्ध जीतते हैं इसलिए उन्हें समितिञ्जय भी कहा गया। राम के चरित्र की सबसे बड़ी विशेषता है लोकहित का विचार। लोक उनकी पूजा करते हैं। राम सहस्रनाम में उन्हें लोकवन्द्य कहा गया है।
राम लोक को सत्य से जीतते हैं, दीन-दुखियों को परोपकार से, गुरुओं को सेवा से और शत्रुओं को धनुष की शक्ति से।
(सत्येन लोकान् जयति दीनान् दानेन राघवः।
गुरूञ्छुश्रूषया वीरो धनुषा युधि शात्रवान्।।)
सच तो यह है कि राम के चरित्र को विशेषणों में, नामों में समेटना असंभव है। मैथिलीशरण गुप्त जी सही कहते हैं,
“राम, तुम्हारा चरित स्वयं ही काव्य है। कोई कवि बन जाय, सहज संभाव्य है।”
शायद इसी कारण राम का एक नाम शब्दातिग (जो शब्दों के परे हैं) भी है।
अंतिम बात। महर्षि वाल्मीकि नहीं तुलसीदास जी के मुख से। क्योंकि आज ही के दिन तुलसीदास जी ने रामचरित मानस का शुभारम्भ किया था।
वन में जब राम वाल्मीकि से पूछते हैं कि कुटिया कहां बनाई जाए, तो वाल्मीकि उन्हें कहते हैं,
“जाति पांति धनु धरमु बड़ाई। प्रिय परिवार सदन सुखदाई॥
सब तजि तुम्हहि रहइ उर लाई, तेहि के हृदयं रहहु रघुराई”
जिसने जांति-पांति, धन, धर्म, घमंड, प्रिय परिवार और सुखद घर सब छोड़ दिया है, आप उसी के हृदय में रहिए। चैत्र शुक्ल नवमी की दोपहर में जन्म लेने वाले राम हम सबके मन उज्ज्वल करें, हम सबके मन में रहें।
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