Rajasthan Election 2023
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पांच साल के बाद सरकार बदलाव का ट्रेंड
राजस्थान में एक चलन ऐसा चला रहा है, जो गहलोत के खिलाफ जाता है। यहां पांच साल कांग्रेस रहती है तो पांच साल भाजपा की। इस ट्रेंड को तोड़ना बेहद मुश्किल है। यह ट्रेंड केवल जनता को लोकलुभावन योजनाएं देने से बदल जाएगा, ऐसा कहना मुश्किल है, क्योंकि राजस्थान में कानून-व्यवस्था, परीक्षाओं के पेपरलीक, भ्रष्टाचार, तुष्टीकरण, अवैध खनन, गैंगवार जैसे बड़े मुद्दे इस समय जनता को साफ-साफ नजर आ रहे हैं।
गहलोत के आगे सबसे बड़ा संकट यह है कि वर्ष 2003 में जब मुख्यमंत्री रहते वो चुनाव में गए थे तो 150 सीटों से 56 सीटों पर आ गए थे और उसके बाद कभी कांग्रेस चुनाव में 100 पार का आंकड़ा पार नहीं कर पाई। वर्ष 2009 में कांग्रेस सत्ता में लौटी, पर उसे 200 में से सिर्फ 96 सीटें मिलीं और गहलोत ने जोड़-तोड़ कर बसपा के विधायकों को कांग्रेस में शामिल करा लिया।
सरकार किसी तरह चलती रही, लेकिन वर्ष 2013 में तो कांग्रेस पार्टी 21 सीटों पर रह गई थी। वर्ष 2018 में कांग्रेस पुनः सत्ता में आई पर 100 सीटें ही पार्टी को मिलीं। सचिन बार-बार कह रहे हैं कि गहलोत के नेतृत्व में पार्टी हारती है। हालांकि, अब चुनाव इतना नजदीक है कि कांग्रेस पंजाब जैसा फैसला, जहां कैप्टन अमरिंदर सिंह को बदल दिया गया था, राजस्थान में नहीं लेना चाहेगी।
अब तक सचिन पायलट को लेकर जो संकेत मिल रहे हैं, उनके अनुसार वो कांग्रेस की ओर से कार्रवाई का इंतजार कर रहे हैं, ताकि खुद को शहीद दिखाकर इमोशनल कार्ड खेल सकें। अशोक गहलोत गुट भले सचिन पर कार्रवाई चाहता हो, लेकिन पार्टी अब तक इस दिशा में गंभीरता से आगे बढ़ती नहीं दिख रही।
कर्नाटक में सिद्धारमैया और डीके शिवकुमार की जोड़ी की भांति कांग्रेस राजस्थान में भी गहलोत-पायलट को एक रखकर चुनाव में जाना चाहती है। फिलहाल तो इसकी संभावना बिल्कुल भी नजर नहीं आती। एक संभावना जो सबसे प्रबल है, वह यह है कि सचिन नई पार्टी बनाकर तीसरे मोर्चा का गठन कर सकते हैं।
राष्ट्रीय लोकतांत्रिक पार्टी के सुप्रीमो हनुमान बेनीवाल लगातार सचिन को रिझाने में लगे हैं। यदि ऐसा होता है तो गुर्जर-जाट समीकरण कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी, दोनों को परेशान कर सकता है।
भाजपा के लिए भी कई चुनौतियां
जहां तक राजस्थान में भारतीय जनता पार्टी का सवाल है तो अधिकांश नेता यही मानकर खुद को तसल्ली दे रहे हैं कि पांच साल बाद राज्य में सरकार तो बदलती ही है। राज्य में पार्टी के नेतृत्व को लेकर भी एक असमंजस की स्थिति है।
पार्टी अब तक इस संकट को यह कहकर दूर करती आ रही है कि चेहरा तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का ही रहेगा। हालांकि, पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे पिछले कुछ दिनों से सक्रिय हुई हैं। वह दो बार मुख्यमंत्री रह चुकी हैं और दोनों ही बार उनके नेतृत्व में पार्टी सत्ता से बेदखल हुई है। ऐसे में उन पर पार्टी दांव लगाएगी, इसकी संभावना कम नजर आती है।
पार्टी में केंद्रीय जलशक्ति मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत को भी एक प्रमुख चेहरा माना जाता है। इसके अलावा अर्जुनराम मेघवाल से लेकर सतीश पूनिया और एक लंबी लिस्ट नेताओं की है, जो खुद को प्रोजेक्ट करते रहते हैं। चुनाव के समय सत्ता के लिए बहुमत वाले नंबर आते हैं तो किसके सिर मुख्यमंत्री का ताज आएगा? यह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृहमंत्री अमित शाह की जोड़ी ही जानती होगी। फिलहाल तो मौसम की गर्मी से ज्यादा राजस्थान में राजनीति की रेत गर्म होती जा रही है।
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